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‘कृत्रिम घास’ पर मुरझा गई भारतीय हाकी क्या फिर पनपेगी

ओड़ीशा में खेले जा रहे हाकी विश्व कप में खेल रहे देशों पर सरसरी निगाह डालें तो यह आयोजन कुछ-कुछ फुटबाल विश्व कप जैसा लगता है।

‘कृत्रिम घास’ पर मुरझा गई भारतीय हाकी क्या फिर पनपेगी
अमित रोहीदास। (फोटो-इंडियन एक्‍सप्रेस)।

राजेंद्र सजवान

इसलिए क्योंकि बेल्जियम, जर्मनी, अर्जेंटीना, स्पेन, हालैंड, इंग्लैंड आस्ट्रेलिया , चिली, जापान, कोरिया आदि देश विश्व फुटबाल में बड़ी पहचान रखते हैं। सिर्फ भारत है जिसे हाकी राष्ट्र के रूप में जाना-पहचाना जाता है। यह भी सच है कि हाकी में भारत का प्रदर्शन शानदार रहा है लेकिन फुटबाल में भारत बेहद पिछड़े देशों में शामिल है।

हाकी में भारत ने अपना एकमात्र विश्व खिताब 1975 में जीता था । तब हाकी का रूप-स्वरूप ऐसा नहीं था जैसा भुवनेश्वर में खेले जा रहे विश्व कप में नजर आ रहा है । तब मलेशिया में खेले गए घास के मैदान पर भारत ने श्रेष्ठता दर्ज की थी, लेकिन एक साल बाद खेले गए मांट्रियल ओलंपिक में भारत को सातवें स्थान से संतोष करना पड़ा । ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि पहली बार ओलंपिक हाकी नकली घास (एस्ट्रो टर्फ )के मैदान पर खेली गई और भारतीय टीम इस बदलाव के लिए कदापि तैयार नहीं थी । शायद पकिस्तान के साथ भी यही स्थिति थी हालांकि उसने कांस्य पदक जीता था ।

मांट्रियल ओलंपिक में एस्ट्रो टर्फ के चलन के बाद एशियाई देशों, खासकर भारत और पकिस्तान ने यूरोप पर एशियाई हाकी को बर्बाद करने का आरोप लगाया, जोकि काफी हद तक सही भी था। लेकिन धीरे-धीरे नए मैदानों को स्वीकार कर लिया गया और इसके साथ ही कलात्मक हाकी का स्थान ताकत और दमखम के खेल ने ले लिया । चूंकि यूरोपीय खिलाडी शारीरिक तौर पर एशियाई खिलाडियों से बीस होते हैं इसलिए उनकी पकड़ मज़बूत होती चली गई और फिर एक दिन ऐसा भी आया जब भारत और पकिस्तान हाकी मानचित्र से लगभग बाहर होने के कगार पर पहुंच गए।

एस्ट्रो टर्फ के चलन से न सिर्फ मैदान बदला अपितु नियम भी बदल गए । खेल को आकर्षक बनाने के लिए बहुत से बदलाव किए गए लेकिन कुल मिला कर हाकी में फ्री फार आल हो गया। ठीक फुटबाल जैसा। पीठ दिखाने से लेकर टर्निंग, थ्रो, पेनल्टी कार्नर और अनेकों नियम बदल डाले गए और हाकी जैसे फुटबाल बन गई, जिनके अनुरूप खेलने में भारत और पकिस्तान के खिलाडियों को दुविधा जरूर हुई । हालांकि एशियाई देशों को अंतरराष्ट्रीय हाकी फेडरेशन के नियमों को अपनाना पड़ा लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी ।

भारत ने अपना आठवां और आखिरी ओलंपिक स्वर्ण 1980 के मास्को में जीता था जिसमें प्रमुख यूरोपीय देशों ने भाग नहीं लिया , जबकि पकिस्तान ने चार साल बाद लासएंजेल्स में स्वर्ण कब्जाया। इसके बाद से दोनों देश गुमनामी में खो गए। कुछ एक अवसरों पर वे ओलंपिक और विश्व कप में भाग लेने की पात्रता भी अर्जित नहीं कर पाए।

हालांकि नीदरलैंड, इंग्लैंड, जर्मनी, आस्ट्रेलिया और स्पेन जैसे चैम्पियन फुटबाल राष्ट्र हाकी में पहले ही ऊंचा मुकाम पा चुके थे लेकिन धीरे-धीरे कुछ और घुसपैठियों ने दस्तक दी और विश्व विजेता अर्जेंटीना, बेल्जियम, फ्रÞांस, पोलैंड आदि देशों ने फुटबाल के साथ साथ हाकी में भी एशियाई देशों को बहुत पीछे छोड़ दिया है । फिलहाल भारतीय हाकी धीरे-धीरे पटरी पर आ रही है लेकिन फुटबाल खेलने वाले चैंपियन देशों की घुसपैठ से आज की हाकी फुटबाल बन कर रह गई है।

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First published on: 19-01-2023 at 01:04:04 am