भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) अध्यक्ष मिथुन मन्हास ने जम्मू-कश्मीर क्रिकेट में आए बदलाव को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि उनके लिए धर्म या क्षेत्र नहीं, बल्कि क्रिकेट सबसे ऊपर है। इंडियन एक्सप्रेस के आइडिया एक्सचेंज (Idea Exchange) में मिथुन मन्हास ने बताया कि एक समय जम्मू और कश्मीर घाटी के खिलाड़ियों के लिए 8-8 का कोटा हुआ करता था, लेकिन वह कभी इस सोच में विश्वास नहीं करते थे।
मिथुन मन्हास का मानना है कि टीम में जगह सिर्फ प्रतिभा और प्रदर्शन के आधार पर मिलनी चाहिए। मिथुन मन्हास ने यह भी कहा कि रणजी ट्रॉफी जीत के बाद जम्मू-कश्मीर में क्रिकेट को लेकर नई लहर आई है। अब दूर-दराज के इलाकों के बच्चे भी इस खेल में अपना भविष्य देख रहे हैं।
मिथुन मन्हास से इंडियन एक्सप्रेस के नेशनल स्पोर्ट्स एडिटर संदीप द्विवेदी ने पूछा, ‘‘आपके सात महीने के बीसीसीआई अध्यक्ष कार्यकाल में सबसे बड़ी चुनौती क्या रही?’’
मिथुन मन्हास: यह साल बहुत ही ज्यादा व्यस्त और चुनौतियों से भरा रहा है। पहले महिला वर्ल्ड कप, उसके बाद महिला प्रीमियर लीग, फिर पुरुषों का T20 वर्ल्ड कप और आखिर में आईपीएल। हालांकि, मैं इस भूमिका में अभी नया हूं, लेकिन मेरे लिए सौभाग्य की बात है कि मुझे BCCI (बीसीसीआई) में अपने साथियों से बहुत अच्छा सहयोग मिला है।
मुझे ICC (इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल) के अध्यक्ष श्री जय शाह का मार्गदर्शन भी मिला, जो उस समय बीसीसीआई के प्रमुख थे। उनकी समझ और सहयोग मेरे लिए बहुत कीमती रही है। सिर्फ बीसीसीआई में ही नहीं, बल्कि जब मैंने 2021 में जम्मू-कश्मीर क्रिकेट एसोसिएशन (JKCA) जॉइन किया था तब भी और अब भी उन्होंने मेरा मार्गदर्शन किया।’’
संदीप द्विवेदी: रणजी ट्रॉफी जीत का जम्मू-कश्मीर में खेल से बाहर क्या असर पड़ा? यह जीत वहां के लोगों के लिए क्या मायने रखती है?’
मिथुन मन्हास: जब हम रणजी ट्रॉफी का फाइनल खेल रहे थे तो बाजार खाली थे, क्योंकि हर कोई अपने-अपने टेलीविजन सेट से चिपका हुआ था। ऐसा कोई घर नहीं था जहां फाइनल न देखा जा रहा हो। यह जीत न सिर्फ क्रिकेट में हमारी मदद करेगी, बल्कि युवाओं के लिए भी बहुत फायदेमंद साबित होगी।
यहां बहुत संघर्ष है। हर लड़के और लड़की की अपनी एक कहानी है। मुझे लगता है कि यह जीत हमारे लिए कुछ बहुत ही खास मायने रखती है। अब लोगों को यह विश्वास होने लगा है कि जम्मू-कश्मीर के लड़के और लड़कियां क्रिकेट के ज़रिये जीवन में आगे बढ़ सकते हैं। दूर-दराज के इलाकों से माता-पिता अपने बच्चों को क्रिकेट सेंटर्स में भेज रहे हैं।
जरा सोचिए, आज हमारे पास गुरेज की एक लड़की है जो ट्रेनर बनना चाहती है। लद्दाख, कारगिल, गुरेज़, चिनाब घाटी, पुंछ, राजौरी और सीमावर्ती इलाकों के खिलाड़ी क्रिकेट खेलना चाहते हैं। यह एक ऐसी लहर है जिसने पूरे जम्मू-कश्मीर को अपने में ले लिया है। इसका विशेष श्रेय जय भाई को जाता है, क्योंकि वह अकेले ऐसे व्यक्ति थे जिन्हें यह विश्वास था कि हम ऐसा कर सकते हैं। हमने उनसे जो कुछ भी मांगा, उन्होंने हमें दिया और आज हम यहां हैं- 2026 के रणजी ट्रॉफी चैंपियन। ऐसा करने वाला यह सिर्फ 11वां एसोसिएशन है।
संदीप द्विवेदी: क्या क्रिकेट ने जम्मू और कश्मीर के बीच की ‘-’ वाली दूरी को खत्म करने में मदद की है?
यहां प्रश्न का भाव यह है कि क्या क्रिकेट ने जम्मू और कश्मीर घाटी को अलग-अलग पहचान, अलग सोच या अलग गुटों के रूप में देखने वाले विभाजन को एक टीम और एक पहचान में बदला?
मिथुन मन्हास: पहले के जमाने में जम्मू के क्रिकेटरों और कश्मीर घाटी के क्रिकेटरों के लिए 8-8 का कोटा हुआ करता था। मैं इसमें कभी विश्वास नहीं करता था। मेरे लिए इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप किस धर्म को मानते हैं। मेरा धर्म क्रिकेट है और वही सबसे आगे होना चाहिए। मैं जब भी बोलता हूं, तो मैं इसे JK कहता हूं, कभी भी J&K नहीं। टीम चयन में क्षेत्र या धर्म नहीं, बल्कि प्रतिभा और प्रदर्शन को महत्व दिया जाना चाहिए। मेरे लिए क्रिकेट सबको जोड़ने का माध्यम है।
संदीप द्विवेदी: दुनिया भर के क्रिकेट में भारत की मौजूदगी लगातार बढ़ रही है। दुनिया की ज्यादातर लीग में भारतीय या भारतीय मूल के क्रिकेट उद्यमियों की टीमें हैं। क्या आपको लगता है कि भारतीय खिलाड़ियों को भी इन लीग में खेलने की मंजूरी मिलनी चाहिए?
मिथुन मन्हास: यह एक बहुत ही अहम सवाल है, लेकिन इसके पीछे कई वजहें हैं। इंटरनेशनल क्रिकेट का शेड्यूल बहुत ज्यादा व्यस्त होता है, जिसके बाद एक लंबा घरेलू सीजन और फिर जबरदस्त IPL होता है। इसके अलावा कई राज्यों की अपनी T20 लीग भी होती हैं। इसका मतलब है कि खिलाड़ी लगभग पूरे साल क्रिकेट में ही व्यस्त रहते हैं। हमारा मकसद यह है कि हमारा घरेलू क्रिकेट सिस्टम मजबूत बना रहे।
ऐसा तभी हो सकता है, जब हमारे अनुभवी खिलाड़ी घरेलू लीग में युवा खिलाड़ियों के साथ खेलें। वे अपना अनुभव साझा करते हैं और इसी तरह हमारा सिस्टम आगे बढ़ता है, इसलिए इस समय हमारे खिलाड़ियों को विदेशी T20 लीग में खेलने की मंजूरी देना एक मुश्किल फैसला होगा। यह उनकी मानसिक और शारीरिक सेहत से भी जुड़ा है, ताकि जब भी वे भारत के लिए खेलें तो पूरी तरह से तरोताजा रहें।
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