मैरी कॉम का कोई सानी नहीं

मैरी कॉम की फिटनेस आज भी किसी युवा मुक्केबाज के लिए प्रेरणा है। उन्हें देखकर कोई यह अंदाजा नहीं लगा सकता कि वह तीन बच्चों की मां हैं। रिंग में जितनी दमदार वह विरोधी पर पंच बरसाती हैं उतनी ही तेजी से उसके प्रहार से खुद को बचाती भी हैं।

बॉक्सिंग क्वीन मैरी कॉम। (फोटो – पीटीआई)

संदीप भूषण

कहा जाता है, भट्ठी में तपकर सोना और भी चमकदार हो जाता है। कुछ ऐसा ही भारत की दमदार मुक्केबाज एमसी मैरी कॉम के साथ है। शनिवार को समाप्त हुई 10वीं आइबा विश्व चैंपियनशिप में इस मुक्केबाज ने छठी बार खिताब जीत कर इतिहास रच दिया। उन्होंने 48 किलो ग्राम वर्ग में उक्रेन की हना ओखाटा को 5-0 से शिकस्त दी और स्वर्ण पदक पर कब्जा जमाया। यह कारनामा करने वाली मैरी दुनिया की अकेली महिला मुक्केबाज बन गई हैं। वहीं इस जीत के साथ ही उन्होंने क्यूबा के पुरुष मुक्केबाज फेलिक्स सेवोन की भी बराबरी कर ली है। फेलिक्स के भी मैरी के बराबर विश्व चैंपियनशिप में सात पदक (छह स्वर्ण और एक रजत) हैं।

गरीबी को मात देकर रिंग की रानी बनीं मैरी
मैरी कॉम के लिए इस बुलंदी तक पहुंचना आसान नहीं था। एक मार्च 1983 को उत्तर-पूर्वी राज्य मणिपुर के चुराचांदपुर जिले के काडथेइ गांव के गरीब परिवार में जन्मी मैरी बचपन से ही एथलेटिक्स में दिलचस्पी रखती थीं। हालांकि 2000 में डिंको सिंह ने उन्हें मुक्केबाज बनने के लिए प्रेरित किया। घर वाले मैरी के इस फैसले के खिलाफ थे। साथ ही छोटे से गांव में उस स्तर की सुविधाएं भी नहीं थीं जिससे वह अंतरराष्ट्रीय मुक्केबाज बनने का सपना पूरा कर सकें। मैरी ने हार नहीं मानी और अपनी लगन व मेहनत की बदौलत घर वालों को तो झुकने पर मजबूर किया ही साथ ही दिखा दिया कि जुनून के सामने मुश्किलें नहीं टिक सकतीं। उन्होंने महिला मुक्केबाजी में अपनी अगल पहचान बनाई और आज रिंग की रानी बनी हुई हैं।

मैरी को यूं ही नहीं कहा जाता सुपर मॉम
मैरी कॉम का करिअर चरम पर था जब 2007 में उन्होंने जुड़वां बच्चों को जन्म दिया। मां बनना किसी के लिए भी सुखद अहसास है लेकिन इसके तुरंत बाद रिंग में वापसी के लिए तैयार मैरी को जबरदस्त झटका लगा। दरअसल, मैरी कॉम 2008 के विश्व चैंपियनशिप में खेलना चाहती थीं। ट्रायल के लिए जब वह कोच के पास पहुंचीं तो उन्हें कहा गया कि अगर तुम फिट नहीं हो तो घर जाकर बैठो, मुक्केबाजी करने की जरूरत नहीं। कोच के इस व्यवहार ने उन्हें फौलाद बनने पर मजबूर कर दिया। यह समय था जब उन्हें अपने घरेलू जीवन और रिंग में से किसी एक को चुनना था। मैरी ने रिंग को चुना और अपनी लगन और मेहनत से 2008 में चीन की रिंग्बो सिटी में अपना चौथा विश्व चैंपियनशिप खिताब जीता।

मैरी की जिद ने भारत को दिया एक मुकम्मल मुक्केबाज
जुड़वां बच्चों को जन्म देने के बाद जब मैरी कॉम ने रिंग में उतरने का फैसला लिया तो उनके पति भी उनके इस फैसले से नाराज थे। वे चाहते थे कि बच्चे कुछ बड़े हो जाएं तब वह रिंग में उतरें। साथ ही उस दौरान कमजोरी और पूरी तरह फिट न होना भी समस्या थी। मैरी ने इन दोनों को मनाया और सफलता की कहानी को दोहराया। लेकिन एक सवाल है कि अगर उस वक्त मैरी रुक जातीं तो क्या होता? इसक एक ही जवाब है कि भारत अपने कई पदक खो देता। उस दौर से आगे बढ़कर मैरी कॉम ने 2010 विश्व चैंपियनशिप में स्वर्ण, 2010 एशियाई खेलो में कांस्य, 2012 ओलंपिक में कांस्य, 2014 एशियाई खेलों में स्वर्ण और 2018 राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीता।

एक उम्दा खिलाड़ी के साथ कर्मठ राजनेता
मैरी कॉम की फिटनेस आज भी किसी युवा मुक्केबाज के लिए प्रेरणा है। उन्हें देखकर कोई यह अंदाजा नहीं लगा सकता कि वह तीन बच्चों की मां हैं। रिंग में जितनी दमदार वह विरोधी पर पंच बरसाती हैं उतनी ही तेजी से उसके प्रहार से खुद को बचाती भी हैं। मैरी अपने फिटनेस का खास ख्याल रखती हैं। राज्यसभा के लिए मनोनित होने के बाद भी उन्होंने अपने अभ्यास और खेल से कोई समझौता नहीं किया। एक तरफ जहां सचिन तेंदुलकर और रेखा जैसी हस्तियों के राज्यसभा में अनुपस्थित रहने पर सवाल उठते हैं वहीं मैरी कॉम सदन में हमेशा उपस्थित रहती हैं।

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