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जनसत्ता खेल: नए प्रयोगों के साथ प्रो रेसलिंग लीग का सीजन 4

प्रो रेसलिंग लीग को नए प्रयोगों के लिए जानी जाती है। खिलाड़ियों को ब्लॉक करने से जुड़े तमाम नियमों ने पहलवानों के सोचने-समझने और विपक्षी के हिसाब से अपनी रणनीति बनाने में अहम भूमिका निभाई है। आयोजन के पहले तीन वर्षों में ओलंपिक और विश्व विजेताओं के साथ भारतीय पहलवानों को बहुत कुछ सीखने को मिला है।

Author Published on: January 10, 2019 4:44 AM
बजरंग पूनिया (फाइल)

मनोज जोशी

प्रो रेसलिंग लीग को नए प्रयोगों के लिए जानी जाती है। खिलाड़ियों को ब्लॉक करने से जुड़े तमाम नियमों ने पहलवानों के सोचने-समझने और विपक्षी के हिसाब से अपनी रणनीति बनाने में अहम भूमिका निभाई है। आयोजन के पहले तीन वर्षों में ओलंपिक और विश्व विजेताओं के साथ भारतीय पहलवानों को बहुत कुछ सीखने को मिला है। यहां तक कि गीता, संगीता, संदीप तोमर और पूजा ढांडा ने विश्व विजेताओं को पटखनी देकर भारतीय कुश्ती की पताका दुनिया भर में फैलाने में अहम योगदान दिया है। बृजभूषण शरण सिंह के भारतीय कुश्ती संघ का अध्यक्ष पद संभालने के बाद से भारतीय पहलवानों को वर्ल्ड चैम्पियनशिप में छह और ओलंपिक में तीन पदक हासिल हुए हैं। उनकी प्रयोगधर्मिता का ही यह परिणाम है कि पूजा ढांडा को कुछ साल पहले राज्य चैंपियनशिप में औसत प्रदर्शन के बावजूद राष्ट्रीय शिविर में खेलने का मौका दिया गया और इसका परिणाम सबके सामने है। उसी कुश्ती संघ ने अब प्रयोग के तौर पर प्रो रेसलिंग लीग में कुछ नया करने की हिम्मत जुटाई है।

प्रो स्पोर्टीफाई ने फेडरेशन की सोच का सम्मान करते हुए सिर्फ भारतीय कुश्ती को आगे बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए हैं जिसके अंतर्गत उन भारतीय खिलाड़ियों को तरजीह दी है जिनसे अगले या उससे अगले ओलंपिक में पदक की उम्मीद की जा सके। आज जूनियर वर्ग के कई पहलवान सीनियर वर्ग के पहलवानों को हराने लगे हैं और ऐसे खिलाड़ियों को टीम मालिकों ने इस बार अपनी टीमों में शामिल करके अपनी दूरदर्शी सोच का परिचय दिया है। अभी तक ज्यादातर मौकों पर होता यह था कि ओलंपिक या वर्ल्ड चैंपियन हमारी लीग में खूब पैसा बनाकर और यहां के पहलवानों को पीट-पाटकर चले जाते थे। उनके आने का फायदा इतना जरूर हुआ कि इससे देश में कुश्ती का माहौल बनने में मदद मिली। ग्लैमर का तड़का लगा तो कुश्ती की भी पूछ हुई। पीडब्ल्यूएल के आयोजन में हरभजन सिंह सबके बीच दस पुश-अप करके मुम्बई टीम का हौसला बढ़ाने आते थे तो वहीं रोहित शर्मा यूपी टीम का और जैकी श्राफ वीर मराठा का प्रचार करने आते रहे हैं। विराट कोहली ने पहले सीज़न के उद्घाटन के मौके पर अपने संक्षिप्त भाषण से सबका दिल जीत लिया। बॉलीवुड भी इस आयोजन में पीछे नहीं रहा। धर्मेंद्र, सन्नी और बॉबी देओल के अलावा सोनाली बेंद्रे और गोल्डी बहल की मौजूदगी ने पहलवानों का उत्साह बढ़ाने का काम किया। यह सब कुछ इस बार भी होगा और खूब होगा।

ऐसा नहीं है कि इस बार ओलंपिक, वर्ल्ड चैंपियनशिप और महाद्वीपीय चैंपियनों की कोई अनदेखी की गई है। इस बार हरियाणा हैमर्स की ओर से चुने गए बेलारूस के अली शबानोव मौजूदा वर्ल्ड चैम्पियनशिप के पदक विजेता हैं। मध्य प्रदेश योद्धा में चुने गए हाजी अलीयेव और यूपी दंगल में चुनी गईं वानेसा जैसे पिछले विश्व विजेता इसमें मौजूद हैं। मुम्बई महारथी में चुने गए व्लाडिस्लाव यूरोपीय विजेता हैं जबकि हाजी अलीयेव भी एक अन्य यूरोपीय चैंपियन हैं।

इनके साथ एशियाई खेलों के दो विजेता विनेश और बजरंग पूनिया जहां मुख्य आकर्षण होंगे वहीं एशियाई चैम्पियनशिप का पहला स्वर्ण जीतने वाली पहली भारतीय महिला नवजोत कौर और विश्व चैंपियनशिप में महिलाओं में छह साल बाद पदक जीतने वाली पूजा ढांडा की मौजूदगी लीग का मुख्य आकर्षण होगी। दूसरे, लीग को इस बार देश के कई हिस्सों में आयोजित किया जाएगा और इसके जरिये युवा पहलवानों को आगे बढ़ाने की दिशा में जागरूकता पैदा करने की कोशिश की जाएगी। 14 जनवरी से शुरू होने वाली इस लीग के ये प्रयोग भविष्य में मील का पत्थर साबित हो सकते हैं।

विदेशी खौफ दूर हुआ : बृजभूषण शरण सिंह
हम ओलंपिक पदक जीतने के सिलसिले को आगे बढ़ाना चाहते हैं। हम चाहते हैं कि लीग का अनुभव भारतीय पहलवानों के ज्यादा से ज्यादा काम आए। ठीक उसी तरह जैसे कि पहले आता रहा है। साक्षी मलिक से लेकर पूजा ढांडा को विश्व स्तर पर शानदार प्रदर्शन करने में लीग ने भी मदद पहुंचाई है। इससे भी बड़ी बात यह है कि लीग के जरिये पहलवानों में विदेशी पहलवानों का खौफ खत्म हुआ है।

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