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आकलन: क्या लौटेगा वेस्ट इंडीज का स्वर्ण काल? 1976 से 1995 तक क्रिकेट में कैरेबियाई टीम का एकछत्र राज रहा

क्रिकेट को वैश्विक खेल बनाने की चाहे जितनी भी कोशिशें हों लेकिन यह सच है कि आज भी ब्रितानी राज वाले ही ज्यादातर देश इस खेल में आगे हैं। वेस्ट इंडीज भी उनमें से एक है। टापुओं के समूह पर जब क्रिकेट शुरू हुआ तो इसके कप्तान और ज्यादातर खिलाड़ी अंग्रेज होते थे।

Author Published on: February 7, 2019 5:53 AM
वेस्ट इंडीज क्रिकेट का लोगो। (प्रतीकात्मक तस्वीर)

संदीप भूषण

कैारेबियाई टीम वेस्ट इंडीज एक समय क्रिकेट की दुनिया का बेताज बादशाह थी। 21वीं शताब्दी की शुरुआत के साथ ही इस देश का क्रिकेट के मैदान पर दबदबा कम होने लगा। एक ऐसा वक्त भी आया जब उसे विश्व कप में शीर्ष की आठ टीमों में जगह बनाने के लिए भी जद्दोजहद करनी पड़ी। दो बार विश्व चैंपियन रही इस टीम का टैस्ट में भी बुरा हाल हो गया। अभी वेस्ट इंडीज ने टैस्ट की नंबर एक टीम इंग्लैंड की उस टीम को अपने मैदान में करारी शिकस्त जिसने भारत को पिछले दिनों 4-0 से रौंदा था। इस जीत से एक बार फिर यह चर्चा होने लगी है कि क्या 70 से 90 के दशक तक क्रिकेट जगत पर राज करने वाले इस उत्तर मध्य अमेरिकी टापुओं के समूह का वर्चस्व लौट आएगा? दरअसल, वेस्ट इंडीज ने इंग्लैड के खिलाफ महज जीत दर्ज नहीं कि बल्कि अपने खोए सम्मान को हासिल करने की जंग जीती है। तीन मैचों की टैस्ट शृंखला के पहले मैच में 381 रन और दूसरे में 10 विकेट की बड़ी जीत हासिल करना आसान नहीं था। एक तरफ अनुभवहीन और युवा कैरेबियन टीम थी तो दूसरी ओर इंग्लैंड की दिग्गज टीम। मुकाबले से पहले क्रिकट के पंडितों ने यह तय किया था कि वेस्ट इंडीज एक मैच भी जीत जाए तो बड़ी बात होगी। लेकिन, ठीक इसके उलट जैसन होल्डर की टीम ने इंग्लिश टीम को धूल चटा दी।

दूसरे मैच में जीत के साथ सीरीज पर कब्जा जमाने वाली टीम के कप्तान होल्डर ने मैच के बाद कहा कि हमें इस जीत की काफी जरूरत थी। उन्होंने बातों ही बातों में अपनी व्यथा व्यक्त की लेकिन यह भी संदेश दिया कि चाहे कितनी भी मुश्किलें आएं उनके रणबांकुरे मजबूती से सामना करेंगे। क्यों खास है यह जीत: वेस्ट इंडीज का क्रिकेट में एक इतिहास रहा है। उन्हें इस खेल का शक्ति पुंज माना जाता था। दुनिया की जितनी भी क्रिकेट खेलने वाली टीमें थीं वे इससे खौफ खाती थीं। यह टीम किसी टीम को हराती नहीं थी बल्कि कुचल देती थी। आंकड़ों को देखें तो 1976 से 1995 तक इस टीम ने कुल 137 टैस्ट मैच खेले जिसमें सिर्फ 18 मैचों में उसे हार मिली। 71 मैचों में इस द्वीप समूह टीम ने जीत दर्ज की। 1980 के दशक में एक ऐसा भी दौर आया जब उसने लगातार 27 टैस्ट मैच जीते, यह आज भी किसी टीम के लिए रेकॉर्ड है। 1980 से 1995 तक कैरेबियाई टीम ने कोई सीरीज नहीं गंवाई। अब इसी टीम ने इंग्लैंड को दो टैस्ट में ढेर कर दिया। क्या यह माना जाए कि कैलिस्पो संगीत और क्रिकेट की संगत फिर अपने रंग में लौटने वाली है या यह महज एक टैस्ट सीरिज भर की जीत है।

अंग्रेजी हुकूमत पर जीत मान रहे हैं कैरेबियाई लोग: क्रिकेट को वैश्विक खेल बनाने की चाहे जितनी भी कोशिशें हों लेकिन यह सच है कि आज भी ब्रितानी राज वाले ही ज्यादातर देश इस खेल में आगे हैं। वेस्ट इंडीज भी उनमें से एक है। टापुओं के समूह पर जब क्रिकेट शुरू हुआ तो इसके कप्तान और ज्यादातर खिलाड़ी अंग्रेज होते थे। जब इस खेल में जॉर्ज हेडली जैसे स्थानीय खिलाड़ियों का उदय हुआ तो यहां के लोगों ने भी इस खेल में दिलचस्पी बढ़ाई। धीरे-धीरे स्थानीय खिलाड़ियों ने टीम में जगह बनाई। उस समय इस टीम में ‘तीन व’ खूब चर्चित हुए। ये तीनों एवर्टन विक्स, क्लाइड वालकॉट और फ्रैंक वारेल थे। 1960 में पहली बार इस टीम को कोई गैर-ब्रिटिश कप्तान मिला और वे थे फ्रैंक वारेल। यह एक बड़ी उपलब्धि थी। उसके बाद से टीम ने धीरे-धीरे अपनी धाक जमाई और अब जब उसने इंग्लैंड को मात दी है तो यहां के लोग इसका खुलकर जश्न मना रहे हैं।

ऐसा दबदबा पहले कभी न दिखा: 60 के दशक के बाद विंडीज टीम डगमगाने लगी थी। उसे कुछ पराजयों का सामना करना पड़ा। 70 के दशक के मध्य में वेस्ट इंडीज की कमान युवा क्लाइव लॉयड ने संभाली। टीम में कई युवा और होनहार खिलाड़ी शामिल थे। यह वही दौर था जब विव रिचर्ड्स, ग्रॉर्डन ग्रीनिज और तेज गेंदबाज एंडी रॉबर्ट्स का उदय हुआ। 1975 में टीम ने एक दिवसीय विश्व कप जीता लेकिन तुरंत बाद आस्ट्रेलिया दौरे पर उन्हें डेनिस लिली और जैफ थामसन जैसे तूफानी गेंदबाजों के कारण 1-5 से हार का भी सामना करना पड़ा। इससे सबक लेते हुए लॉयड ने तय किया कि वे तेज गेंदबाजी को ही अपने दबदबे का हथियार बनाएंगे। उसके बाद से वेस्ट इंडीज की टीम में हर तरह की पिच पर तेज गेंदबाजों की चौकड़ी उतरने लगी। एंडी राबर्ट्स, माइकल होल्डिंग, जोएल गार्नर, कोलिन कॉफ्ट, मैल्कम मार्शल, टैरी वाल्श, सिलवेस्टर क्लॉर्क ने विपक्षी टीमों को तहस-नहस करके रख दिया। इससे पहले ऐसी तेज गेंजबाजी चौकड़ी कभी देखने को नहीं मिली थी। तब वेस्ट इंडीज के पास गॉर्डन ग्रीनिज, डेसमंड हैंस, एल्विन कालीचरण, क्लाइव लॉयड, विव रिचर्ड्स सरीखे धाकड़ बल्लेबाज थे।

इसी टीम को इंग्लैंड टीम ने 1976 में जीतने की चुनौती दी। तब इंग्लैंड के कप्तान रहे टोनी ग्रेग ने कहा था कि कैरेबियाई खिलाड़ी दबाव में अच्छा नहीं खेल पाते और उन्हें अपनी धरती पर जीत के लिए ललकारा था। जब यह शृंखला शुरू हुई तो इंग्लैंड कहीं मुकाबले में दिखा ही नहीं और वेस्ट इंडीज ने 3-0 से जीत गया। 90 के दशक के अंत तक वेस्ट इंडीज का क्रिकेट में काफी दबदबा रहा लेकिन धीरे-धीरे यह खत्म होने लगा।

फिर वही गेंदबाजी चौकड़ी तैयार कर रहा वेस्ट इंडीज: आइपीएल और अन्य कई लीगों के सामने टैस्ट को बनाए रखना एक बड़ी चुनौती है। वेस्ट इंडीज की टीम भी इसी समस्या से जूझ रही है। उसके ज्यादातर खिलाड़ी या तो लीग खेलने के कारण टीम से खेलने को तवज्जो नहीं दे रहे या फिर अमेरिकी देशों में बास्केटबॉल खेल कर पैसा बनाने में लगे हुए हैं। हालांकि इस सब के बीच इंग्लैंड के खिलाफ यह जीत नई उम्मीद है। इस टैस्ट सीरीज के दौरान जिस तरह से वेस्ट इंडीज के खिलाड़ियों ने गेंदबाजी की वह काबिलेतारीफ है। पहले मैच में इंग्लैंड की दोनों पारियों को 350 सौ रन से नीचे समेटना और 381 रन की जीत दर्ज करना तो यही दर्शाता है कि वह फिर से बेहतरीन गेंदबाजों को तैयार करने में लग गया है। दूसरी पारी में भी 10 विकेट की जीत इसकी गवाही दे रहा है। चाहे बेहतरीन हरफनमौला जैसन होल्डर हों या अब तक 13 विकेट लेने वाले केमार रोच, सबने उम्दा गेंदबाजी की है। उनके पास इन दो तेज गेंदबाजों के अलावा शैनन ग्रैबियन और अलजारी जॉसेफ के रूप में दमदार तेज गेंदबाजी चौकड़ी अब भी मौजूद है। जॉसेफ ने तो इस मैच के दौरान बहादुरी का परिचय भी दिया। मैच के बीच में ही 22 साल के युवा गेंदबाज को उनकी मां की मृत्यु की खबर मिली लेकिन उन्होंने निराश हुए बिना देश को सबसे बेहतरीन जीत दिलाने में योगदान दिया।

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