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पौष्टिक खाना है खिलाड़ियों का खजाना

एथलेटिक्स में भारत की कमजोर स्थिति के बारे में पूछने पर जोगेश कहते हैं कि हम सिर्फ उनपर ध्यान देते हैं जो खिलाड़ी प्रदर्शन के लिए तैयार हो जाते हैं। हम उन प्रतिभाओं को तलाशने के प्रयास में काफी पीछे हैं जिन्हें महज 7-8 साल की उम्र से ही तैयारी में लग जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि हम थोड़ी बहुत जो कोशिश करते भी हैं, वह अधिकारियों की उदासीनता के कारण फाइलों में दब कर रह जाती हैं।

Author March 22, 2018 04:55 am
यहां खिलाड़ियों को मुफ्त में ट्रेनिंग दी जाती है।

संदीप भूषण

राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारी में जोर-शोर से जुटा है भारत। लगभग सभी खेलों के लिए टीमों की घोषणा हो चुकी है। कई टीमें तो गोल्ड कोस्ट के लिए रवाना भी हो गई हैं। इस प्रतियोगिता को आने वाले ओलंपिक का सेमी फाइनल माना जा रहा है। इस मुद्दे पर जब उत्तर भारत में डिस्कस थ्रो और शॉट पुट की नर्सरी चलाने वाले जोगेश कुमार से उनकी राय पूछी तो उन्होंने कहा कि हम पदक तालिका में तब तक शीर्ष पर नहीं पहुंच सकते, जब तक पौष्टिक खाने की कमी से जंग न जीत लें। उन्होंने कहा कि एथलेटिक्स में भारत की नाकामी और उत्तर भारत से ट्रैक और फिल्ड में खिलाड़ियों की कमी की सबसे बड़ी वजह है – शुरुआती दौर में प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे खिलाड़ियों के लिए उचित खाने-पीने की व्यवस्था का न होना।
जोगेश और सुरेश (उनके भाई) दिल्ली के मेहंदी पार्क में जोगी थ्रोबॉल अकादमी चलाते हैं। यहां खिलाड़ियों को मुफ्त में ट्रेनिंग दी जाती है। उनके लिए खेल के साजो-सामान की भी व्यवस्था जोगेश करते हैं। उन्होंने 1998 में इस अकादमी की शुरुआत की थी। इस अकादमी ने अब तक लगभग 40 ऐसे खिलाड़ी तैयार किए हैं, जिन्होंने राष्ट्रीय, एशियाई और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व किया है। जोगेश ने कहा कि सरकार चाहे कोई भी स्कीम चला ले, पर जब तक स्कूली स्तर से प्रतिभाओं को तराशने का काम शुरू नहीं किया जाएगा, हम खेलों में महाशक्ति बनने की कल्पना भी नहीं कर सकते। हालांकि उन्होंने सरकार द्वारा शुरू किए गए ‘खेलो इंडिया’ योजना की सराहना की पर साथ ही कहा कि इसके परिणाम आने में अभी कम से कम पांच साल लगेंगे।

एथलेटिक्स में भारत की कमजोर स्थिति के बारे में पूछने पर जोगेश कहते हैं कि हम सिर्फ उनपर ध्यान देते हैं जो खिलाड़ी प्रदर्शन के लिए तैयार हो जाते हैं। हम उन प्रतिभाओं को तलाशने के प्रयास में काफी पीछे हैं जिन्हें महज 7-8 साल की उम्र से ही तैयारी में लग जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि हम थोड़ी बहुत जो कोशिश करते भी हैं, वह अधिकारियों की उदासीनता के कारण फाइलों में दब कर रह जाती हैं। एक और मुद्दे पर ध्यान दिलाते हुए उन्होेंने कहा कि हमारे यहां प्रतिभा की कमी नहीं है लेकिन एक एथलीट को तैयार करने में क्या खर्च आता है – यह सबको पता है और हमारे यहां खेल में ज्यादातर गरीब घर के बच्चे ही आते हैं। इन बच्चों को सही तरह का खाना-पीना भी नहीं मिल पाता। उन्होंने कहा कि हम अभी पौष्टिक खाने से ही जंग लड़ रहे हैं। जब तक इस मामले में नहीं जीत जाते तब तक ओलंपिक की पदक तालिका में शीर्ष स्थाने के बारे में सोचना बेमतलब है। जोगेश के प्रशिक्षण केंद्र में लगभग 100 बच्चे हैं। इस केंद्र को चलाने के लिए सरकारी सहायता के सवाल पर वे कहते हैं कि यह सबको पता है कि मैं यहां डिस्कस, शॉट पुट और थ्रो बॉल के लिए खिलाड़ी तैयार करता हूं। संघ भी इससे भली-भांति वाकिफ है। फिर भी कोई खुद से पहल नहीं करता। दरअसल, जोगेश खिलाड़ियों को अपने पैसे से मदद करते हैं और उन्होेंने कहा कि यहां सिर्फ उत्तर भारत ही नहीं बल्कि पूरे देश से बच्चे प्रशिक्षण लेने के लिए आते हैं।

क्या खेल अब सिर्फ नौकरी पाने का मध्यम भर बन कर रह गया है? इसके जवाब में वे कहते हैं कि देखिए बच्चे सिर्फ नौकरी के लिए ही खेल को अपनाते हैं ऐसा कहना बिलकुल सही नहीं है। खेलने के लिए जुनून होना चाहिए। किसी भी खेल में राष्ट्रीय स्तर तक ही पहुंचने के लिए प्रतिभा के साथ कड़ी मेहनत की आवश्यकता होती है। तो हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि देश का युवा सिर्फ नौकरी के लिए ही खेल को अपना रहा है।

हां, एक बात जरूर है कि नौकरी के माध्यम से उन्हें अपने खेल को और निखारने के लिए पैसे मिल जाते हैं। इस व्यवस्था को और मजबूती देने के लिए नौकरी कर रहे खिलाड़ियों को भी पूर्ण रूप से मैदान पर ही रहने देना चाहिए। इस विचार पर जोगेश ने कहा कि यह एक बहुत ही अच्छा कदम होगा। दरअसल, जब किसी खिलाड़ी को खेल कोटे से नौकरी दी जाती है तो उस पर कार्यालय के काम का कोई दबाव नहीं होना चाहिए और उसे स्वतंत्र रूप से खेल के लिए ही छोड़ देना चाहिए। जोगेश कुमार यादव भी शॉट पुट और डिस्कस थ्रो के अंतरराष्ट्रीय कोच और पूर्व कोच रह चुके हैं। इन्होंने नेशनल गेम के शॉट पुट प्रतियोगिता में दो स्वर्ण और एक रजत पदक जीते हैं। साथ ही इन्होंने कई अन्य अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भी देश के लिए खेला है। राष्ट्रीय स्तर की सात एथलेटिक्स प्रतियोगिताओं में जोगेश ने पदक प्राप्त किए हैं। सुरेश कुमार यादव शॉट पुट और डिस्कस थ्रो के अंतरराष्ट्रीय और पूर्व कोच रह चुके हैं। ऑल इंडिया अंतर विश्वविद्यालय एथलेटिक्स चैंपियनशिप के डिस्कस थ्रो में तीन स्वर्ण पदक इन्होंने जीते हैं। इसी प्रतियोगिता के शॉट पुट मुकाबले में एक स्वर्ण इनके नाम है। एशिया एथलेटिक्स चैंपियंसशिप और ऑल इंडिया एथलेटिक चैंपियनशिप में भी इन्होंने भाग लिया है।

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