दुनिया की 18वें नंबर, एशिया की तीसरे नंबर और भारत की अपनी श्रेणी की नंबर-1 पैरा टेबल टेनिस खिलाड़ी प्राची पांडेय की सबसे बड़ी प्रतिद्वंद्वी कोई विदेशी खिलाड़ी नहीं, बल्कि आर्थिक तंगी है। उत्तर प्रदेश के उन्नाव की रहने वालीं प्राची पांडेय पिछले तीन वर्षों से गांधीनगर स्थित स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (SAI) के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस में टेबल टेनिस की ट्रेनिंग कर रही हैं।

प्राची पांडेय अब तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 11 पदक और राष्ट्रीय स्तर पर 18 स्वर्ण पदक जीत चुकी हैं। अब वह आगामी एशियाई खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व करने की प्रबल दावेदार हैं। इसके बावजूद प्राची पांडेय आज भी स्पॉन्सर (प्रायोजक) की तलाश में हैं। यही आर्थिक मजबूरी उन्हें उन अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंटों से दूर रख देती है, जहां से विश्व रैंकिंग के अंक मिलते हैं और पैरालंपिक का रास्ता बनता है।

जन्म से स्पाइना बिफिडा जैसी दुर्लभ न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारी से जूझ रहीं प्राची डॉक्टरों की चेतावनी, लगातार बढ़ती शारीरिक चुनौतियों और व्हीलचेयर पर निर्भर जीवन के बावजूद हर दिन देश के लिए पदक जीतने का सपना जी रही हैं।

जनसत्ता से विशेष बातचीत में प्राची पांडेय ने अपने संघर्ष, खेल, सपनों और उस कड़वी सच्चाई को साझा किया कि यदि समय पर आर्थिक सहयोग और स्पॉन्सरशिप मिल जाए तो वह भारत के लिए और भी बड़े मंचों पर इतिहास रच सकती हैं।

ट्रेन में एक मुलाकात ने बदल दी जिंदगी

प्राची पांडेय ने बताया कि उन्होंने वर्ष 2021 में पैरा टेबल टेनिस खेलना शुरू किया। इससे पहले उन्हें यह तक नहीं पता था कि दिव्यांग खिलाड़ियों के लिए भी अलग खेल प्रतियोगिताएं होती हैं। प्राची पांडेय ने बताया, ‘‘मैं पंजाब यूनिवर्सिटी की परीक्षा देने चंडीगढ़ गई थी। ट्रेन में एक महिला खिलाड़ी मिलीं। पहले उन्हें लगा कि मैं भी एक पैरा एथलीट हूं, जब मैंने अनभिज्ञता जाहिर की तो उन्होंने मुझे पैरा स्पोर्ट्स के बारे में बताया।’’

प्राची पांडेय ने कहा, ‘‘वहीं से मेरी जिंदगी की दिशा बदल गई। घर लौटकर मैंने इंटरनेट पर पैरा टेबल टेनिस के बारे में खोजा, एक वरिष्ठ खिलाड़ी का नंबर मिला और फिर वहीं से मेरा सफर शुरू हो गया।’’

उन्नाव में सुविधा नहीं थी, इसलिए किराए के कमरे में रहकर कानपुर में प्रैक्टिस की

प्राची के लिए खेलना आसान नहीं था। उनके शहर उन्नाव में टेबल टेनिस की कोई खास व्यवस्था नहीं थी। ऐसे में उन्होंने पड़ोसी शहर कानपुर का रुख किया। प्राची पांडेय बताती हैं, ‘‘मैं कानपुर के सिंघानिया स्कूल में सुबह अभ्यास करने जाती थी। वहां किराए के कमरे में रहती थी। उस समय वर्क फ्रॉम होम सॉफ्टवेयर इंजीनियर की नौकरी भी करती थी, ताकि अपने खर्च खुद उठा पाऊं।’’

प्राची ने बताया, ‘‘बाद में जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफलता मिलने लगी और खेल शेड्यूल टाइट हो गया तो उन्हें नौकरी छोड़नी पड़ी। प्राची पांडेय ने बताया, ‘‘2023 में मेरे तीन अंतरराष्ट्रीय पदक आए। तभी लगा कि अगर पूरा समय खेल को दूं तो देश के लिए बहुत कुछ कर सकती हूं, इसलिए नौकरी छोड़ दी और पूरी तरह टेबल टेनिस को अपना लिया।’’

डॉक्टर दे चुके हैं खेल छोड़ने की सलाह

प्राची पांडेय जन्म से ही स्पाइना बिफिडा (Spina Bifida Myelomeningocele) नामक न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारी से पीड़ित हैं। बचपन में इसका पता नहीं चल पाया। आठवीं-नौवीं कक्षा तक पहुंचते-पहुंचते कमर और पैरों में तेज दर्द शुरू हुआ।

प्राची पांडेय बताती हैं, ‘‘एमआरआई में पता चला कि रीढ़ की हड्डी में बड़ा ट्यूमर है। डॉक्टरों ने कहा कि अगर ऑपरेशन नहीं हुआ तो मैं लकवाग्रस्त हो सकती हूं। ऑपरेशन तो हुआ, लेकिन उसी के बाद मेरी दिव्यांगता बढ़नी शुरू हो गई। डॉक्टरों ने साफ कहा कि यह बीमारी कभी पूरी तरह ठीक नहीं होगी और उम्र बढ़ने के साथ बढ़ती जाएगी।’’

आज स्थिति यह है कि प्राची सामान्य जीवन में व्हीलचेयर का सहारा लेती हैं। ज्यादा देर तक चलना उनके लिए संभव नहीं है। हालांकि, मैच के दौरान वह खड़े होकर खेलती हैं। प्राची पांडेय ने बताया कि हाल ही में जांच में ट्यूमर फिर से बढ़ने की पुष्टि हुई है।

प्राची ने बताया, ‘‘डॉक्टरों ने कहा है कि दोबारा सर्जरी बहुत जोखिम भरी होगी। अगर ऑपरेशन हुआ तो पैरालाइज होने की आशंका है। फिलहाल दर्द निवारक दवाओं के सहारे ही खेल रही हूं।’’

बचपन से था खेलों का जुनून, लड़कों को हराकर बढ़ा आत्मविश्वास

प्राची कहती हैं कि उन्होंने कभी पैसों के लिए खेल नहीं चुना। प्राची पांडेय ने बताया, ‘‘मैं स्कूल में क्रिकेट, बैडमिंटन, खो-खो सब खेलती थी, लेकिन टेबल टेनिस सबसे जल्दी सीख लिया। मेरे गेम्स टीचर मेरा मुकाबला 11वीं और 12वीं के लड़कों से कराते थे। मैं कई बार उन्हें भी हरा देती थी। तभी लगा कि यही खेल मेरी पहचान बन सकता है।’’

स्पॉन्सर नहीं मिलने से रुक रही पैरालंपिक की तैयारी

प्राची पांडेय के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती आर्थिक है। प्राची पांडेय ने कहा, ‘‘साल में करीब 20 से 25 अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट होते हैं, लेकिन मैं उनमें हिस्सा ही नहीं ले पाती क्योंकि खर्च उठाने वाला कोई स्पॉन्सर नहीं है। फेडरेशन सिर्फ कुछ खिलाड़ियों को सीमित प्रतियोगिताओं के लिए सहायता देता है। बाकी टूर्नामेंट अपने खर्च पर खेलने पड़ते हैं।’’

प्राची पांडेय विश्व रैंकिंग प्रणाली समझाते हुए कहती हैं, ‘‘हमारे अंक हर साल समाप्त हो जाते हैं। पैरालंपिक में चयन विश्व रैंकिंग से होता है। अगर लगातार टूर्नामेंट नहीं खेलेंगे तो रैंकिंग गिर जाएगी। मेरे साथ यही हो रहा है।’’ प्राची के अनुसार इसी वजह से वह विश्व चैंपियनशिप के लिए भी क्वालिफाई नहीं कर पाईं। उन्होंने बताया, ‘‘मेरी रैंकिंग पहले बेहतर थी, लेकिन प्रतियोगिताएं नहीं खेल पाने से मैं टॉप-15 से बाहर हो गई। अगर स्पॉन्सर मिलता तो आज स्थिति अलग होती।’’

सरकारी नौकरी भी नहीं मिली

एमटेक की पढ़ाई पूरी कर चुकीं प्राची ने नौकरी के लिए भी कई जगह आवेदन किये, लेकिन सफलता नहीं मिली। प्राची ने बताया, ‘‘एसबीआई में आवेदन किया था। मेरे अंक सबसे ज्यादा थे, लेकिन मेरी श्रेणी में रिक्तियां नहीं थीं। फिलहाल बड़े अंतरराष्ट्रीय पदक के बिना सरकारी नौकरी मिलना भी मुश्किल है।’’

पिता जल्द होंगे सेवानिवृत्त, परिवार पर बढ़ रही जिम्मेदारी

प्राची बताती हैं कि उनके पिता उत्तर प्रदेश पुलिस में सब-इंस्पेक्टर हैं और अगले वर्ष सेवानिवृत्त हो जाएंगे। मां गृहिणी हैं और दो छोटे भाई हैं। प्राची पांडेय ने बताया, ‘‘अब तक जितनी भी बचत थी, उसी से खेल रही हूं। नौकरी के समय जो पैसे बचाए थे, वही प्रतियोगिताओं में खर्च हुए, लेकिन अब आगे का रास्ता मुश्किल होता जा रहा है।’’

अगला लक्ष्य पैरा एशियन गेम्स और पैरालंपिक

प्राची का पूरा फोकस अब आगामी पैरा एशियाई खेलों और 2028 पैरालंपिक पर है। प्राची पांडेय कहती हैं, ‘‘2027 मेरे लिए सबसे अहम साल होगा। उसी दौरान जितने ज्यादा अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट खेलूंगी, उतनी बेहतर विश्व रैंकिंग बनेगी और पैरालंपिक का रास्ता खुलेगा। मेरा सपना सिर्फ खेलना नहीं, भारत के लिए पैरालंपिक पदक जीतना है।’’

देश और कॉरपोरेट जगत से एक सहयोग की उम्मीद

आज प्राची पांडेय के पास प्रतिभा है। अंतरराष्ट्रीय उपलब्धियां हैं, विश्व और एशियाई रैंकिंग है, लेकिन संसाधनों की कमी उनके सपनों की सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है। जिस खिलाड़ी ने चार साल में भारत को 11 अंतरराष्ट्रीय पदक और 18 राष्ट्रीय स्वर्ण दिलाए हैं, वह आज भी हर टूर्नामेंट से पहले स्पॉन्सर की तलाश करती है।

यदि किसी कॉरपोरेट समूह, सार्वजनिक उपक्रम (PSU) या खेलों को बढ़ावा देने वाली संस्था का साथ उन्हें मिल जाए तो यह सिर्फ एक खिलाड़ी की मदद नहीं होगी, बल्कि भारत के लिए संभावित पैरा एशियाई खेल और पैरालंपिक पदक में निवेश होगा। प्राची का संघर्ष यह साबित करता है कि हौसले की कोई सीमा नहीं होती, लेकिन सपनों को मंजिल तक पहुंचाने के लिए संसाधनों का साथ भी उतना ही जरूरी होता है।

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