पिता ने क्रुणाल पंड्या को 6 साल की उम्र में ही क्रिकेटर बनाने का लिया था फैसला, छोड़ना पड़ा शहर; ट्रायल मैच ने बदला करियर

क्रुणाल के पिता का निधन जनवरी 2021 में हुआ था। वे अपने दोनों बेटों को क्रिकेटर बनाना चाहते थे और उसमें सफल भी हुए। क्रुणाल भारत के लिए टी20 मैचों में खेल चुके हैं।

Krunal Pandyaक्रुणाल पंड्या मुंबई इंडिय्ंस के लिए 71 टी20 मैचों में खेल चुके हैं। (सोर्स – इंस्टाग्राम)

भारतीय क्रिकेट टीम के लिए 18 टी20 मैच खेल चुके क्रुणाल पंड्या का क्रिकेटर बनने का सफर आसान नहीं रहा है। वे जब 6 साल के तब ही उनके पिता हिमांशु पंड्या ने उन्हें क्रिकेटर बनाने का फैसला किया था। यहां तक कि उन्होंने अपने शहर को भी छोड़ दिया था। क्रुणाल के पिता का निधन जनवरी 2021 में हुआ था। वे अपने दोनों बेटों को क्रिकेटर बनाना चाहते थे और उसमें सफल भी हुए। एक इंटरव्यू में उन्होंने इस बारे में बहुत सारी बातें कही थीं।

क्रिकबज को दिए इंटरव्यू में क्रुणाल के पिता ने कहा था, ‘‘पीछे पुराने घर में कई सारे भावनाएं हैं। वहां की कई कहानियां हैं। बच्चों ने भी काफी स्ट्रगल किया था। पहले मैच सूरत में था। क्रुणाल 6 साल का था। वहां घर में एक पैसेज था। क्रुणाल वहां खेला करता था और मैं गेंद फेंकता था। इसके नेचुरल खेल को देखकर लगा कि ये अच्छा प्लेयर बन सकता है। सूरत में जिमखाने में प्रैक्टिस करते थे। एक बार वहां किरण मोरे आए थे तो उन्होंने क्रुणाल की बल्लेबाजी देखी थी। उन्होंने कहा था कि इसे वड़ोदरा लेकर आइए। इसके बाद मैंने इसका नाम किरण मोरे एकेडमी में लिखवाया था।’’

क्रुणाल ने इसके बाद कहा, ‘‘मैं जब 13 साल का था क्रिकेट के प्रति पूरी तरह समर्पित था। इसका पूरा श्रेय पापा को जाता है। उन्होंने 6 साल की उम्र में खेल देखकर शहर बदलने का फैसला किया था। ऐसा मैंने कम ही सुना है। 13 साल के बच्चे जब दिन भर में 2 घंटे बल्लेबाजी करते हैं तो उनमें काफी बदलाव आता है। इसके उलट 13 साल के बाद मेरा ग्राफ नीचे गिरने लगा था। पापा ने कभी इस बारे में नहीं कहा। उनके सपोर्ट से ही मैं और हार्दिक यहां तक पहुंचे हैं।’’

क्रुणाल ने इसके बाद कहा, ‘‘एक समय था कि मेरे पास कोई दूसरा ऑप्शन नहीं बचा था। मैं 23-24 साल का हो गया था। उस समय तक रणजी ट्रॉफी नहीं खेला था। वड़ोदरा के लिए भी कोई टूर्नामेंट नहीं खेल पाया था। जब मैं 23 साल का था तो अंडर-23 का मैच खेल रहा था। वड़ोदरा और कर्नाटक के बीच मैच था। मैच का चौथा और आखिरी दिन था। हमें मैच बचाना था। मैं गलत शॉट खेलकर आउट हो गया। इसके बाद जब घर गया तो काफी रोया। मुझे लगा कि मैंने क्या किया है अब तक। अपने पैरेंट्स को क्या खुशी दी? मुझे लगा कि क्रिकेटर तो दूर की बात है मैं अच्छा इंसान भी नहीं हूं। दूसरों से जलता हूं, दूसरों के बारे में बुरा सोचता हूं। मैं बहाने बनाता हूं। फिर मैंने पहले अच्छा इंसान होना तय किया।’’

क्रुणाल ने आगे कहा, ‘‘जब मैंने अच्छा इंसान बनने के बारे में सोचा तो जीवन के प्रति सोच बदलने लगी। यह मेरे क्रिकेट पर दिखने लगा। उस समय स्पीड पोस्ट की सरकारी नौकरी निकली थी। उसी समय मुझे सैयद मुश्ताक अली ट्रॉफी के ट्रायल के लिए बुलाया गया था। पिता ने मुझसे नौकरी के बारे में कहा कि बेहतरीन मौका है 25-30 हजार की सैलरी मिल जाएगी। मैंने ऑफर लेटर फाड़ दिया। मैंने मेहनत क्रिकेटर बनने के लिए किया था, नौकरी के लिए नहीं। ट्रायल के बाद मुझे सैयद मुश्ताक अली ट्रॉफी के लिए वड़ोदरा की टीम में चुना गया था। टूर्नामेंट के मैच मुंबई में थे। जॉन राइट वहां आए थे। उन्होंने मुझे और हार्दिक को देखा। फिर हमारी किस्मत बदल गई।’’

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