खेलनामा की किताबगाथा के पिछले अंक ‘मैं मुस्लिम हूं, बाकी हिंदू’, जब सलीम दुर्रानी की बात सुन टाइगर पटौदी ने दी थी जान से मारने की ‘धमकी’ में आपने पढ़ा कि सलीम दुर्रानी से फिल्म अभिनेता सैफ अली खान के पिता मंसूर अली खान पटौदी क्यों खफा रहते थे?’टाइगर’ पटौदी को लगता था कि सलीम दुर्रानी ने कभी अपनी जबरदस्त प्रतिभा के साथ न्याय नहीं किया।
इस अंक में हम आपको बताएंगे कि ‘टाइगर’ पटौदी को एक आंख गंवा देने से क्या दिक्कत होती थी? लोग उनके बारे में क्या कहते थे? वरिष्ठ खेल पत्रकार प्रदीप मैगजीन ने अपनी किताब ‘नॉट जस्ट क्रिकेट’ में इसके बारे में लिखा है। एक जुलाई 1961 को इंग्लैंड में एक कार हादसे में ‘टाइगर’ पटौदी ने अपनी दाहिनी आंख की रोशनी खो दी थी।
‘टाइगर’ ने सिखाया कि देश का प्रतिनिधित्व करने का मतलब
प्रदीप मैगजीन लिखते हैं, ‘जब मैं मिला तो पटौदी 60 साल के हो चुके थे और अपने बारे में बात करने में हिचकिचाते थे। टीम के लिए उनके बड़े विजन या भारतीय क्रिकेट को उसके शुरुआती दौर में उन्होंने कितनी बहादुरी से संभाला इस बारे में कहानियां सुनने को मिलती थीं। उनके तैयार किए गए खिलाड़ियों में से एक बिशन सिंह बेदी यह कहते नहीं थकते कि ‘टाइगर’ ने सिखाया कि देश का प्रतिनिधित्व करने का क्या मतलब है। हालांकि, यह पूछने पर कि उनकी कप्तानी के दौरान इंडियन क्रिकेट में क्या दिक्कतें थीं ‘टाइगर’ बात मोड़ देते थे।’
अड़ियल खिलाड़ी और कप्तान
प्रदीप मैगजीन लिखते हैं, ‘पटौदी को लेकर मुझे अनुभव हुआ कि वह अड़ियल खिलाड़ी और कप्तान थे। उनके साथ मेरी लंबी बातचीत से मुझे यह साफ हो गया कि वह शायद ही कभी अपने क्रिकेट का मजा लेते थे, खासकर इंग्लैंड में एक कार एक्सीडेंट में एक आंख चली जाने के बाद। उस चोट के बाद उन्होंने जो कुछ भी किया उसमें पहले से ज्यादा शारीरिक और मानसिक मेहनत की जरूरत थी। वह दोबारा क्रिकेट खेलने के लिए की गई कड़ी मेहनत के बारे में बात करने में बहुत हिचकिचाते थे।
पटौदी तो सुनना पड़ता था ताना
प्रदीप मैगजीन लिखते हैं, ‘दुर्घटना के बाद बल्लेबाजी करना बहुत मुश्किल हो गया था, क्योंकि वह कभी भी गेंद की लाइन को लेकर आश्वस्त नहीं हो पाते थे। उन्होंने याद करते हुए कहा, ‘मुझे कभी भी गेंद की लाइन का पक्का पता नहीं होता था। मुझे गेंद की लाइन के बाहर खेलना पड़ता था। एकाग्रता काफी जरूरी होती थी। जब बॉल प्ले में नहीं होती थी, तब भी मैं आराम नहीं कर सकता था, क्योंकि इससे मेरी एकाग्रता पर असर पड़ता था। अगर मैं फेल हो जाता तो लोग कहते, ‘एक आंख से अंधे आदमी से और क्या उम्मीद कर सकते हैं।’ जब मैं सफल होता तो लोग कहते, ‘वह अपनी एक आंख की रोशनी जाने के बारे में झूठ बोलता है।’ पटौदी की निराशा इस बात से साफ थी कि लोग उनके बारे में कितनी गलत बातें करते थे।’
प्रशासकों की नाकाबिलियत और बेरुखी
प्रदीप मैगजीन लिखते हैं, ‘कैप्टन के तौर ‘टाइगर’ को हमेशा भारत में क्रिकेट प्रशासकों की नाकाबिलियत और बेरुखी से निपटना पड़ता था। उन्होंने इंग्लैंड में एक ज्यादा बेहतर व्यवस्था देखा था। उन्होंने स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटी और काउंटी क्रिकेट खेला था। वह विंचेस्टर में अपने स्कूल के एक बहुत अच्छे खिलाड़ी थे। इसके कारण उन्हें विंचेस्टर में एक बोर्डिंग स्कूल में चुना गया था।
नवाब के बेटे से जूता साफ कराया
प्रदीप मैगजीन लिखते हैं, ‘पटौदी ने बाताय कि यह स्कूल एलीट क्लास को एक आम, सादगी भरा जीवन और अनुशासन की अहमियत सिखाने के लिए था।’ उन्होंने स्क्वैश में अपने सीनियर को चैलेंज किया और हराया था तो उनकी पिटाई हुई थी। एक नवाब का बेटा होने के बावजूद उनसे अपने सीनियर्स के जूते पॉलिश करवाए गए थे, लेकिन वह क्रिकेट में सबसे अच्छे थे। विशेषज्ञों का मानना था कि दुर्घटना से पहले ‘टाइगर’ के पास एक महान बल्लेबाज बनने की क्षमता था। वह चोट लगने के बाद भी टेस्ट क्रिकेट खेलने में कामयाब रहे। वह एक बेहतरीन क्लास के बैट्समैन थे।
कप्तान के तौर पर दिक्कत
प्रदीप मैगजीन लिखते हैं, ‘पटौदी ने देश के लिए खेलने और कप्तानी करने के सम्मान पर जोर नहीं दिया। वह काफी समस्याओं का सामना करते थे। इसके कारण वह सोचते थे कि क्या यह करने लायक है। उन्होंने कहा, ‘कई बार, मैंने खुद से पूछा कि मैं क्यों खेल रहा हूं? दिव्यांगता के साथ बल्लेबाजी करना मेरे लिए आसान नहीं था। इसके ऊपर से मुझे ऐसे लोगों से निपटना पड़ता था, जो सिर्फ अपने बारे में सोचते रहते थे!’
भारत और क्रिकेट जगत से जुड़ी रोचक कहानियों के लिए जनसत्ता के साथ जुड़े रहें। अगले भाग में बताएंगे कि बवाल के बाद कोलकाता में भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) की गुजारिश पर सैफ अली खान यानी मंसूर अली खान पटौदी ने कैसे गैरी सोबर्स को खेलने के लिए मनाया था।
सौरव गांगुली की ‘दादागिरी’
सौरव गांगुली को भारतीय क्रिकेट का ‘दादा’ यूं ही नहीं कहा जाता था। मैदान पर उनका आक्रामक अंदाज कई बार विवादों का कारण बना। स्टीव वॉ, एंड्रयू फ्लिंटॉफ और ग्रेग चैपल से जुड़े विवादों के अलावा उनके करियर की 5 ऐसी घटनाएं हैं, जिन्होंने उनकी बेबाक कप्तानी और व्यक्तित्व की अलग तस्वीर पेश की। पूरी खबर पढ़ें।
