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आकलन: ‘खेलो इंडिया’ से भी ओलंपिक में शीर्ष 10 बनना मुश्किल

इंडोनेशिया के जकार्ता और पालेमबांग में हुए एशियाई खेलों में भारत ने 69 पदकों के साथ इतिहास रचा। यह पहली बार था जब उसके खाते में इतने पदक आए।

Author September 20, 2018 5:04 AM
अगर देश अपने यहां खेल सुविधाओं को बढ़ावा दें तो कम जनसंख्या में भी बेहतर खिलाड़ी तैयार किए जा सकते हैं।

संदीप भूषण

इंडोनेशिया के जकार्ता और पालेमबांग में हुए एशियाई खेलों में भारत ने 69 पदकों के साथ इतिहास रचा। यह पहली बार था जब उसके खाते में इतने पदक आए। इसमें 15 स्वर्ण, 24 रजत और 30 कांस्य पदक शामिल थे। भारतीय खिलाड़ियों के इस प्रदर्शन को 2020 ओलंपिक से जोड़ कर देखा जाने लगा है। साथ ही विजेताओं पर धनवर्षा भी हुई। अब जब खिलाड़ी अपने देश लौट चुके हैं तो यह आकलन करने का उचित समय है कि क्या सचमुच भारत ने अपने पुराने रेकॉर्ड में सुधार किया है और उसके इस प्रदर्शन को उम्दा की श्रेणी में रखा जाए।

दरअसल, एशियाई खेलों में हर साल कोई नया देश और नए खेल हिस्सा बनते रहे हैं। जकार्ता खेल में भी 26 नए खेल शामिल किए गए। इसमें इंडोनेशियाई मार्शल आर्ट वाला पेनसाक सिलाट भी है जिसमें मेजबान देश के 14 स्वर्ण पदक आए तो ब्रिज भी शामिल है जिसने भारत को सोना दिलाया। अब सिर्फ पदक तालिका से यह तय करना मुश्किल है कि आखिर इस बार भी आठवें स्थान पर रहकर भारत ने कैसे अपने प्रदर्शन को वैश्विक स्तर पर सुधारा है। 2014 एशियाई खेलों में भी भारत आठवे स्थान पर ही रहा था लेकिन तब उसके खाते में 11 स्वर्ण, 10 रजत और 36 कांस्य सहित केवल 57 पदक ही आए थे। इस लिहाज से केवल पदकों की संख्या बढ़ जाने को हम प्रदर्शन में वृद्धि नहीं मान सकते।

1951 से अब तक कुल पदकों में भारत की हिस्सेदारी : एशियाई खेलों में भारत की प्रगति को मापने के लिए खेलों के कुल पदकों में उसके हिस्से को जानना होगा। इस मोर्चे पर भारत ने थोड़ी तरक्की की है। जहां 2014 खेलों में उसे कुल पदक का 3.9 फीसद हिस्सा ही मिला था वहीं 2018 में यह लगभग 4.4 पहुंच गया। हालांकि बात जब स्वर्ण पदकों की होगी तो उसे 2018 में सिर्फ 3.23 फीसद हिस्सा ही मिला है जो 1951 में 26.3 था। पहले एशियाई खेलों से अभी तक भारत के खाते में कुल पदकों के चार फीसद पदक ही आए हैं। आंकड़ों के मुताबिक भारत पदक जीतने के मामले में चीन, दक्षिण कोरिया और जापान से पीछे है। अब तक हुए एशियाई खेलों में पदक का 56 फीसद हिस्सा इन्हीं तीन देशों के पास हैं।

2018 खेलों में भारत के प्रदर्शन को 1951 के बाद का बेहतरीन प्रदर्शन कहना भी हकीकत से मुंह मोड़ना ही है। हां, यह जरूर है कि उसने 1982 एशियाई खेलों के बाद सबसे अच्छा प्रदर्शन किया है। 1951 में इस प्रतियोगिता में आठ देशों ने हिस्सा लिया था जिसमें भारत के खाते में कुल पदकों का 30.2 फीसद हिस्सा आया था। वहीं 1982 में उसे 9.3 फीसद पदक मिले थे। 2010 में यह 4.1 था तो वहीं 2014 में यह 3.9 पर पहुंच गया। 2018 एशियाई खेलों में उसके खाते में 4.4 फीसद पदक आए। कम क्यों है पदकों में हिस्सेदारी : भारत में बीते कुछ साल में खेल को लेकर काफी जागरूकता देखने को मिली है। सरकार ने भी इसमें भागीदारी निभाई है और खेलों की उन्नति के लिए तमाम नई योजनाओं को शुरू किया है। इनमें से सबसे ज्यादा प्रभावी खेलो इंडिया को माना जा रहा है। इसके तहत सरकार उभरते खिलाड़ियों को वित्तीय मदद पहुंचाती है। लेकिन क्या यही काफी है हमें ओलंपिक में शीर्ष दस तक पहुंचाने के लिए? तो इसका जवाब नहीं में होगा।

दरअसल, 2008 में हुए एक अध्ययन के मुताबिक ओलंपिक में सफलता के लिए देश की प्रति व्यक्ति जीडीपी और उसकी जनसंख्या जिम्मेदार है। भारत ने भी इन्हीं को ओलंपिक सफलता का पैमाना माना है। खेलो इंडिया भी इसी से प्रेरित है। दरअसल, ज्यादा जनसंख्या वाले देश में प्रतिभाओं की भरमार होती है। उसे सही तरह से तैयार कर देश अपने पदकों की संख्या बढ़ा सकता है। जनसंख्या के लिहाज से भारत ने 2018 एशियाई खेलों में प्रति दस लाख लोगों पर 0.05 फीसद पदक जीते हैं। वहीं कई ऐसे देश हैं जिनकी जनसंख्या कम होने के बावजूद उनकी पदकों में हिस्सेदारी बेहतर है। यानी सिर्फ जनसंख्या ज्यादा होने से कोई फायदा नहीं, उसके साथ देश में प्रति व्यक्ति आय भी ज्यादा होनी चाहिए।

पदक तालिका में निगाह दौड़ाएं तो कम जनसंख्या और बेहतर जीडीपी वाले कतर और सिंगापुर जैसे देशों ने पदक के मामले में ज्यादा जनसंख्या वालों से अच्छा किया है। कतर के जहां प्रति दस लाख पर पांच पदक हैं, वहीं सिंगापुर ने लगभग चार पदक जीते हैं। संयुक्त अरब ने भी प्रति दस लाख जनसंख्या पर एक से ज्यादा पदक जीते हैं। यानी यह साफ है कि अगर देश अपने यहां खेल सुविधाओं को बढ़ावा दें तो कम जनसंख्या में भी बेहतर खिलाड़ी तैयार किए जा सकते हैं।

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