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कोरोना के कारण स्थगित ओलंपिक 2020 का आयोजन 24 जुलाई से जापान के तोक्यो में होगा। चार साल बाद लगने वाले खेलों के महाकुंभ के लिए सभी देशों ने लगभग तैयारियां पूरी कर ली हैं। भारत ने भी अपने ओलंपिक टीम की सूची तैयार कर ली है।

Jansatta special feature pageजापान की राजधानी टोक्यो में ओलंपिक-2020 की तैयारी पूरी हो चुकी है।

कोरोना के कारण स्थगित ओलंपिक 2020 का आयोजन 24 जुलाई से जापान के तोक्यो में होगा। सभी देशों ने लगभग तैयारियां पूरी कर ली हैं। भारत ने भी अपनी ओलंपिक टीम की सूची तैयार कर ली है। रियो दि जिनेरियो में भारत ने 118 सदस्यों का सबसे बड़ा दल भेजा था। हालांकि उसके परिणाम ने देशवासियों को हताश किया। सवा सौ करोड़ आबादी वाले देश को महज दो पदक मिले। जाहिर है कि इससे सबक लेकर तोक्यो ओलंपिक के लिए सरकार से लेकर संघ व कोच ने कड़ी मेहनत की होगी। साथ ही ज्यादा पदक पाने के लिए अपेक्षित रणनीति भी बना ली होगी। ओलंपिक 2016 के बाद हुए राष्ट्रमंडल खेलों और एशियाई खेलों में भारतीय एथलीटों का प्रदर्शन अच्छा रहा है। ऐसे में देश को तोक्यो में पिछले सभी ओलंपिक से ज्यादा पदक की उम्मीद है।

भारत 1900 से ही ओलंपिक में भाग लेने लगा था। फ्रांस के पेरिस में हुए खेलों में भारत को दो रजत पदक भी मिले थे लेकिन जीतने वाला मूल रूप से भारतीय नहीं था। 1920 में पहली बार भारत ने दोराबजी टाटा की मदद से अपनी टीम भेजी। इसके बाद खेलों में भाग लेने का सिलसिला शुरू हो गया। भारत को इस खेल महाकुंभ में लगातार भाग लेते हुए 80 साल हो गए। हमारी अर्थव्यवस्था और युवा जनसंख्या अन्य कई देशों से काफी बेहतर है। लेकिन, हम पदक के मामले में शीर्ष दस में जगह बनाने के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं। सरकार का दावा है कि 2028 ओलंपिक तक देश इस लक्ष्य को हासिल कर लेगा। इसके लिए कई योजनाओं का संचालन किया जा रहा है। साथ ही जमीनी स्तर से खिलाड़ी तैयार करने के लिए टूर्नामेंट का आयोजन हो रहा है। भारत के ओलंपिक सफर और चुनौतियों पर एक रिपोर्ट।

भारत की आजादी और खेल संस्कृति
1920 में बेल्जियम के एंटवर्प में जब खेलों के महाकुंभ की मशाल जलाई जा रही थी तब भारत में महात्मा गांधी आजादी की लड़ाई का बिगुल फूंक चुके थे। तब सारा देश असहयोग आंदोलन में ब्रिटेन के खिलाफ आवाज बुलंद कर रहा था। ऐेसे में खिलाड़ियों के लिए एकाग्रता के साथ प्रतियोगिता में भाग लेना आसान नहीं था। भारत को इस ओलंपिक में एक भी पदक नहीं मिला। 1928 में नीदरलैंड में ओलंपिक में भारतीय हॉकी टीम ने स्वर्ण पदक जीता। इस टीम में मेजर ध्यानचंद, फिरोज खान, अली सौकत जैसे उम्दा खिलाड़ी थे। इसके बाद लगातार छह ओलंपिक में भारत के हॉकी खिलाड़ियों ने देश के लिए स्वर्ण पदक सुनिश्चित किया।

आजाद भारत का पहला स्वर्ण
1947 में भारत आजाद हुआ। अब उसका अपना झंडा था। इसे अगले ओलंपिक में उसी देश की जमीन पर फहराया जाना था जिसने दौ सौ साल तक भारत को गुलाम बनाया। 1948 में लंदन में ओलंपिक खेल हुए। भारतीय हॉकी टीम नीदरलैंड को 2-1 से हरा कर फाइनल में पहुंची। किशन लाल टीम के कप्तान थे। खिताबी भिड़ंत मेजबान देश के साथ थी। फाइनल मुकाबले में भारत ने शानदार प्रदर्शन करते हुए ब्रिटेन को 4-0 से हराया। यह मेजबान के लिए काफी शर्मनाक हार थी। टीम ने आजादी के बाद यह स्वर्ण पदक जीत कर सभी देशवासियों का सिर ऊंचा कर दिया।

यह जीत सिर्फ स्वर्ण पदक के कारण ही खास नहीं थी । भारत आजाद तो हुआ लेकिन अंग्रेजों ने उसे पाकिस्तान के बंटवारे के रूप में ऐसा घाव दिया जिसे आज तक भरा नहीं जा सका है। 1948 की ओलंपिक में भाग ले रही हॉकी टीम के लिए भी यह काफी चुनौतीपूर्ण समय था। कई बेहद मजबूत खिलाड़ी इस बंटवारे में पाकिस्तान चले गए। ऐसे में भारत के लिए इस तरह का खेल दिखाना उसके साहस और जज्बे का परिचय देता है।

हॉकी का स्वर्णिम दौर बना अतीत
ओलंपिक इतिहास में भारत की जब भी चर्चा होगी, हॉकी टीम का नाम गर्व और सम्मान के साथ लिया जाएगा। इसने हमें आठ स्वर्ण पदक सहित कुल 11 पदक दिलाए। मेलबर्न ओलंपिक तक भारतीय हॉकी टीम लगातार छह पदक जीत कर दबदबा बनाए हुए थी। लेकिन यह सिलसिला अगले ओलंपिक में थम गया। इसके बाद 1964 के तोक्यो और 1980 के मास्को ओलंपिक में भारत ने स्वर्ण पदक हासिल किए। इसके बाद करीब 28 साल स्वर्ण पदक के लिए तरस गए।

2008 में अभिनव बिंद्रा ने पहला व्यक्तिगत स्वर्ण पदक जीता। हालांकि इस ओलंपिक में पहली बार 1928 के बाद हॉकी टीम नहीं खेल रही थी। वह इन खेलों के लिए क्वालीफाई नहीं कर सकी थी। वहीं 2006 डोपिंग कांड के बाद भारतीय भारोत्तोलन खिलाड़ी को भी इन खेलों का हिस्सा बनने का मौका नहीं मिला। अभिवन की कामयाबी ने इस दर्द को थोड़ा कम किया। बेजिंग ओलंपिक में ही विजेंदर सिंह और सुशील कुमार ने कांस्य पदक जीता। भारत आर्थिक शक्ति और सामरिक शक्ति के तौर पर दुनिया में उभर रहा है लेकिन इसके बाद ऐसा मौका नहीं आया जब देश स्वर्ण पदक जीतने का जश्न मना सके।

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