कर्ज, खेत और ख्वाब- यह कहानी किसी फिल्म की स्क्रिप्ट नहीं, बल्कि उस लड़के की सच्चाई है, जिसने मुश्किलों के बीच अपनी रफ्तार खुद बनाई। इंडियन प्रीमियर लीग (Indian Premier League) में 154 किलोमीटर/घंटा की रफ्तार से सबका ध्यान खींचने वाले अशोक शर्मा का सफर त्याग, संघर्ष और जिद की कहानी है।
पिता की सीमित कमाई, बड़े भाई का अपना सपना छोड़ देना… फिर कोच की मौत और कोरोना का लंबा ब्रेक- ऐसे कई मोड़ आए जहां यह कहानी खत्म हो सकती थी, लेकिन हर बार अशोक शर्मा ने रुकने के बजाय और तेज दौड़ना चुना। यह उसी लड़के की कहानी है, जो कभी घर के गलियारे में भाई को मारने के लिए तेज गेंदबाजी करता था और आज उसी रफ्तार से दुनिया को अपनी पहचान बता रहा है।
गलियारे से हुई सफर की शुरुआत
इस कहानी की शुरुआत अशोक शर्मा के घर के बाहर गलियारे से हुई। अशोक शर्मा बड़े भाई अक्षय को गेंदबाजी किया करते थे। उनका एकमात्र लक्ष्य उन्हें गेंद से मारना था और उन्हें मारने का एकमात्र तरीका तेज गेंदबाजी करना था। अक्षय ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया, ‘‘मैं तेज गेंदबाजी कर उसे मारा करता था, इसलिए बदला लेने के लिए उसने भी तेज गेंदबाजी करना शुरू कर दिया ताकि मुझे मार पाए। हमने कभी नहीं सोचा था कि आगे चलकर वह इतना बेहतरीन बन जाएगा।’’
स्कूल में कइयों की तोड़ चुके हैं पसलियां
रामपुरा में स्कूल क्रिकेट में जब अशोक को गेंद मिलती थी तब उनकी उम्र के बल्लेबाज स्टंप्स से दूर हट जाते थे। आउट होने के लिए नहीं, बल्कि पीछे हटते हुए। अक्षय याद करते हुए कहते हैं, ‘‘उसने कइयों की पसलियां तोड़ दी थीं। मैंने बल्लेबाजों को भागते हुए देखा है।’’
यह स्पीड किसी कोच की ट्रेनिंग या तकनीक का नतीजा नहीं थी, बल्कि अंदर की आग से पैदा हुई थी। छोटा भाई गलियारे में बड़े भाई को चोट पहुंचाने की कोशिश करता था। गलियारा मैदान की ओर जाता था। मैदान स्कूल क्रिकेट की ओर। स्कूल क्रिकेट ने अहमदाबाद में राजस्थान रॉयल्स के खिलाफ गुजरात टाइटंस के लिए 154.2 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से फेंकी गई गेंद को जन्म दिया।
ऐसी स्पीड जो दर्शकों को अपने फोन से नजरें न हटाने पर मजबूर कर देती है। जयपुर से 80 किमी दूर रामपुरा है। नाथूलाल शर्मा दिन में खेती करते थे और रात में एक स्थानीय अखबार के लिए गाड़ी चलाते थे और अलग-अलग स्टैंड पर अखबार पहुंचाते थे। वह महीने के 10 हजार रुपये कमाते थे।
बड़े भाई अक्षय शर्मा का त्याग
नाथूराम की पत्नी चाहती थीं कि लड़के पढ़ाई पर ध्यान दें और सरकारी नौकरी करें। यही सीधा और सुरक्षित रास्ता था, लेकिन दोनों बेटे क्रिकेट खेलना चाहते थे। परिवार दोनों का खर्च नहीं उठा सकता था। अक्षय बताते हैं, ‘‘वे दोनों बेटों का भविष्य दांव पर नहीं लगा सकते थे इसलिए उन्होंने मुझसे कहा कि मैं तय करूं कि अकादमी में किसका भेजा जाए।’’
अक्षय ने तय किया कि अशोक को जाना चाहिए। बड़े भाई ने पढ़ाई छोड़ दी। छोटा भाई आगे बढ़ता रहा। नाथूलाल ने अशोक का दाखिला जयपुर की अरावली क्रिकेट अकादमी में कराया। अकादमी को राजस्थान के पूर्व लेग-स्पिनर विवेक यादव चलाते थे। अशोक को गांव से आने-जाने में एक घंटा लगता था। इस कारण उन्हें पूरा समय नहीं मिल पाता था। पूरी तरह से ध्यान लगाने के लिए आखिरकार अशोक अकादमी के हॉस्टल में ही रहने लगे।
जब कोरोना ने लगा दिया रफ्तार पर ब्रेक
साल 2019 में अशोक राजस्थान की अंडर-19 टीम के लिए चुने गए। फिर महामारी के कारण सब कुछ बंद हो गया। खेलने का समय न मिलना एक बड़ा झटका था। इस दौरान विवेक यादव का निधन हो गया। उन्हें पेट का कैंसर था, जो कोरोना और बढ़ गया था। अशोक के लिए यह दूसरा झटका था। जिस इंसान ने रामपुरा के लड़के को पहली बार सही स्ट्रक्चर दिया, वह इस दुनिया में ही नहीं थे।
जब क्रिकेट नहीं हो रहा था तब दोनों भाई मिलकर परिवार के खेत में काम करते थे। अक्षय ने बताया, ‘‘वह कुछ महीने पहले आया था और मैं उसे खेत पर ले गया। वहां हम गेहूं की बुवाई कर रहे थे। मैं क्रिकेट कोचिंग भी देता हूं और अपने खेत की देखभाल भी करता हूं।’’ जब अशोक ने अंडर-19 क्रिकेट खेलना शुरू किया तब वह घर आया और पिता से रात में गाड़ी चलाना बंद करने को कहा।
नाथूलाल ने वैसा ही किया। जिस लड़के की गलियारे में गेंदबाजी को लेकर पिता नाराज हो जाते थे वही लड़का अब इतनी कमाई कर रहा था कि उसके पिता आराम कर सकें। कोलकाता नाइट राइडर्स ने 2022 में अशोक को चुना। पूरे गांव में इसकी चर्चा होने लगी। लोगों ने कहा कि यह तो बस एक तुक्का था।
गांव वालों ने कसे ताने
जब अगले साल राजस्थान रॉयल्स ने अशोक को टीम से रिलीज कर दिया तो गांव वालों ने फिर यही कहा- इससे कुछ भी हासिल नहीं होने वाला। गांव वालों को इस बात का अंदाजा भी नहीं था कि टीम से निकाले जाने का अशोक पर क्या असर हुआ।
अक्षय बताते हैं, ‘‘उसने राजस्थान रॉयल्स से निकाले जाने की बात को बहुत गंभीरता से लिया। वह अपना बेहतरीन प्रदर्शन करने के लिए बेताब था। सबसे अच्छी बात यह रही कि उसे आशीष नेहरा जैसा कोच मिला। गेंदबाज होने के कारण वह बॉलर के माइंडसेट को बहुत अच्छी तरह समझते हैं।’’
अक्षय ने बताया, ‘‘वह बिल्कुल एक कंप्यूटर की तरह है। आपको बस उसे यह बताना होता है कि किस जगह पर गेंद डालनी है और वह लगातार उसी जगह पर गेंद डालते रहता है।’’ अक्षय जानते हैं कि रफ्तार क्या कर सकती है और क्या नहीं। वह जानते हैं कि हर IPL सीजन में एक तेज गेंदबाज उभरता है, लेकिन वह यह भी जानते हैं कि इनमें से ज्यादातर नाम अगली नीलामी तक गायब हो जाते हैं।
उदाहरण के तौर पर मयंक यादव और उमरान मलिक ने 150 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार पार की। दरअसल असली बात यह है कि उसके बाद क्या होता है। इस संबंध में हाल ही में अक्षय ने अशोक से बात की। सलाह एकदम साफ थी। अक्षय ने बताया, “मैंने उससे कहा कि लोग तुम्हारे बारे में इसलिए बात कर रहे हैं क्योंकि तुम अच्छा खेल रहे हो, इसलिए बिना किसी दिखावे के बस अपनी मेहनत जारी रखो। मंजिल अभी बहुत दूर है।’’
अक्षय ने कहा, ‘‘हमने वे दिन भी देखे हैं जब कोई हमारी तरफ ध्यान नहीं देता था। लोग हमें नजरअंदाज करते थे। अब वही लोग हमसे जुड़ रहे हैं, लेकिन मैं नहीं चाहता कि मेरा भाई सिर्फ एक सीजन का ‘वंडर बॉय’ बनकर रह जाए। उसे वह ‘ब्लू जर्सी’ पाने के लिए और भी ज्यादा मेहनत करनी होगी।”
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