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दिग्गज का संन्यास! क्या खत्म हो गया लिएंडर पेस का करिअर?

लिएंडर पेस ने 16 साल की उम्र में पहली बार मार्च-अप्रैल 1990 में जापान के खिलाफ डेविस कप मुकाबले में हिस्सा लिया था।

Author September 20, 2018 5:19 AM
कोच और सपोर्ट स्टाफ की आम सहमति से लिएंडर पेस का डेविस कप टीम से पत्ता कट गया।

श्रीशचंद्र मिश्र

कोच और सपोर्ट स्टाफ की आम सहमति से लिएंडर पेस का डेविस कप टीम से पत्ता कट गया। इसे 45 साल के पेस के करिअर पर अंतिम मुहर लगना भी माना जा सकता है। करीब 29 साल का सफर इस तरह खत्म होगा, किसी ने सोचा नहीं था। हालांकि कुछ साल से जिस तरह उन्हें विवादों के केंद्र में खड़ा किया गया, उससे यह संकेत मिल गया था कि संघ और टीम में वे स्वीकार्य नहीं रहे। रही सही कसर पेस ने जकार्ता के एशियाई खेलों से अंतिम समय में नाम वापस लेकर पूरी कर दी। इसी साल चीन के खिलाफ डेविस कप के युगल मुकाबले में जीत कर पेस ने दिखा दिया था कि 29 साल के सफर में भी उनकी ऊर्जा कम नहीं हुई। तियानजिन में हुए एशिया-ओसियानिया ग्रुप एक के दूसरे राउंड के इस मुकाबले में पेस 43वीं जीत के साथ विश्व रेकार्ड बनाने में तो कामयाब हुए ही, टीम के साथियों रामकुमार रामनाथन और प्रजनेश में ऐसा आत्मविश्वास भरा कि दोनों ने उलट एकल जीत कर भारत को विश्व ग्रुप के प्लेऑफ में पहुंचा दिया। विडंबना यह है कि इतने सफल और अनुभवी खिलाड़ी को अब बाहर बैठना पड़ रहा है। हर खिलाड़ी के खेल जीवन पर कभी न कभी विराम लगता है। पर ऐसे तो नहीं?

लिएंडर पेस ने 16 साल की उम्र में पहली बार मार्च-अप्रैल 1990 में जापान के खिलाफ डेविस कप मुकाबले में हिस्सा लिया था। तब से वे भारतीय टीम का अनिवार्य हिस्सा रहे। इस दौरान उन्होंने कई उल्लेखनीय सफलताएं पाईं। 29 साल में कई खिलाड़ी आए-गए। पेस लगातार डटे रहे। डेविस कप मुकाबले में हिस्सा लेने को वे हमेशा तत्पर रहे। यह सिलसिला टूट गया है। आगे जुड़ पाएगा, इसकी उम्मीद नहीं है। कुछ साल में पेस को कई बार अप्रिय स्थितियों का सामना करना पड़ा। 2016 में रियो द जिनेरियो (ब्राजील) में हुए ओलंपिक खेलों में पेस लॉन टेनिस के पुरुष युगल या मिश्रित युगल में अथवा दोनों में हिस्सा ले पाएंगे या नहीं, यह तय नहीं हो पा रहा था। इसका निर्धारण दो आधार पर होना था। एक, विश्व रैकिंग में तब की स्थिति पेस को किस स्पर्धा के लिए अहर्ता दिलाती है? दूसरा, टेनिस संघ किस जोड़ी को चुनता है? हालांकि टेनिस संघ की ऐसे मामलों में ज्यादा चलती नहीं, यह 2012 में लंदन में हुए ओलंपिक खेलों के वक्त जाहिर हो गया था। तब महेश भूपति व सानिया मिर्जा जैसे स्टार खिलाड़ियों की जिद चली थी। पेस का रियो में सातवां ओलंपिक था। भारतीय संदर्भ में यह एक नया रेकॉर्ड था। पिछला रेकॉर्ड राजा रणधीर सिंह के नाम है जिन्होंने निशानेबाजी में लगातार छह ओलंपिक खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व किया था। इस नए रेकॉर्ड से पहले एक और रेकॉर्ड पेस के नाम के साथ पहले से जुड़ा हुआ था। उनके पिता डॉक्टर वेस पेस उस हॉकी टीम के सदस्य थे जिसने 1972 के म्यूनिख ओलंपिक में कांस्य पदक जीता था।

24 साल बाद पेस ने 1996 में अटलांटा ओलंपिक में लॉन टेनिस में कांस्य पदक जीत कर उस सफलता को दोहरा दिया। भारत के लिए ओलंपिक पदक जीतने वाली पिता-पुत्र की यही एकमात्र जोड़ी है। दिलचस्प संयोग यह है कि म्यूनिख ओलंपिक में पेस की मां जेनिफर ने भी हिस्सा लिया था। वे बास्केटबॉल टीम की सदस्य थीं। अपने सातवें ओलंपिक में पेस का लक्ष्य स्वर्ण पदक जीतना था, लेकिन टीम में चली उठापटक ने उन्हें अपना सपना पूरा नहीं करने दिया। युगल में सौ से ज्यादा जोड़ीदारों के साथ करीब साठ टूर्नामेंट जीत चुके पेस को मलाल रहेगा कि वे अभी तक ओलंपिक में युगल स्पर्धा का कोई पदक नहीं जीत पाए। बहरहाल, लिएंडर पेस रियो ओलंपिक को अपने सफर का अंतिम पड़ाव मानने को तैयार नहीं हैं। रिटायर होने के लिए उन्होंने असल में कोई सीमा तय ही नहीं की है। उनका मानना है कि खेलते रहने की इच्छा हो और खिलाड़ी को अपनी मानसिक व शारीरिक क्षमता का पता हो तो उम्र उसके लिए बाधा नहीं बन सकती।

1998 में 25 साल की उम्र में पेस ने न्यूपोर्ट (अमेरिका) में एकल का अपना एकमात्र डबल्यूटीए टूर्नामेंट जीता था। लेकिन जल्दी ही उन्हें समझ में आ गया कि उनकी तकनीक एकल के लिए उपयुक्त नहीं है। लिहाजा उन्होंने युगल पर अपना ध्यान केंद्रित कर दिया। बड़े लक्ष्य कभी सामने नहीं रखे। शुरू में पांच ग्रैंड स्लैम जीतने पर ध्यान लगाया। वह पड़ाव तय कर लिया तो दस खिताब को कसौटी बना लिया। बढ़ते-बढ़ते 1999 से 2016 तक ग्रैंड स्लैम खिताबों की संख्या 18 तक पहुंच गई। अब इसे 20 तक बढ़ाने का पेस का विचार है। उन्हें लगता है कि दो-तीन साल और खेल कर वे इस मंजिल को भी पार कर लेंगे। उसके बाद जो मन और शरीर कहेगा, पेस मानेंगे।

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