कभी स्कूल की प्रार्थना सभा में अपनी लंबाई और डील-डौल को लेकर झिझकने वाली एक लड़की आज अमेरिका के इनडोर एरीना में भारत का परचम लहरा रही है। 23 वर्षीय कृष्णा जयशंकर ने 17.09 मीटर के ऐतिहासिक थ्रो के साथ न सिर्फ अपना ही राष्ट्रीय रिकॉर्ड तोड़ा, बल्कि NCAA इनडोर चैंपियनशिप के लिए क्वालिफाई करने वाली पहली भारतीय महिला एथलीट भी बन गईं।

बास्केटबॉल के दिग्गज माता-पिता की इस बेटी के लिए यह सफर सिर्फ पदक जीतने का नहीं, बल्कि समाज की तय की गई ‘खूबसूरती’ की परिभाषा बदलने का है। कभी अपने शरीर को लेकर असहज महसूस करने वाली यह एथलीट आज ताकत, आत्मविश्वास और बदलाव का प्रतीक बन चुकी है।

रिकॉर्ड उनके नाम जुड़ते जा रहे हैं। वह हर थ्रो के साथ खुद और आने वाली पीढ़ियों के लिए रास्ता तैयार कर रही हैं। यह उस लड़की की कहानी है जिसने अपने गुस्से और अकेलेपन को ताकत में बदला और आज उन तमाम लड़कियों के लिए मिसाल है जो अपनी शारीरिक बनावट के कारण खुद को कम आंकती हैं।

सर्दियों की एक शाम अमेरिका के एक इनडोर एरिना में कृष्णा जयशंकर थ्रोइंग सर्कल में उतरीं। माउंटेन वेस्ट कॉन्फ्रेंस चैंपियनशिप (NCAA डिवीजन 1 मीट) में 17.09 मीटर के थ्रो के साथ उन्होंने भारतीय इनडोर राष्ट्रीय रिकॉर्ड को फिर से स्थापित किया। कृष्णा ने सिर्फ पिछले एक साल में ही भारत के इनडोर रिकॉर्ड को 16.03 से बढ़ाकर 16.63 मीटर, फिर 16.83 मीटर और अब 17 मीटर की सीमा के पार पहुंचा दिया। यह उस खेल में एक जबरदस्त प्रगति है, जहां आमतौर पर सुधार को सेंटीमीटर में मापा जाता है।

वैसे कृष्णा जयशंकर की असली ताकत समझने के लिए रिकॉर्ड्स और स्टेडियम से भी बहुत पहले उनके घर से शुरुआत करनी होगी। वोगइंडिया की खबर के अनुसार, कृष्णा जयशंकर एक ऐसे परिवार में पली-बढ़ीं जहां खेल पढ़ाई के बीच में डाली जाने वाली कोई अतिरिक्त गतिविधि नहीं, बल्कि जीवन का अभिन्न अंग था। उनके पिता जयशंकर सी मेनन भारतीय बास्केटबॉल टीम के पूर्व कप्तान और एशियाई ऑल-स्टार रह चुके हैं। मां प्रसन्ना भारतीय महिला राष्ट्रीय बास्केटबॉल टीम की पूर्व कप्तान हैं।

कृष्णा ने अपना जीवन खेल के मैदानों, प्रतियोगिताओं और सामुदायिक खेल विकास के इर्द-गिर्द ही बुना था। खाने की मेज पर होने वाली बातचीत रिपोर्ट कार्ड के बजाय आराम के कार्यक्रम, मानसिक दृढ़ता और अनुशासन के इर्द-गिर्द घूमती थी। कृष्णा के मुताबिक, पारंपरिक अर्थों में कभी कोई दबाव नहीं था। लेकिन स्पष्टता थी। अगर आप कुछ चुनते हैं तो आप पूरी तरह से समर्पित हो जाते हैं। कृष्णा के पिता को याद है कि उन्होंने उनकी इस मानसिकता को बचपन में ही पहचान लिया था।

जयशंकर सी मेनन के मुताबिक, बचपन से ही हमने उसकी दृढ़ इच्छाशक्ति और जुझारू भावना देखी है। रिकॉर्ड मायने रखते हैं, लेकिन चुनौतियों का सामना करने का साहस उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। उसकी मां खेल को त्याग के नजरिये से देखती हैं। खेल चार ‘डी’ पर आधारित है: अनुशासन (डिसिप्लिन), लगन (डिवोशन), दृढ़ संकल्प (डिटरमिनेशन) और समर्पण (डेडिकेशन)। इन सिद्धांतों पर चलने के लिए आपको कुछ चीजों का त्याग करना पड़ता है। कृष्णा ने भी ऐसा ही किया है। लेकिन जब आप उसे रिकॉर्ड तोड़ते हुए देखते हैं, तो हर त्याग सार्थक लगता है।’

कृष्णा जयशंकर का सफर आसान नहीं रहा। पांचवीं कक्षा तक आते-आते वह अपने ज्यादातर सहपाठियों से लंबी और चौड़ी हो चुकी थीं। कहा जाए तो इससे कोई नुकसान नहीं था, लेकिन उन्हें चुपचाप सबसे अलग कर देती थी। एक ऐसी संस्कृति में जहां नारीत्व को अक्सर कोमलता से जोड़ा जाता है, कृष्णा का मजबूत शरीर लोगों का ध्यान खींचता था। कृष्णा स्वीकारती हैं, ‘मुझे याद है कि मैंने खुद को ड्रेस में देखा और मुझे अपना रूप पसंद नहीं आया। मुझे समझ नहीं आता था कि मेरा शरीर दूसरी लड़कियों के शरीर जैसा क्यों नहीं हो सकता।’

फिर टिप्पणियाँ और तुलनाएं शुरू हो गईं। धीरे-धीरे,कृष्णा का शरीर उन्हें ऐसा लगने लगा जिसमें सुधार की जरूरत है, न कि उसे सराहे जाने की। एक दिन स्कूल में लंच ब्रेक के दौरान अचानक एक ऐसा मोड़ आया, जब फिजिकल एजुकेशन टीचर तिरुमलई जोथी ने उन्हें शॉट पुट फेंकने वालों की तलाश करते हुए एक शॉट पुट थमा दिया।

कृष्णा ने उसे उठाया, फेंका और कुछ बदल गया। वह याद करते हुए कहती हैं, ‘यह मुझे अपनी भावनाओं को बाहर निकालने का एक जरिया लगा। मेरा सारा गुस्सा, सारी उलझन, वह सब कुछ जो मैं कह नहीं पाती थी, मैं उस एक थ्रो में झोंक सकती थी।’ सर्कल के अंदर, कृष्णा का शरीर अब कोई समस्या नहीं रहा, बल्कि ताकत बन गया।

19 साल की उम्र में कृष्णा ने स्कॉलरशिप पर भारत छोड़कर पहले जमैका और बाद में यूनाइटेड स्टेट्स का रुख किया। जमैका और US कॉलेजिएट सर्किट में मुकाबला करते हुए कृष्णा जयशंकर का सामना उन महिलाओं से हुआ जिनका शरीर उन्हीं जैसा गठीला, ताकतवर और मजबूत था। उनमें उन्हें अपना समुदाय मिल गया। कृष्णा जयशंकर ने बताया, ‘पहली बार, मैंने देखा कि मेरे जैसे शरीर की तारीफ की जा रही है। इससे सब कुछ बदल गया।’

अब अपने नाम के आगे 17.09 मीटर का रिकॉर्ड जुड़ने के बाद वह खुद से चार सवाल पूछती हैं। तुम कौन हो? तुम खुद को कैसे परिभाषित करती हो? तुम यह क्यों कर रही हो? तुमने क्या त्याग किया है? उनके जवाब कई परतों वाले हैं।

कृष्णा कहती हैं, ‘मैं एक भारतीय महिला हूं जो एक ऐसे पावर स्पोर्ट में आगे बढ़ रही है, जिसका मेरे देश से शायद ही कभी कोई जुड़ाव रहा हो। मैं विदेश में भारतीय थ्रोअर्स के लिए रास्ते खोल रही हूं। मैं एक ऐसी युवा महिला हूं, जिसे कभी लगता था कि इस दुनिया में अपनी जगह बनाने के लिए उसे खुद को छोटा करना पड़ेगा। मैं उस लड़की के लिए थ्रो करती हूं जो मैं कभी हुआ करती थी।’

कृष्णा जयशंकर अब 18 मीटर के लक्ष्य की ओर बढ़ना चाहती हैं और बड़ी अंतरराष्ट्रीय चैंपियनशिप के लिए क्वालिफाई करना चाहती हैं। वह भारत के लिए वैश्विक मंचों पर पोडियम पर खड़ी होना चाहती हैं। हालांकि, एक और लक्ष्य भी उनके लिए उतना ही गहरा महत्व रखता है।

वह कहती हैं, ‘अगर कोई छोटी लड़की मुझे देखे और सोचे, यह तो बिल्कुल मेरी जैसी दिखती है, शायद मैं भी यह कर सकती हूं, तो मेरे लिए बस यही सब कुछ है। ताकत खूबसूरत होती है। पावर में भी नारीत्व होता है।’

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