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बातचीतः नौकरी और खेल सुविधाएं बेहद जरूरी- पूनम रानी

गन और मेहनत के बूते पूनम रानी मलिक ने 15 साल की उम्र में भारतीय हॉकी टीम में पदार्पण किया।
Author September 7, 2017 00:56 am
पूनम रानी मलिक

संदीप भूषण
गन और मेहनत के बूते पूनम रानी मलिक ने 15 साल की उम्र में भारतीय हॉकी टीम में पदार्पण किया। हिसार की पूनम का जन्म एक साधारण किसान परिवार में हुआ। बचपन से ही हॉकी के प्रति प्रेम और अथक परिश्रम ने 2008 में नीदरलैंड में हुई चार देशों की स्पर्धा में उन्हें भारत से खेलने का मौका तो दिया लेकिन जर्मनी में हुए 2013 जूनियर विश्व कप ने उन्हें पहचान दिलाई। उन्होंने भारत को कांस्य पदक दिलाने में अहम भूमिका निभाई। उमरा गांव की इस खिलाड़ी के नाम आठ साल में 170 मैच में 30 गोल हैं जिसके कारण उन्हें भारतीय महिला हॉकी में भरोसेमंद खिलाड़ी माना जाता है। तेजतर्रार खेल कारण उन्हें साथी खिलाड़ी व कोच फिरकी के नाम से भी पुकारते हैं। जनसत्ता ने उनसे बातचीत की…


सवाल
: आपने हॉकी को क्यों चुना?
’मैं गांव में ही लड़कों को हॉकी खेलते देखती थी और मेरी भी इच्छा होती थी कि मैं इस खेल में भाग लूं। हालांकि इस खेल को करिअर के तौर पर अपनाने की इच्छा तब और प्रबल हुई जब भारत ने 2002 कॉमनवेल्थ खेल में शानदार प्रदर्शन करते हुए स्वर्ण पदक जीता। इस मैच को देखने के बाद तो स्टिक और टर्फ के प्रति मेरी दीवानगी और बढ़ गई।
सवाल : शुरू में अभ्यास-कोचिंग के लिए क्या किया?
’मेरे घर के सामने ही एक मैदान था। मैंने भी यहीं से अभ्यास शुरू किया। बाद में जगजीत मलिक सर की देख-रेख में काफी कुछ सीखा। यहीं से खेलते हुए मैंने पहले जिला स्तरीय और फिर राज्य स्तरीय मैच खेले। फिर मेरा चयन भारतीय खेल प्राधिकरण में हो गया। यहां मैंने आजाद मलिक सर के साथ अभ्यास शुरू किया, जिससे मेरे खेल में काफी निखार आया।

सवाल : लड़कियों को खेल से दूर रखा जाता है आप पर भी इस तरह का कोई दबाव था?
’मेरे पिता दलवीर सिंह मलिक और मां संतोष देवी ने इस मामले में भरपूर साथ दिया। शुरू में तो समाज कहता ही है कि आप अपनी लड़की को खेल में क्यों डाल रहे हो लेकिन मेरे पिता ने मुझे खेलने की आजादी दी। आज जो भी मैं हूं उसमें माता-पिता का अहम योगदान है। साथ ही मेरे शुरुआती कोच मलिक सर ने भी प्रेरित किया।
सवाल : ज्यादा लड़कियां खेलें, इसके लिए सरकार को क्या करना चाहिए?

’आज लड़कियां खुद ही समझदार हैं और अपने फैसले ले रही हैं, लेकिन जब बात खेल की आती है तो सब यही कहते हैं कि इसका भाविष्य क्या है। अगर लड़कियों को खेल के साथ ही नौकरी की सुरक्षा या उनके खेल के दौरान खर्च की व्यवस्था सरकार कर दे तो मुझे पूरी उम्मीद है कि लड़कियां इस क्षेत्र में भी उसी तरह कमाल करेंगी जैसे अन्य क्षेत्रों में कर रही हैं। मैंने ओलंपिक तक का सफर तय किया लेकिन मेरे पास नौकरी नहीं है। यह स्थिति कहीं न कहीं लड़कियों के खेल को अपनाने में रुकावट है।

सवाल : हॉकी के लिए और क्या उचित कदम उठाने की जरूरत है ?
’सरकार ने राष्ट्रीय टीम को काफी सुविधाएं दे रखी हैं लेकिन जब बात जूनियर टीम की होती है तो उनके सामने कई परेशानियां हैं जिन्हें दूर किया जाना चाहिए। साथ ही हम जब नेशनल खेल रहे होते हैं तब तो हमें अच्छे टर्फ के साथ अच्छी सुविधाएं मिल जाती हैं लेकिन जब हम अपने घर लौटते हैं तो वहां रोजाना अभ्यास के लिए एक मैदान तक नहीं होता। यह हमारी निरंतरता को बनाए रखने में बाधक साबित होता है। सरकार को जिला स्तर पर स्टेडियम का निर्माण करवाना चाहिए।

सवाल : प्रीमियर लीग युवा खिलाड़ियों के लिए क्या मायने रखती है ?
’प्रीमियर लीग के माध्यम से युवा प्रतिभा को एक सही प्लेटफॉर्म मिलता है। बहुत सारे खिलाड़ी होते हैं जिन्हें राष्ट्रीय टीम में जगह नहीं मिल पाती लेकिन जब ऐसी लीग होती है तो उनको भी इसमें खेलने और खुद को साबित करने का मौका मिलता है। साथ ही यह खिलाड़ियों के लिए खर्च वहन का भी साधन बनता है। हम जब किसी टीम में नहीं होते तो हमें खर्च के लिए पैसे नहीं मिलते, तो ऐसे में तैयारियों के लिहाज से यह लाभदायक होता है।

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