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…कैसे मिटेगा क्रिकेट पर लगा दाग

भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड सकते में है। न्यायमूर्ति लोढ़ा समिति के फैसले ने क्रिकेट प्रशासक सन्न हैं। फिलहाल इस पर कोई कुछ बोलने को तैयार नहीं। सधी हुई प्रतिक्रिया। लेकिन उनके पास भी जवाब नहीं है कि आइपीएल का क्या होगा। आइपीएल भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड का ब्रांड बन गया है।

भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड सकते में है। न्यायमूर्ति लोढ़ा समिति के फैसले ने क्रिकेट प्रशासक सन्न हैं। फिलहाल इस पर कोई कुछ बोलने को तैयार नहीं। सधी हुई प्रतिक्रिया। लेकिन उनके पास भी जवाब नहीं है कि आइपीएल का क्या होगा। आइपीएल भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड का ब्रांड बन गया है। इस ब्रांड के आगे उसके तमाम दूसरे घरेलू टूर्नामेंट बौने हैं। रणजी ट्राफी से लेकर सैयद मुश्ताक अली टी-20 ट्राफी तक।

आइपीएल को लेकर जितना शोर, जितनी तिकड़म बीसीसीआइ करता रहा है, उसका थोड़ा-सा भी हिस्सा अपने दूसरे घरेलू टूर्नामेंट पर वह करता तो क्रिकेट का भला होता। लेकिन आइपीएल की चकाचौंध ने सबको पीछे छोड़ दिया। इस चमक ने पहले क्रिकेट को अपनी गिरफ्त में लिया और फिर खिलाड़ियों को। न्यायमूर्ति लोढ़ा समिति के फैसले ने इसे साबित किया कि आइपीएल में सब कुछ ठीक नहीं था और मैदान के अंदर और बाहर क्रिकेट के अलावा भी बहुत कुछ खेला जा रहा था। लेकिन इस ह्यखेलह्ण में आइपीएल के मालिक तक शामिल होंगे, ऐसा भला किसने सोचा होगा।

पर हुआ कुछ ऐसा ही। क्रिकेट प्रशासकों की छत्रछाया में आइपीएल में अलग खेल होता रहा और भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के तत्कालीन अध्यक्ष एन श्रीनिवासन इससे आंखें मूंदे रहे। बाद में जब चेन्नई सुपरकिंग्स के मालिक और उनके दामाद मेय्यपन की सट्टेबाजी में गिरफ्तारी हुई तो उन्होंने हर मुमकिन कोशिश की कि मेयप्पन को बचाया जाए। उन्होंने क्रिकेट को बचाने की बजाय अपने दामाद को बचाना ज्यादा मुनासिब समझा। बाद में जब आंच उन तक पहुंची तो क्रिकेट जगत भी उनके बचाव में लगा रहा, जबकि जरूरत क्रिकेट को बचाने की थी।

न्याययमूर्ति लोढ़ा ने साफ कर दिया है कि न तो व्यक्ति क्रिकेट से बड़ा है और न ही खिलाड़ियों और टीमों के व्यवसायिक हित। समिति ने मेयप्पन के अलावा राजस्थान रायल्स के मालिक राज कुंद्रा के खिलाफ भी तीखी टिप्पणी की। राजस्थान रायल्स और चेन्नई सुपरकिंग्स को समिति ने दो साल के लिए निलंबित कर दूसरी टीमों को भी संकेत दिए हैं कि क्रिकेट खेलना है तो उसके नियमों के तहत ही खेला जाना चाहिए। लेकिन आज सबसे बड़ा सवाल यह है कि आइपीएल का क्या होगा। आठ की जगह अब छह टीमें बची हैं और बीसीसीआइ इन छह टीमों को लेकर ही अगला आइपीएल का आयोजन करेगा, या फिर दो नई टीमें आइपीएल का हिस्सा होंगी।

एक आशंका इस बात की भी है कि चेन्नई सुपरकिंग्स और राजस्थान रायल्स की टीमें पिछले दरवाजे से आइपीएल में बने रहने की कोशिश करेंगी। यानी उनके अधिकार किसी और को बेच दिए जाएंगे और टीम नए मालिकों की देखरेख में मैदान पर उतरेगी। अगर ऐसा होता है या बीसीसीआइ ऐसा होने देती है तो फिर क्रिकेट पर लगा दाग और भी गहरा होगा। हालांकि इसकी उम्मीद कम है। इन दो टीमों से जुड़े खिलाड़ियों के भविष्य को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। लेकिन यह सवाल मौजूं इसलिए नहीं लगता कि अगर आइपीएल बचेगा तो फिर महेंद्र सिंह धोनी, सुरेश रैना, आर अश्विन, रवींद्र जडेजा, अजिंक्य रहाणे या संजू सैमसन सरीखे खिलाड़ी किसी भी टीम का हिस्सा बन सकते हैं। सवाल आइपीएल का है। और इससे भी ज्यादा विश्वसनीयता का। लोढ़ा समिति के फैसले ने उसकी विश्वसनीयता को कठघरे में ला खड़ा किया है। इसका जवाब बीसीसीआइ को ही तलाशना होगा।

टीमें तो उसे मिल जाएंगी। आइपीएल में जितना पैसा, ग्लैमर, तड़क-भड़क जुड़ गया है वह बहुतों को लुभा रहा है। दो टीमें मिलने में उसे बहुत दिक्कत नहीं होगी। कोच्चि और पुणे की टीमें फिर से आइपीएल से जुड़ने को लालायित हैं। कुछ दूसरे शहरों की टीमें भी रातोंरात खड़ी हो सकती हैं। कई कारपोरेट घराने बेताबी दिखा रहे हैं। उन्हें तो बस मौके की तलाश है।

बीसीसीआइ उन्हें मौका दे सकता है। खिलाड़ी इन टीमों का हिस्सा हो सकते हैं। लेकिन इन सबसे परे जो महत्त्वपूर्ण बात है, वह यह कि क्रिकेट की साख कैसे बहाल हो। आइपीएल कलंकित हुआ है और बीसीसीआइ की विश्वसनीयता घटी है। तमाम तरह की आशंकाओं के बीच आइपीएल भविष्य में भी जारी रह सकता है लेकिन क्रिकेट पर जो दाग लगा है, बीसीसीआइ उसे आसानी से मिटा पाएगा?

शायद नहीं। पर इससे सीख लेकर बीसीसीआइ बहुत कुछ ऐसा कर सकता है जिससे भविष्य में क्रिकेट पर दाग नहीं लगे। अगर ऐसा होता है तो यह फैसला भारतीय क्रिकेट के लिए नई नजीर साबित हो सकता है। फिलहाल तो निगाहें बोर्ड पर टिकी हैं। देखें, वह क्या कदम उठाता है।

फ़ज़ल इमाम मल्लिक

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