अंतरराष्‍ट्रीय महिला दिवस: ‘चलते-चलते’ ओलंपिक तक पहुंच गईं प्रियंका गोस्वामी

ओलंपिक का टिकट हासिल करना किसी भी खिलाड़ी के लिए आसान नहीं होता।

olympicरेकॉर्ड समय से प्रियंका गोस्‍वामी ने हासिल किया ओलंपिक का टिकट। फाइल फोटो।

ओलंपिक का टिकट हासिल करना किसी भी खिलाड़ी के लिए आसान नहीं होता। मेरठ की प्रियंका गोस्वामी ने इस मुकाम को पा लिया है। उन्होंने रांची में आयोजित पैदल चाल चैंपियनशिप 2021 में राष्ट्रीय रेकॉर्ड के साथ स्वर्ण पदक जीता है। साथ ही 2020 तोक्यो के लिए क्वालीफाई किया। देश के लिए पदक जीतने की चाहत में दिन-रात मेहनत कर रहीं प्रियंका का जीवन मुश्किलों से भरा रहा है। लेकिन, उन्होंने कभी हार नहीं मानी।

प्रियंका कहती हैं कि पुरस्कार में एक बैग (लगेज बैग) की चाहत के साथ शुरू हुआ पैदल चाल का सफर अब ओलंपिक में पदक से समाप्त होगा। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर लोगों से बेटियों का सम्मान करने और उन्हें प्रोत्साहित करने की गुजारिश करते हुए उन्होंने कहा कि हमें महिलाओं की हर कामयाबी का जश्न मनाना चाहिए। इससे हमारे आगे बढ़ने और कुछ पाने की चाहत को पंख लग जाते हैं।

प्रियंका ने पैदल चाल में भावना जाट के 1:29:54 घंटे के रेकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया है। उन्होंने 1:28:54 घंटे के समय से राष्ट्रीय रेकॉर्ड बनाया है। 2020 में आयोजित इसी चैंपियनशिप में वह महज 36 सेकंड से ओलंपिक क्वालीफाई करने से चूक गई थीं। प्रियंका ने कहा कि कोरोना के समय में सबकुछ बदल गया। मैं थोड़ी चिंतित भी थी लेकिन कभी प्रयास करना नहीं छोड़ा। ओलंपिक में खेलने के सपने को साकार करने के लिए लगातार मेहनत करती रही। आखिर मेरे सपने को पंख लगे। मैं फिलहाल साई के बंगलुुरु कैंप में अभ्यास कर रही हूं और मुझे पूरा विश्वास है कि भारत के लिए पदक जीतने में कामयाब रहूंगी।

प्रियंका स्कूल के दिनों में जिम्नास्टिक किया करती थीं। उनके पैदल चाल में आने की कहानी भी दिलचस्प है। पुरस्कार के तौर पर एक बैग की चाहत में उन्होंने इस खेल को अपनाया। उनका सपना था कि उन्हें वह बैग मिले जो अन्य खिलाड़ियों को दिए जाते हैं। उन्होंने कहा कि चूंकि मेरठ एक ऐसा शहर है जहां खेल से जुड़े कई सामान बनते हैं।

यहां जिला स्तरीय टूर्नामेंट में खिलाड़ियों को पुरस्कार के तौर पर बैग दिए जाते थे। मैंने भी कई प्रतियोगिताओं में भाग लिया लेकिन कभी पुरस्कार नहीं ले पाई। तब मेरे कोच ने कहा, तुम पैदल चाल में अभ्यास करो। मैंने ऐसा किया और पदक के साथ बैग भी जीते। यहीं से मेरी सफलता की कहानी शुरू होती है। फिलहाल मेरा पूरा ध्यान ओलंपिक पर है। दो-तीन महीने का समय बहुत ज्यादा तो नहीं होता लेकिन मुझे पूरा विश्वास है कि मैं ओलंपिक में बेहतर करूंगी।

रेलवे में कार्यरत प्रियंका पर पूरे घर की जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि किसी भी खेल के लिए आपको मानसिक और शारीरिक तौर पर फिट होना होता है। मैं कैंप के दौरान इन मुद्दों को ध्यान में रखकर ही अभ्यास कर रही हूं। मेरे परिवार की जिम्मेदारी मेरे ऊपर ही है। मैं चाहती हूं कि अन्य राज्यों की तरह उत्तर प्रदेश सरकार भी अपने खिलाड़ियों की मदद करे। टॉप्स योजना के बारे में बात करते हुए प्रियंका ने कहा कि केंद्रीय खेल मंत्री से मुलाकात के दौरान इस बारे में चर्चा हुई है। उन्होंने आश्वस्त किया है कि जल्द ही उन्हें इस योजना के तहत मदद मिलेगी।

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