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मानसिक परेशानी से जूझते खिलाड़ी

करोना महामारी के कारण लंबे समय से मैदानों से दूर रहे खिलाड़ियों के लिए यह खबर जरूर खुश करने वाली है कि अब सूने पड़े मैदानों में रौनक लौटने लगी है।

सांकेतिम फोटो।

आत्माराम भाटी

करोना महामारी के कारण लंबे समय से मैदानों से दूर रहे खिलाड़ियों के लिए यह खबर जरूर खुश करने वाली है कि अब सूने पड़े मैदानों में रौनक लौटने लगी है। फुटबॉल की दो प्रमुख प्रतियोगिताएं यूरो कप व कोपा अमेरिका कप पूरे जोर-शोर से जारी है। वहीं, इग्लैंड में क्रिकेट अपने पूरे रंग में है। जहां भारतीय महिला व पुरुष क्रिकेट टीम बतौर मेहमान खेल रही है। साथ ही टेनिस में ग्रैंडस्लैम संपन्न होने के बाद इस माह के अंत में विंबलडन शुरू हो रहा है। इनके अलावा मोटर व बाइक स्पोर्टिंग की प्रतियोगिताएं प्रारंभ हो चुकी हैं या होने वाली हैं।

हालांकि मैदान में लौटने के बाद सबसे बड़ी समस्या खिलाड़ियों के लिए यह आ रही है कि लंबे समय तक खेल से दूर रहने के बाद बेहतरीन प्रदर्शन के लिए खिलाड़ी शारीरिक व मानसिक रूप से जूझ रहे हैैं। जिस शारीरिक व मानसिक मजबूती की आवश्यकता होती है, उस स्तर पर खिलाड़ियों के लिए एकदम से अपने को ला पाना आसान नहीं हो पा रहा है। ऐसे में कुछ प्रमुख खिलाड़ी लगातार मैदान पर खेलने से बचने के लिए प्रतियोगिताओं से भी अपना नाम वापस ले रहे हैैं।

इसका प्रमाण हमें टेनिस में देखने को मिला जब इस खेल के दिग्गज खिलाड़ी रोजर फेडरर व नाओमी ओसाका ने फ्रेंच ओपन के बीच में शारीरिक व मानसिक परेशानियों का हवाला देते हुए खुद को अलग कर सबको अचंभित कर दिया। यही कहानी अब राफेल नडाल व नाओमी ओसाका ने दोहराई है जब इन दोनों ने विबंलडन से शारीरिक आराम का हवाला देते हुए अपना नाम वापस ले लिया है। यह दिखाता है कि वाकई खिलाड़ियों पर शारीरिक से ज्यादा जीतने का मानसिक दबाव हावी होता जा रहा है और वे जीत के लिए शारीरिक व मानसिक स्फूर्ति पाने के लिए अपना नाम वापस ले रहे हैैं खिलाड़ियों की शारीरिक कमजोरी का ऐसा ही मामला हमें यूरो कप फुटबॉल के एक मैच डेनमार्क व फिनलैंड के मुकाबले में देखने को मिला। जब डेनमार्क का एक प्रमुख खिलाड़ी क्रिस्टियन एरिक्सन चलते मैच में मैदान में अचेत हो कर गिर पड़े।

दूसरी ओर कोरोना महामारी से बचने के लिए जो सख्त दिशा-निर्देश खिलाड़ियों के लिए जारी किए गए हैं वह उनके शारीरिक व मानसिक संतुलन की मजबूती में कहीं न कहीं बाधा बन रहा है। खिलाड़ी पहले जिस तरह से मानसिक व शारीरिक रूप से लगातार मेहनत करते हुए मैदान में उतरते थे, एकांतवास में रहने की शर्त कहीं न कहीं खिलाड़ी के खेल, मानसिक व शारीरिक स्तर को प्रभावित कर रही है। ऐसे में खिलाड़ी के लिए सौ फीसद आवश्यक शारीरिक व मानसिक फिटनेश को प्राप्त कर बनाए रखना आसान नहीं हो रहा है।

जुलाई में तोक्यो ओलिंपिक में खेलने वाले खिलाड़ी भी परेशान हैं क्योंकि उनको अभ्यास का पूरा मौका नहीं मिल पा रहा है। उनके लिए एकदम से शारीरिक व मानसिक फिटनेश को प्राप्त करना आसान नहीं हो पा रहा है। इस कारण वे पदक जीतने के लिए मानसिक रूप से और ज्यादा दबाव में हंै। यही नहीं कुछ बेहतरीन खिलाड़ी इसलिए मानसिक रूप से टूट चुके कि वे कोरोना की वजह से ओलंपिक में क्वालीफाई नहीं कर पाए।

इसमें दो राय नहीं कि खिलाड़ियों ने मानसिक फिटनेश के लिए योग व मेडिटेशन और शारीरिक फिटनेस के लिए घर में उपलब्ध संसाधनों से मेहनत की है, लेकिन मैदान में विरोधी खिलाड़ी व टीम के सामने मैच के दौरान जिस शारीरिक व मानसिक फिटनेस की आवश्यकता होती है वो घर में नहीं मिल सकती। इसलिए आज खिलाड़ियों के सामने सबसे बड़ा चैलेंज शारीरिक व मानसिक फिटनेस को बनाए रखने का हो गया है।

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