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भारतीय ‘चिड़िया’ की नई उड़ान

भारतीय बैडमिंटन का नाम आते ही साइना नेहवाल, पीवी सिंधु और जी ज्वाला का नाम आता हैं।

मनीष कुमार जोशी

भारत द्वारा थामस कप जीतने पर एक खेल विज्ञ ने टिप्पणी की कि यह सुनहरा क्षण भारत को कैद कर लेना चाहिए। कैद करना चाहिए भी क्योंकि यह क्षण बिलकुल वैसा ही है जैसा अस्सी के दशक क्रिकेट में भारत ने वेस्ट इंडीज को पराजित कर विश्वकप जीता था। सत्तर के दशक में प्रकाश पादुकोने द्वारा आल इंडिया बैडमिंटन जीतने के बाद भारतीय शटल इतिहास में यह सबसे बड़ा पल है। यह विजय पथ का प्रस्थान बिंदु होना चाहिए। थामस कप की जीत से पहले तक बैडमिंटन पर महिलाओं का राज था। कुछ वर्षों से भारतीय महिलाएं बैडमिंटन में अपने नाम की धाक जमा रही है।

भारतीय बैडमिंटन का नाम आते ही साइना नेहवाल, पीवी सिंधु और जी ज्वाला का नाम आता हैं। इन महिलाओं ने हाल ही के वर्षो में अपने दम पर भारत का नाम रोशन किया है और भारतीय बैडमिंटन को अपना पर्याय बना दिया है। इन्होंने केवल व्यक्तिगत ही नहीं बल्कि टीम के रूप में उल्लेखनीय प्रदर्शन किया है। वर्ष 2014 और 2016 के उबेर कप में इन महिलाओं ने भारत के लिए कांस्य पदक जीता है।

भारतीय पुरुषों को एक बड़ी जीत का इंतजार था। किदांबी श्रीकांत के अलावा कोई शटलर कोई बड़ी जीत हासिल कर नहीं पा रहा था। थामस कप में इन पुरुषों ने एड़ी चोटी का जोर लगा दिया और 14 बार के चैम्पियन इंडोनेशिया को हराकर न केवल भारतीय शटल इतिहास के सबसे बड़े पल को देश के नाम किया बल्कि भारतीय शटलरों के बीच अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। महिलाओं के सफलता के बीच पुरुष शटलरों के बीच जो खालीपन उपस्थित हो गया था वह इस जीत के साथ भर दिया।

भारतीय पुरुष शटलरों की जीत अविश्वसनीय है क्योंकि उन्होने वह जीत हासिल की है जिसके लिए भारत को 73 साल इंतजार करना पड़ा। कोई इस जीत की उम्मीद ही नहीं कर रहा था क्योंकि इंडोनेशिया 14 बार की चैम्पियन है। भारतीय खिलाडी इंडोनेशियाई खिलाडियों से रैंकिंग में नीचे है। यह जीत इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इस जीत के दावेदार भारत के अलावा दूसरे दिग्गज देश थे। चाइना ताईपे, मलेशिया और डेनमार्क तगड़े दावेदारों में शामिल थे। भारत के विजयी सफर में चाइना ताईपे, मलेशिया और डेनमार्क भी थे।

डेनमार्क इस बार सबसे बड़ा दावेदार था। इन सब टीमों के बीच भारत की टीम की स्थिति वैसी ही थी जैसे 1983 के विश्वकप क्रिकेट में भारतीय क्रिकेट टीम की थी। भारत के लिए डेनमार्क को पराजित करना महत्त्वपूर्ण था। डेनमार्क की टीम में दुनिया के नंबर 1, नंबर 3 और नंबर 13 की रैंकिंग के खिलाड़ी थे। ऐसे में टीम बहुत मजबूत थी। इस मजबूत टीम के खिलाफ भारत ने कड़े संघर्ष में 3-2 से जीत हासिल की।

इंडानेशिया सबसे मजबूत दावेदार था जिसने जापान, चीन, कोरिया जैसी टीमों को हराया था। पहले ही मैच में लक्ष्य ने दुनिया के पांच नबर के खिलाड़ी और तोक्यो ओलंपिक में कांस्य पदक विजेता को पराजित कर सबको आश्चर्यचकित कर दिया। दूसरे मैच में स्वस्तिक और चिराग ने पहला गेम हारने के बाद दोनों गेम जीत कर भारत के लिए खिताब तय कर दिया। अंतिम एकल मैच मे श्रीकांत ने जोनाथन क्रिस्टी को सीधे गेमों में हराकर भारत के लिए इतिहास रच दिया।

भारतीय शटलरों को यह नहीं पता था कि उन्होंने क्या हासिल कर लिया। 1949 से खेले जा रहे रहे थामस कप में भारत को पहली बार खिताब दिलाकर उन्होंने करोड़ों भारतीयों को दिल जीत लिया। पूरा भारत जब क्रिकेट के आइपीएल में खोया हुआ था तो इस खबर ने भारतीयों को क्रिकेट की गेंद से शटल की ओर मोड़ दिया। लोग हाथों हाथ सोशल मीडिया पर थामस कप और भारत की जीत को खोजने में लग गए।

प्रकाश पादुकोन के आल इंग्लैंड बैडमिंटन जीतने के बाद शटल की दुनिया में यह भारत की पहली बड़ी जीत है। इस जीत का कैनवास बड़ा है। इस जीत को भुनाना होगा। इस जीत को पूरे देश में ले जाना होगा। लोगों को बताना होगा कि यह जीत कितनी बड़ी है। इस देश में बहुत से लोग हैं जिनको यह पता नहीं है कि थामस कप क्या है और इसका महत्व क्या है। बहुत से लोगों को थामस कप और उबेर कप का अंतर पता नहीं होगा।

यह भारतीय बैडमिंटन प्रशासकों की जिम्मेदारी बनती है कि वे इस जीत को पूरे देश में ले जाएं और युवाओं को बताए कि यह कितनी बड़ी जीत है। गोपीचंद जैसे और प्रशिक्षकों को नए लक्ष्य दें। इस जीत से एक रोडमैप तय हो जाना चाहिए। आने वाले ओलंपिक में महिलाओं के साथ पुरुषों से भी पदक की उम्मीद होनी चाहिए। भारतीयों को जो डेनमार्क और इंडानेशिया पर बढ़त मिली है उसको आने वाले टूर्नामेंटों में कायम रखा जाना चाहिए। यह जीत बड़ी है और इस जीत को और बड़ी करने की जरूरत है।

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