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सुशील : जो पाया सो गंवाया

2015 तक छत्रसाल स्टेडियम अखाड़ा महाबली सतपाल के नियंत्रण में रहा। उनके समर्पण, मेहनत और कड़े अनुशासन के बीच जूनियर स्तर के पहलवानों की पौध तैयार होने लगी। विश्व कैडेट चैंपियनशिप हो या विश्व जूनियर, इस अखाड़े के पहलवान पदक बटोर कर लाने लगे। इस अखाड़े में द्रोणाचार्य रामफल, यशवीर और वीरेंद्र जैसे कोचों ने पहलवान निखारने में खूब काम किया। नतीजन सुशील, योगेश्वर दत्त, प्रवीण, बजरंग पूनिया जैसे ढेरों प्रतिभाशाली पहलवान अखाड़े की प्रतिष्ठा बढ़ाने लगे।

दिल्ली पुलिस की गिरफ्त में अजय कुमार और सुशील कुमार।

पहलवान सुशील आज सुर्खियों में हैं। पहले भी थे। पर तब अपनी कुश्ती कला और उपलब्धियों के कारण। आज हैं इसके ठीक उलट। जूनियर पहलवान सागर की हत्या का उन पर आरोप है। साथ ही गैंगस्टर के साथ रिश्तों को लेकर भी। यह अकल्पनीय है। एक दशक पहले वाला एक शालीन इंसान, एक मेहनती और जुझारू पहलवान, अपने सपनों को साकार करने के प्रति कृतसंकल्प। लेकिन उसमें आए बदलाव ने सभी को हैरत में डाल दिया है।

कुश्ती करिअर में ढेरों सफलताएं उसके नाम हैं। कोई घमंड नहीं। मिलना तो चरण छूकर सम्मान देना। बातचीत का सिलसिला कुश्ती तक ही सीमित रखना। लेकिन आज जब नए खुलासे हो रहे हैं तो चौंकना स्वाभाविक है। आखिर ऐसी क्या मजबूरी हो गई कि उसने अपनी राह बदल ली। 2010 में विश्व चैंपिनय बनना, दुनिया का नंबर एक पहलवान कहलाना, 2008 के बेजिंग और 2012 के लंदन ओलंपिक में पदक जीतकर भारतीय कुश्ती की साख बढ़ाना। सफलताओं के बाद पैसों की बरसात से किस्मत का बदलना-सबकुछ तो ठीक चल रहा था।

इनामी धनराशि कम नहीं थी। प्रतिष्ठा बनी, हर कोई उन्हें सम्मान की नजर से देखता था। कुश्ती को देने के लिए उनके पास अनेक विकल्प थे। ओएसडी के तौर पर छत्रसाल स्टेडियम की बादशाहत उनके पास थी। अपार अनुभव भी था और वह प्रशासनिक तौर पर कुश्ती की सेवा भी कर सकते थे। देश में उनकी जोड़ का कोई दूसरा पहलवान नहीं था। अंतरराष्ट्रीय होने के नाते वे कोच की भूमिका निभाने के भी काबिल था। अपने गुरु पद्मश्री सतपाल का दामाद होने का अतिरिक्त लाभ भी था।

पर उन्होंने ऐसी राह चुन ली जिसने भारतीय कुश्ती को कलंकित कर दिया। उनकी अपनी साख भी खराब हुई और उस छत्रसाल स्टेडियम पर सदा के लिए कलंक लग गया जो उनके गुरु महाबली सतपाल की तपस्या से फलीभूत हुआ था। 1988 में अखाड़े की शुरुआत हुई। 90 के दशक से ही सतपाल के मन में धुन सवार हो गई थी कि इस अखाड़े से ओलंपिक पदक विजेता पहलवान निकालने हैं। यह सतपाल का ही नहीं, उनके गुरु हनुमान का भी सपना था। पर हनुमान अखाड़ा गुरुजी के जीते जी यह सपना साकार नहीं कर पाया।
वास्तव में दिल्ली में अखाड़े तो बहुत थे पर अंतराष्ट्रीय स्तर के पहलवान उभारने के केंद्र केवल गुरु हनुमान अखाड़ा और मास्टर चंदगीराम अखाड़ा ही थे। बाद में कैप्टन चांदरूप अखाड़े ने भी कुछ अच्छे पहलवान दिए। इसलिए सबकी निगाहें छत्रसाल स्टेडियम पर टिक गई थीं। सतपाल चूंकि खुद भी एशियाई स्वर्ण पदक विजेता पहलवान थे, इसलिए पहलवानों की जरूरतों, उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर की सुविधाएं मुहैया करवाने में उन्होंने पहल की।

2015 तक यह अखाड़ा महाबली सतपाल के नियंत्रण में रहा। सतपाल के समपर्ण, मेहनत और कड़े अनुशासन के बीच जूनियर स्तर के पहलवानों की पौध तैयार होने लगी। विश्व कैडेट चैंपियनशिप हो या विश्व जूनियर, इस अखाड़े के पहलवान पदक बटोर कर लाने लगे। इस अखाड़े में द्रोणाचार्य रामफल, यशवीर और वीरेंद्र जैसे प्रशिक्षकों ने पहलवान निखारने में खूब काम किया। नतीजन सुशील, योगेश्वर दत्त, प्रवीण, बजरंग पूनिया जैसे ढेरों प्रतिभाशाली पहलवान अखाड़े की प्रतिष्ठा बढ़ाने लगे।

फिर आया 2008 का वह ऐतिहासिक पल जिसने अखाड़े की प्रतिष्ठा को चार चांद लगा दिए। सुशील ने बेजिंग ओलंपिक में कांस्य पदक जीतकर लंबे अर्से से चला आ रहा पदक का सूखा समाप्त किया। 1952 में हेलासिंकी ओलंपिक के बाद सुशील पहले भारतीय पहलवान बने जिसने कुश्ती में देश को पदक दिलाया। इस पदक से छत्रसाल स्टेडियम की लोकप्रियता बढ़ गई। बड़ी संख्या में आसपास के राज्यों से पहलवान अभ्यास के लिए आने लगे। चार साल बाद जब 2012 के लंदन ओलंपिक में सुशील के रजत और योगेश्वर के हिस्से कांस्य पदक आया तो इस अखाड़े की चमक और फैल गई।

मेहनत खिलाड़ी को सफलता की राह पर डालती है। सफलता मिलने पर उसे मिलता है नाम। नाम और उपलब्धियां। उसे दिलाती हैं बड़े-बड़े सम्मान। सम्मान मिलने से उसका रुतबा बढ़ता है, चाहत बढ़ती है। खिलाड़ी का नाम भुनाने जब बड़ी-बड़ी कंपनियां उससे जुड़ती हैं तो माया का खेल शुरू होता है। पैसा आता है तो खिलाड़ी उसकी चकाचौंध में उलझता है। जाने-अनजाने कदम गलत राह पर भी पड़ जाते हैं। लेकिन अपने स्टारडम के नशे में खिलाड़ी बेपरवाह हो जाता है जो उसे पतन की तरफ ले जाता है। ऐसा सभी खिलाड़ियों के साथ नहीं होता लेकिन सुशील अपवाद बन गए।

सुशील ने ऊंचाइयों को पाया, सम्मान मिला, इनाम मिला। लेकिन कुश्ती करिअर बनाने में सुशील को अनेक वर्ष लगे। लेकिन उनकी एक भूल ने सारी तपस्या बेकार कर दी। खुद को सभी की नजरों में गिरा लिया। अखाड़े का नाम डुबो दिया। रेलवे से नौकरी छूट सकती है। नुकसान के इस दौर में सबसे बड़ा दर्द तो गुरु सतपाल को मिला जिसके पूरे जीवन की पू्ंजी अखाड़े की प्रतिष्ठा को बनाने में लगी। सतपाल मकसद में तो कामयाब हुए पर सुशील की हरकत से उनकी साख पर भी चोट पहुंची।

सुशील कुमार की उपलब्धि
1998 : जूनियर विश्व कैडेट खेलों में सुशील ने स्वर्ण पदक जीत कर अपने हुनर का परिचय दिया।
2003 : एशियन कुश्ती चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक हासिल किया।
2005 : राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक हासिल किया।
2006 : दोहा एशियाई खेलों में सुशील कुमार ने कांस्य पदक हासिल किया।
2008 : बेजिंग ओलंपिक में कांस्य पदक जीतकर इतिहास रचा।
2010 : मॉस्को विश्व चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीत कर देश का नाम रोशन किया।
2010 : राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक अपने नाम किया सुशील ने
2012 : लंदन ओलंपिक में सुशील ने पदक का रंग बदला और रजत पदक जीत कर कुश्ती के साथ भारत का नाम रोशन किया।
2014 : ग्लास्गो राष्ट्रमंडल खेलों में भी शानदार खेल से स्वर्ण जीता।
2018 : गोल्ड कोस्ट राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण से हैट्रिक लगाई।
2009 : खेल के सबसे बड़े सम्मान राजीव गांधी खेल रत्न से नवाजा गया सुशील को
2011 : कुश्ती में बेहतरीन योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया।
2010 : राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान सुशील के प्रदर्शन के लिए उन्हें ‘मोस्ट पॉपुलर एथलीट’ चुना गया।

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