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भारतीय पहलवान अखाड़े में चारों खाने चित

जिस तरह भारतीय पहलवानों ने पिछले कुछ वर्षों में ओलंपिक और विश्व चैंपियनशिप में अच्छा प्रदर्शन किया है, उसे देखते हुए इस बार भी पेरिस में उनसे ऐसे ही प्रदर्शन की उम्मीद थी लेकिन भारतीय पहलवान औंधे मुंह गिरते दिखाई दिए।
Author नई दिल्ली | September 7, 2017 01:06 am
पेरिस में हुई विश्व स्पर्धा में भी कुछ ऐसे ही हालात थे। मगर न तो भाग्य साथ था और न ही पहलवानों में जीत का जज्बा दिखाई दिया, जो इस स्पर्धा में दिखना चाहिए था।

मनोज जोशी

जिस तरह भारतीय पहलवानों ने पिछले कुछ वर्षों में ओलंपिक और विश्व चैंपियनशिप में अच्छा प्रदर्शन किया है, उसे देखते हुए इस बार भी पेरिस में उनसे ऐसे ही प्रदर्शन की उम्मीद थी लेकिन भारतीय पहलवान औंधे मुंह गिरते दिखाई दिए। संदीप तोमर, बजरंग और ग्रीको रोमन कुश्ती में ज्ञानेंद्र ने ही थोड़ा बहुत जज्बा दिखाया, मगर बाकी पहलवानों के प्रदर्शन ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
आमतौर पर यह माना जाता है कि ओलंपिक के बाद होने वाली विश्व कुश्ती चैम्पियनशिप का स्तर उतना कड़ा नहीं होता क्योंकि कई पहलवान उस समय तक या तो रिटायर हो जाते हैं या फिर अपने वजन में फेरबदल कर लेते हैं। पेरिस में हुई विश्व स्पर्धा में भी कुछ ऐसे ही हालात थे। मगर न तो भाग्य साथ था और न ही पहलवानों में जीत का जज्बा दिखाई दिया, जो इस स्पर्धा में दिखना चाहिए था।

पहलवानों की हार के नौ कारण इस प्रकार हैं-
भारत ने इस स्पर्धा में बिना विदेशी प्रशिक्षकों के भाग लिया। तीनों श्रेणियों में कमान भारतीय कोचों के हाथ में थी। भारतीय कोचों की काबिलियत पर किसी को कोई संदेह नहीं है लेकिन आधुनिक कुश्ती मे नित्य होते बदलावों को देखते हुए विदेशी कोच समय की जरूरत है। ये कोच विपक्षी पहलवानों के वीडियो पर केंद्रित रहने के बाद अपने पहलवानों के लिए रणनीति तय करते हैं। कई बार तो स्पर्धा के दौरान विपक्षी पहलवानों की लड़ने की शैली को देखते हुए वे मौके पर अपने पहलवान के लिए नई रणनीति बना देते हैं।
भारतीय पहलवानों में कई तो ढर्रे पर चलते दिखाई दिए। ऐसा लगा कि उनके पास प्लान बी है ही नहीं। अगर कोई लेग अटैक में अच्छा है तो वह उसी तकनीक का इस्तेमाल करता दिखाई दिया, बिना यह जाने हुए कि विपक्षी अपने अच्छे रक्षण से कोई अवसर नहीं दे रहा। ऐसी स्थिति में भारतीय पहलवान को उसे गर्दन की पकड़ या कमर के आस-पास के दांवों का भी इस्तेमाल करना चाहिए। ऐसा खासकर महिलाओं के मुकाबलों में देखने को मिला।

भारतीय पहलवानों को मानसिक दृढ़ता की भी जरूरत है क्योंकि उच्च स्तरीय विपक्षी पहलवानों के सामने वे आधी लड़ाई तो मुकाबले के शुरू होने से पहले ही गंवा देते हैं।
भारतीय पहलवानों को पूरे छह मिनट तक अपनी ऊर्जा बचाकर रखनी चाहिए थी। कुछ ने तो शुरुआत बहुत अच्छी की लेकिन उसके बाद उनमें वैसी चुस्ती-फुर्ती या चपलता दिखाई नहीं दी। पूजा ढांडा महिलाओं के 58 किलोग्राम वर्ग में चीन की निंगनिंग रोंग के खिलाफ एक समय 8-0 से आगे थीं लेकिन उसके बाद वह अंक पर अंक खोती गईं और उन्होंने 8-12 से मुकाबला गंवा दिया। इसी तरह विनेश ने अपने प्री क्वार्टर फाइनल मुकाबले में अमेरिका की विक्टोरिया लेसी एंथनी के खिलाफ बढ़त के बावजूद मुकाबला गंवा दिया।
ग्रीकोरोमन शैली की कुश्तियों में भारत ने एक तरह से घुटने टेक दिए। ज्ञानेंद्र को छोड़कर कोई भी भारतीय अपनी पहली बाधा को भी पार नहीं कर सका।

ज्ञानेंद्र ने जरूर दो मुक़ाबले जीते और वह शीर्ष दस में रहे। दरअसल, ग्रीको रोमन शैली में भारत को विश्व स्पर्धा में अब तक केवल संदीप तुलसी यादव के एकमात्र कांस्य पदक के रूप में कामयाब मिली है। भारत के पास आज सीनियर वर्ग में विकल्पों की भी खासी कमी है। कई वजनों में दो या किसी में तीन ही ऐसे पहलवान हैं, जो अपने चयन को पक्का कर सकते हैं। ऐसे में जरूरत है युद्धस्तर पर जूनियर पहलवानों की खोज करने की। संभव है कि इस प्रदर्शन के बाद जूनियर स्तर के कुछ पहलवानों को सीनियर ट्रायल में उतरने का मौका मिले।
इस बार शीतल तोमर और संदीप तोमर के लिए अच्छा मौका था। शीतल का इसीलिए क्योंकि उनका ड्रॉ बहुत अच्छा था, जबकि संदीप का इसीलिए क्योंकि उनके वजन के विश्व विजेता व्लादीमिर खिनचेंगाशिविली 57 से 61 किलो वजन में चले गए थे।

एशियाई विजेता बजरंग पूनिया का अपना पहला मुकाबला जीतने के बाद जार्जिया के पहलवान से मुकाबला बेहद करीबी था लेकिन आखिरी क्षणों में वह विपक्षी को पैसिविटी न दिये जाने के रेफरी के विरोध में ही उलझ गए जबकि उनके टीम के कोच ने भी कोई विरोध दर्ज नहीं किया। हमारे हैवीवेट के पहलवानों के लिए विश्व स्पर्धा में कुछ खास मौका नहीं है। हालांकि सत्यव्रत ने अपने रक्षण में सुधार किया है लेकिन अपने से तगड़े पहलवान के सामने वह अपना स्वाभाविक प्रदर्शन नहीं कर पाते। 10. कुछ भारतीय पहलवानों में गंभीरता की कमी साफ तौर पर दिखाई दी। कुछ का ध्यान पेरिस पहुंचकर घूमने-फिरने पर ज्यादा था।

इस प्रदर्शन के बाद कुछ अहम कदम उठाने की जरूरत है क्योंकि अगले साल एशियाई खेल भी हैं और राष्ट्रमंडल खेल भी। इसके अलावा 2020 में तोक्यो में ओलंपिक का आयोजन होना है। इसके लिए भारतीय पहलवानों को अधिक से अधिक प्रतियोगिताओं में भाग लेने के अवसर देने होंगे।

सुशील कुमार सिंह

पहलवानों के अभ्यास की व्यवस्था आयोजन स्थल से काफी दूर की गई और उन्हें मूलभूत सुविधाएं तक मुहैया नहीं कराई गईं, जिसका असर खिलाड़ियों के प्रदर्शन पर पड़ा।
-बृजभूषण शरण सिंह, भारतीय कुश्ती संघ के अध्यक्ष

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