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खेलों पर प्रति व्यक्ति महज साढ़े सोलह रुपए

2014-15 में जरूर राजग सरकार ने 2014-15 के खेल बजट में 2013-14 के 1207 करोड़ 76 लाख रुपए की तुलना में 46.5 फीसद यानी 561 करोड़ 24 लाख रुपए का इजाफा कर उसे 1769 करोड़ रुपए कर दिया लेकिन उसके बाद बढ़ोतरी सिकुड़ती गई।

2016 के रियो ओलंपिक के लिए सरकारी स्तर पर थोड़ी व्यवस्थित कोशिश हुई। (फोटो सोर्स : PTI)

श्रीशचंद्र मिश्र

कहने को इस बार अंतरिम बजट में खेलों के लिए 214 करोड़ बीस लाख रुपए की अतिरिक्त व्यवस्था की गई। 2018-19 में खेलों को 2216 करोड़ रुपए 92 लाख रुपए की सरकारी मदद मिलने वाली है। लेकिन क्या यह ऊंट के मुंह में जीरे के बराबर नहीं है। आबादी के लिहाज से देखा जाए तो प्रति व्यक्तिऔसतन साढ़े सोलह रुपए खेलों पर खर्च होंगे। इसके बाद कैसे उम्मीद की जाए कि सरकारी मदद से क्या खेलों में सफलता मिल सकती है? राजग के कार्यकाल में खेल बजट 456 करोड़ रुपए ही बढ़ा है। उस पर यह दावा कि खेलों को विशेष प्राथमिकता दी जा रही है।

2014-15 में जरूर राजग सरकार ने 2014-15 के खेल बजट में 2013-14 के 1207 करोड़ 76 लाख रुपए की तुलना में 46.5 फीसद यानी 561 करोड़ 24 लाख रुपए का इजाफा कर उसे 1769 करोड़ रुपए कर दिया लेकिन उसके बाद बढ़ोतरी सिकुड़ती गई। 2010 में नई दिल्ली में हुए राष्ट्रमंडल खेलों की आयोजन व्यवस्था में सरकार ने दखल दिया तो भ्रष्टाचार और अनियमितता की ढेरों परते खुल गईं। 2014 में तो अच्छा खासा मजाक हुआ। 23 जुलाई को राष्ट्रमंडल खेल शुरू हुए। दस जुलाई को केंद्रीय बजट में राष्ट्रमंडल खेलों और सितंबर में होने वाले एशियाई खेलों के लिए खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देने के मद में सौ करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया। आसानी से समझा जा सकता है कि ऐन वक्त पर रकम मिलने का क्या फायदा होता। एक तो सौ करोड़ के इस प्रावधान से ज्यादातर खेल संघों के हिस्से में तीन से चार करोड़ रुपए ही आए। फिर खेल शुरू होने में दो हफ्ते से भी कम समय बाकी रहते प्रशिक्षण की सुविधाएं जुटा पाना नामुमकिन था।

यह सही है कि इसके लिए राजग सरकार को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। जुलाई में उसे बजट पेश करने का मौका मिला। लेकिन यह सावधानी तो बरती ही जा सकती थी कि राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारी के नाम पर सौ करोड़ रुपए देने का जिक्र हटा दिया जाता। उसी साल एशियाई खेल इंचियोन (दक्षिण कोरिया) में हुए। यह रकम उन खेलों के लिए खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देने के काम में भी नहीं आ पाई। होना तो यह चाहिए था कि यूपीए सरकार राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारी के लिए पर्याप्त रकम की व्यवस्था करती। लेकिन जब भारतीय ओलंपिक संघ से विभिन्न खेल संगठनों तक में दूरदर्शिता का अभाव हो तो सरकारी तंत्र कैसे सजग रह पाता? बाकी देश सालों की तैयारी के बाद सफलता का सपना देखते हैं। अपने यहां खेल संगठन से लेकर सरकार तक की नींद आखिरी मौके पर खुलती है। आधी अधूरी तदर्थ तैयारी कर खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में झोंक दिया जाता है।

2016 के रियो ओलंपिक के लिए सरकारी स्तर पर थोड़ी व्यवस्थित कोशिश हुई। ‘टारगेट ओलंपिक पीडियम स्कीमह्ण (टॉप्स) के तरह पदक जीत सकने के संभावित खिलाड़ियों को प्रशिक्षण आदि के लिए आर्थिक मदद दी गई। 117 खिलाड़ियों में 36 करोड़ 85 लाख रुपए बांटे गए। हाथ आया एक रजत व एक कांस्य पदक। इससे साबित हो गया कि ‘टाप्सह्ण योजना नाकाम रही। इससे कई सवाल उठे। मसलन क्या सरकार को स्थापित खिलाड़ियों की मदद करनी चाहिए? या प्रतिभाओं की खोज पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए? अथवा खेलों के लिए आधारभूत सरंचना के विकास पर जोर देना चाहिए। अड़चने कई हैं। ओलंपिक चार्टर के तहत सरकार खेलों के कामकाज में दखल नहीं दे सकती। उसके लिए अलग से हर खेल के संघ हैं। लेकिन वे सरकार पर आश्रित हैं और सरकार का खेल बजट सीमित है।

खिलाड़ियों के लिए राष्ट्रीय शिविर लगाने, उन्हें उपकरण व अभ्यास की सुविधाएं मुहैया कराने का काम सरकारी नियंत्रण वाले भारतीय खेल प्राधिकरण पर है। उसमें होने वाली अनियमितता किसी से छिपी नहीं है। मौजूदा खेल बजट में उसके हिस्से में 450 करोड़ रुपए रखे गए हैं। खिलाड़ियों को दी जाने वाली आर्थिक प्रोत्साहन राशि 89 करोड़ रुपए तय की गई है। यानी कुल मिला कर सब कुछ तदर्थ व्यवस्था है इसका कोई फायदा न पहले हो पाया है और न आगे हो पाएगा।

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