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उपलब्धि: अब पहलवानी में भी बरसने लगा पैसा

आज एशियाई खेलों का स्वर्ण जीतने वाले पहलवान को 55 से 75 लाख रुपए की सालाना आमदनी हो जाती है। केंद्र, राज्य और उनके महकमों से मिलने वाली इनामी राशि को भी अगर इसमें जोड़ दिया जाए तो यह राशि दो करोड़ रुपए सालाना तक पहुंच जाती है।

Author February 7, 2019 5:30 AM
पहलवान बजरंग पूनिया। (Image Source: Facebook/Bajrang Punia)

मनोज जोशी 

कभी पहलवान मलवा को एशियाई खेलों का स्वर्ण पदक जीतने के बावजूद अपनी आजीविका के लिए सड़कों पर रेहड़ी लगानी पड़ी थी लेकिन आज पूरा परिदृश्य बदल चुका है। आज एशियाई खेलों का स्वर्ण जीतने वाले पहलवान को 55 से 75 लाख रुपए की सालाना आमदनी हो जाती है। केंद्र, राज्य और उनके महकमों से मिलने वाली इनामी राशि को भी अगर इसमें जोड़ दिया जाए तो यह राशि दो करोड़ रुपए सालाना तक पहुंच जाती है। आज भारतीय कुश्ती संघ के टाटा मोटर्स के साथ करार और प्रो रेसलिंग लीग की वजह से पहलवानों की आर्थिक स्थिति में अच्छा खासा सुधार हुआ है और वे अपना पूरा ध्यान अपनी ट्रेनिंग पर लगा सकते हैं। आज क्रिकेट के बाद कुश्ती अकेला ऐसा खेल है जिसमें खिलाड़ियों के लिए सालाना करार राशि तय की गई है जिसके अंतर्गत भारतीय कुश्ती संघ ने खिलाड़ियों को उनके प्रदर्शन के आधार पर पांच श्रेणियों में बांटा है और उन्हें सालाना राशि मुहैया कराई गई है। यह राशि उनके अन्य स्रोतों से हासिल होने वाली राशि से अलग है।

अब ग्रेड ए में बजरंग पूनिया, सुशील, विनेश फोगट, पूजा ढांडा और साक्षी मलिक को रखा गया है जहां उन्हें सालाना 30 लाख रुपए की आमदनी होती है। ग्रेड बी में किसी भी पहलवान को नहीं रखा गया है जबकि ग्रेड सी में एशियाई खेलों की कांस्य पदक विजेता दिव्या काकरान और अंडर 23 की विश्व चैम्पियनशिप की रजत पदक विजेता ऋतु फोगट सहित सात खिलाड़ियों को ग्रेड सी में रखा गया है जहां उन्हें सालाना दस लाख रुपए मिलेंगे। इसी तरह ग्रुप डी में नौ पहलवानों को पांच लाख, ग्रुप ई में चार पहलवानों को तीन लाख और ग्रुप एफ में अंडर 23 के राष्ट्रीय चैम्पियनों को एक लाख 20 हज़ार रुपए की सालाना राशि दी जाती है।

दूसरे प्रो रेसलिंग लीग ने भी पहलवानों की आर्थिक हालत में अच्छा खासा सुधार किया है, जहां अकेले बजरंग पूनिया को पिछले दिनों 30 लाख और विनेश फोगट और साक्षी मलिक को 25-25 लाख रुपए और पूजा ढांडा को 20 लाख रुपए की राशि हासिल हुई। पिछले वर्षों में सीजन 1 में योगेश्वर दत्त को 42 लाख, सीजन 2 में बजरंग पूनिया को 38 और ऋतु फोगट को 36 लाख और सीजन 3 में विनेश फोगट को 40 लाख रुपए हासिल हुए। जब चार साल पहले डब्ल्यूएल शुरू हुआ तो यह अपने आप में चौंकाने वाला तथ्य था कि चंद कुछ घंटों में पहलवानों के लिए 12 करोड़ की खरीद फरोख्त हुई। तब से अब तक पहलवानों की आर्थिक स्थिति में ज़बर्दस्त सुधार हुआ। यहां तक कि कई विदेशी खिलाड़ियों को भी इस लीग की वजह से अपनी आर्थिक स्थिति से उबरने में मदद मिली।

खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में शानदार प्रदर्शन करने पर जो धनराशि केंद्र, राज्य और खिलाड़ियों के संबंधित विभागों से मिलती है, वह इससे अलग है। अकेले हरियाणा सरकार ही कॉमनवेल्थ गेम्स में स्वर्ण जीतने पर डेढ़ करोड़, रजत जीतने पर 75 लाख और कांस्य जीतने पर 50 लाख रुपए की धनराशि देती है। इस तरह खेल मंत्रालय की टॉप्स स्कीम और ओलंपिक गोल्ड क्वेस्ट, जेएसडब्ल्यू आदि तमाम योजनाओं से पहलवानों को जो आर्थिक मदद मिलती है, उन सबको यदि इस इनामी राशि में जोड़ दिया जाए तो एक शीर्ष चार से पांच पहलवानों को अपने विभाग की नौकरी सहित सालाना तकरीबन दो करोड़ रुपए की आमदनी हो जाती है। अगर सरकारी इनामी राशि को अलग भी कर दिया जाए तो भी उन्हें 50 से 70 लाख रुपए की राशि हासिल हो जाती थी।

टॉप्स, ओलंपिक गोल्ड क्वेस्ट और जेएसडब्लू आदि योजनाओं में पहलवानों के लिए किट खरीदने और आधुनिकतम कोचिंग के लिए खर्च की कोई सीमा नहीं है। अकेले टॉप्स स्कीम में ही पहलवानों को 50 हज़ार रुपए महीने की धनराशि मिल जाती है। सुशील और साक्षी को ओलंपिक पदक के बाद जो विज्ञापन मिले, उससे उन्हें जो आय की प्राप्ति हुई, वह अलग है। इसके अलावा भारी वजन के पहलवानों को देश भर में होने वाले दंगलों से भी अच्छी खासी कमाई हुई। अकेले हरियाणा सरकार के शहीदी दंगल से पहलवानों को पुरुषों के पांच और महिलाओं के पांच वजनों में विजेता बनने पर दस-दस लाख रुपए की राशि मिल जाती है। उपविजेता रहने पर पांच लाख मिलते हैं। कुछ साल पहले इसी दंगल में भारी वजन में मौसम खत्री को एक करोड़ रुपए की राशि हासिल हुई थी जो आज तक के इतिहास में एक दंगल से मिलने वाली सबसे अधिक राशि है। बेशक पहलवानों का मान-सम्मान और उनकी आमदनी सब कुछ बढ़ी हो लेकिन यह शीर्ष दर्जे के टेनिस या बैडमिंटन खिलाड़ियों की आय से आज भी बहुत कम है।

क्यों खास है यह
55 से 75 लाख रुपए की सालाना आमदनी हो जाती है एशियाई खेलों का स्वर्ण जीतने वाले पहलवान को
2 रुपए तक पहुंच जाती है राशि अगर इसमें केंद, राज्य व उनके महकमों की इनामी राशि जोड़ दें
भारतीय कुश्ती संघ के टाटा मोटर्स के साथ करार और प्रो रेसलिंग लीग की वजह से पहलवानों की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ है और वे अब पूरा ध्यान ट्रेनिंग पर लगा सकते हैं।

मेरी कोशिश रही है कि पहलवान अपना पूरा ध्यान अपने खेल पर लगाएं और उनकी आर्थिक स्थिति को सुधारने और संसाधन जुटाने का जिम्मा वे फेडरेशन पर छोड़ दें। इस दिशा में और सुधार लाने के लिए प्रयासरत हैं।
– बृजभूषण शरण सिंह

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