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हॉकीः भारत का बढ़ा रुतबा

विश्व स्तर पर बड़ी सफलता के इंतजार में भारतीय हॉकी का एक साल गुजर गया। पर टीम के दमदार प्रदर्शन से आशा की किरण उभरी है।

Author December 28, 2017 2:14 AM
(File Pic)

सुरेश कौशिक
विश्व स्तर पर बड़ी सफलता के इंतजार में भारतीय हॉकी का एक साल गुजर गया। पर टीम के दमदार प्रदर्शन से आशा की किरण उभरी है। कुछ शानदार पल आए तो निराशा भी मिली। कोचों को लेकर उठापटक हुई तो नरिंदर बत्रा के अंतरराष्ट्रीय हॉकी महासंघ का अध्यक्ष बनने से भारतीय रुतबा भी बढ़ा। साल के शुरू में हमारी रैंकिंग छठी थी और अंत में इसी पर कायम भी रहे। अपने से ऊंची रैंकिंग वाली टीमों को भारत ने हराया भी बराबरी की टक्कर भी ली। भुवनेश्वर में वर्ल्ड हॉकी लीग फाइनल्स की सफल मेजबानी से भारत की आयोजन क्षमता का सिक्का जमा। बारिश के बावजूद ओडिशा के इस शहर में मैचों को देखने के लिए दर्शकों का हुजूम जिस तरह छाते लेकर उमड़ा उससे अंतरराष्ट्रीय हॉकी महासंघ गदगद हो गया। लगातार दूसरी बार भारतीय टीम इसमें कांस्य पदक जीतने में सफल रही। रायपुर में जब पिछला आयोजन हुआ था तब भी भारत तीसरे स्थान पर रहा था। कांस्य पदक के मुकाबले में भारत ने जर्मनी को 2-0 से हराया। इससे पहले भारत ने क्वार्टर फाइनल में बेल्जियम को पेनल्टी शूटआउट में हराया।

मेजबान के नाते खेल रहा भारत सेमीफाइनल में अर्जेंटीना से एक गोल से हार गया। गीली टर्फ पर भी भारत ने उम्दा खेल दिखाया पर किसी तरह गोल निकालकर ओलंपिक चैंपियन अर्जेंटीना से फाइनल खेलने का हकदार बना। पूल में चैंपियन बनी आस्ट्रेलिया के साथ भारत ने 1-1 से बराबरी की टक्कर ली। इससे एक बात तो स्पष्ट हो गई कि यूरोपीय टीमों और आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड जैसी टीमों को अब भारतीय अपनी तेजी, कौशल, शानदार तालमेल और फिटनेस से चौंका रहे हैं। कुछ वर्षों पहले तक हार का अंतर भी बड़ा रहता था।

पिछले साल जूनियर विश्व कप विजेता टीम के कुछ खिलाड़ियों ने बड़ी खूबी के साथ अपने को सीनियर टीम में स्थापित कर लिया। इससे भारतीय टीम को मजबूती मिली। अब भारतीय टीम सरदार सिंह जैसे अनुभवी खिलाड़ी को टीम से बाहर रखकर भी दूसरी टीमों को पटखनी दे सकती है। गोलकीपर पीआर श्रीजेश की चोट का झटका भी भारतीयों ने बखूबी सह लिया। हरमनप्रीत, वीरेंद्र लकड़ा, रूपिंदर सिंह की पेनल्टी कारनर पर गोल बनाने की कला भी जीत में सहायक हो रही है। मनप्रीत, आकाशदीप, विकास और सूरज जैसे युवा खिलाड़ी किसी भी परिस्थिति में चुनौती के लिए तैयार हैं।

वर्ल्ड हॉकी लीग सेमीफाइनल में मलेशिया और कनाडा से हार चुभने वाली रही। यह खराब प्रदर्शन कोच रोलेंट ओल्टमैंस की छुट्टी का कारण बना। भारत ने जोहोर बाहरू कप में जूनियर टीम भेजी जो कांस्य पदक जीतने में सफल रही। अजलान शाह कप में न्यूजीलैंड को प्लेआॅफ में हराकर भारत ने कांस्य पदक जीता। भारतीय टीम यूरोप दौरे पर गई तो युवा खिलाड़ियों को इसमें शामिल किया गया। जूनियर विश्व कप विजेता खिलाड़ियों ने चयनकर्ताओं के फैसले को सही साबित करते हुए दो बार नीदरलैंड की टीम को हराया। जर्मर्नी में तीन देशों के टूर्नामेंट में भारत ने बेल्जियम को हराया और जर्मर्नी से ‘ड्रा’ खेला।

एशिया स्तर पर तो अब भारत की बादशाहत है। मलेशियाई टीम जरूर भारत के लिए परेशानी का सबब बनी हुई है। लेकिन ढाका में इसी टीम को हराकर भारत ने एशिया कप जीता। वैसे चिरप्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान अब भारत के सामने मेमना साबित हो रहा है। साल में हुए तीन मुकाबलों में बाजी भारत के हाथ रही। कोरियाई टीम की तेजी भी भारतीय कौशल के सामने फीकी पड़ने लगी है। अंडर-18 स्कूली स्तर पर भी एशिया में भारत की धाक रही। ओल्टमैंस की जगह भारतीय टीम के कोच बने नीदरलैंड के मराइन। मराइन ऐसे पहले विदेशी कोच बने जिन्होंने भारतीय टीम को दो लगातार पदक दिलाए। पहला एशिया कप में स्वर्ण और दूसरा वर्ल्ड हॉकी लीग में कांस्य।

महिला टीम की कमान हरेंद्र सिंह को सौंपी गई। टीम ने 13 साल बाद एशिया कप जीता। इससे वह अगले साल होने वाले विश्व कप के लिए भी क्वालीफाई कर गई। हरेंद्र सिंह ने खिलाड़ियों को खुद में भरोसा रखने का मंत्र भी दिया। एशिया कप के फाइनल में भारत ने चीन को पेनल्टी शूटआउट में 5-4 से हराया। पूल मैच में भी भारत ने चीन को 4-1 से छकाया था। एशिया कप में भारत ने पिछली विजेता जापान को भी 4-2 से फतह किया। इस सफलता से भारतीय महिला टीम दसवें स्थान पर आ गई है। टीम को टाप छह में लाना हरेंद्र का सपना है। इसके लिए कड़ी मेहनत करनी होगी। अगले साल विश्व कप, राष्ट्रमंडल खेल और एशियाई खेलों का आयोजन होना है। अगला लक्ष्य एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतना रहेगा जिससे 2020 में तोक्यो ओलंपिक में भारतीय टीम को खेलने का मौका मिल जाएगा।

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