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बेहतर मार्गदर्शन ने दिलाया मुकाम : मनु भाकर

मनु कहती हैं कि यह सब मां-पिताजी की वजह से ही मुमकिन हो सका है। मनु बताती हैं कि अक्सर इस बात की चर्चा होती है कि बच्चे में प्रतिभा थी तब उसने ऐसा किया, लेकिन यह गलत है।

Author April 26, 2018 5:22 AM
भारतीय निशानेबाज मनु भाकर। (Photo Source: Olympic Gold Quest Twitter)

मनु महज 16 साल की हैं और उन्होंने अपनी मेहनत और मां-बाप की सलाह पर चल कर इस छोटी सी उम्र में देश को सात स्वर्ण पदक दिलाए हैं। निशानेबाज मनु भाकर ने सिर्फ देश को ही सात स्वर्ण और एक रजत पदक नहीं दिलाया है बल्कि अपने राज्य हरियाणा और जिला झज्जर का नाम रोशन करते हुए राष्ट्रमंडल खेलों में सबसे कम उम्र की भारतीय महिला निशानेबाज होने का गौरव भी हासिल किया। मनु कहती हैं कि यह सब मां-पिताजी की वजह से ही मुमकिन हो सका है।  मनु बताती हैं कि अक्सर इस बात की चर्चा होती है कि बच्चे में प्रतिभा थी तब उसने ऐसा किया, लेकिन यह गलत है। मनु का मानना है कि अगर मां-बाप बच्चों की प्रतिभा और उसकी रुचि को समझने में विफल होते हैं तो बच्चा भी विफल होगा।

मां सुमेधा कहती हैं कि मुक्केबाजी और थांग टा में मनु को चोट लग जाती थी जिसकी वजह से वह खुद को ज्यादा फिट नहीं रख पा रही थीं। पिता रामकिशन भाकर कहते हैं कि हमने यह बात समझी और इसके बाद मनु ने निशानेबाजी में आने का फैसला किया। तब भी हमने उसका साथ दिया। सुमेधा और रामकिशन भाकर कहते हैं कि हर बच्चे में प्रतिभा होती है, हमने उसे रोका नहीं, बस उसकी उस जरूरत को पूरा किया। मनु कहती हैं कि जब आप डायस पर खड़े होते हैं और दुनिया भर के लोग आपको देख रहे होते हैं। ऐसे में आप पहले पायदान पर होते हैं और गले में सोने का तमगा होता है। इन सबके बीच आपके राष्टÑगान की धुन बजना दुनिया की किसी भी सुखद अनुभूति से अलग होता है। मनु कहती हैं कि उनके दादा दिवंगत राजकरण भाकर सेना में थे। शायद इसीलिए राष्ट्रगान की धुन उन्हें ज्यादा रोमांचित करती है। मनु के पिता रामकिशन कहते हैं कि मनु को डेढ़ करोड़ का चेक मिला, लेकिन बेटी के चेहरे पर वैसी खुशी मैंने तब भी नहीं देखी जैसी डायस पर खड़े होकर राष्टÑगान की धुन बजने के वक्त नजर आती है।
सस्ते स्कूल से भी बड़ी प्रतिभाएं

रामकिशन भाकर कहते हैं कि अक्सर अभिभावक बच्चों को महंगे स्कूलों में पढ़ाने की बात करते हैं। उन्हें लगता है कि महंगे स्कूल में पढ़ाने से सफलता की गारंटी मिल गई और वे अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त हो गए। भाकर कहते हैं कि ये धारणा गलत है। कम फीस वाले सस्ते स्कूलों से बेहतर प्रतिभाएं निकलती हैं। वे उदाहरण देते हुए कहते हैं कि मनु साधारण स्कूल में पढ़ती है। उसके उलट मेरे बहुत सारे जानने वालों के बच्चे मनु की अपेक्षा कई गुना ज्यादा फीस वाले स्कूलों में पढ़ते हैं, लेकिन वे बच्चे औसत ही हैं। जरूरी यह है कि अभिभावक अपनी जिम्मेदारी समझें।

 

घर के संस्कार और नियम भी हैं जरूरी
मनु की मां सुमेधा कहती हैं कि बच्चों के विकास में संस्कार और घर के नियमों की भी अहम भूमिका होती है। हमने शुरू से मनु में सुबह जल्दी उठने और योग आदि करने की आदत डाली। साथ ही पसंद का खेल चुनने का माहौल उपलब्ध करवाया, जिसकी वजह से वह अपने मन को केंद्रित कर पाती है। हमें खुशी है कि हमने जितनी मेहनत उसके साथ की, उसका फायदा मनु और पूरे देश को मिल रहा है। सुमेधा ने कहा कि हमें अपनी बेटी और उसकी मेहनत पर गर्व है।

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