Indian footballer Kaviya Pakkirisamy Struggle Story: गांव में जब कोई लड़की 18 साल की होती है, तो उससे यह नहीं पूछा जाता कि वह क्या बनना चाहती है। उससे पूछा जाता है- शादी कब कर रही हो? उसी उम्र में, जब उसके हाथों में मेहंदी की कल्पना की जा रही थी, वह अपने फटे जूतों को फिर से सुई-धागे से सिल रही थी ताकि अगला मैच खेल सके।

एक ही जर्सी में दो साल तक मैदान पर उतरने वाली इस लड़की के सामने समाज के ताने थे, घर का दबाव था और भविष्य को लेकर अनगिनत सवाल थे। लेकिन उसका एक जवाब था- ‘फुटबॉल’ और वही जवाब उसे गांव की पगडंडियों से राष्ट्रीय टीम तक ले गया। यह कहानी है तमिलनाडु में एक छोटे से गांव में 23 दिसंबर 2002 को जन्मीं काव्या पक्कीरिसामी की।

यह कहानी उस लड़की की है, जिसने गांव की सोच, आर्थिक मुश्किलों और गंभीर एसीएल (ACL) इंजरी के बावजूद फुटबॉल नहीं छोड़ा और राष्ट्रीय टीम तक पहुंचकर अपने फैसले को सही साबित किया। काव्या के गांव में स्कूल की पढ़ाई पूरी होने के बाद लड़कियों की शादी कर दी जाती है। खेल वहां सिर्फ शौक हो सकता है, करियर नहीं। हालांकि, काव्या ने अलग रास्ता चुना।

पांचवीं कक्षा में मैदान के किनारे खड़े होकर सीनियर्स को देखना शुरू किया। जब छठी कक्षा में थीं तो उनसे कहा गया कि वह फुटबॉल के लिए अभी ‘बहुत छोटी’ हैं तो उन्होंने दौड़ना शुरू किया और मेडल जीते। इससे प्रभावित होकर कोच ने उन्हें फुटबॉल खेलने के लिए बुला लिया।

काव्या पक्कीरिसामी 18 साल की होते-होते सीनियर नेशनल, जूनियर टूर्नामेंट खेलने के साथ-साथ अपने राज्य का प्रतिनिधित्व कर चुकी थीं। फिर उन्हें फुटबॉल छोड़ने के लिए कहा गया। कहा गया कि अब तुम बड़ी हो चुकी हो। बताया गया कि अब फुटबॉल बहुत हो चुका, लेकिन काव्या ने तो कुछ और ही सपने देख रखे थे।

दूसरी ओर गांव के लोग पूछ रहे थे कि वह फुटबॉल क्यों खेल रही है। ‘छोटी ड्रेस’ क्यों पहन रही है। उसके माता-पिता ऐसा क्यों करने दे रहे हैं। इन सबके बीच काव्या ने अपनी मां सेल्वा मैरी से सिर्फ एक मौका देने की इजाजत मांगी। साफ कर दिया कि यदि चीजें ठीक नहीं हुईं तो फिर जो मां तय करेंगी वही वह करेंगी।

सेल्वा मैरी मान गईं। धीरे-धीरे, जब लोगों ने देखा कि काव्या अच्छा खेल रही हैं तो उनका लहजा बदलने लगा। रिश्तेदार हिम्मत देने लगे। गांव में कुछ लोग ही रह गए जो उनके फुटबॉल खेलने के खिलाफ थे। काव्या ने जब खेलना शुरू किया था तो उनके पास बूट्स थे और न स्टॉकिंग्स। जर्सी भी सिर्फ एक ही थी।

काव्या ने दो साल तक एक ही जर्सी पहनी। काव्या के बूट्स फट जाते थे। वह उन्हें बार-बार सिलती थीं। उस समय तक काव्या को Nike या Adidas जैसे बूट्स के बड़े-बड़े ब्रांड के नाम तक नहीं पता थे। काव्या ने मां से अपनी पढ़ाई पूरी करने की इजाजत मांगी और इसी तरह आगे बढ़ती रहीं।

कॉलेज में दाखिले के बाद Kickstart FC के लिए खेलने बेंगलुरु गईं। यह पहली बार था जब काव्या अकेले इतनी दूर की यात्रा कर रही थीं। सेल्वा मैरी डरी हुई थीं। पूछती रहती थीं कि उसका (काव्या का) ख्याल कौन रखेगा। कैसे खाना खाएगी और क्या वहां सुरक्षित है?

काव्या ने मां को ढांढस बंधाया और कहा कि सब उसकी मदद करेंगे। हर दिन फोन करने का वादा भी किया। काव्या किकस्टार्ट के लिए पांच वर्षों तक खेलीं। इस दौरान सिर्फ दीपावली में ही घर जाती थीं। उन्होंने कई बार पोंगल का त्योहार छोड़ दिया।

सेल्वा मैरी की अपनी दूसरी बेटी और बेटे के साथ रहती थीं। काव्या की अपनी मां से बहुत कम मुलाकात होती थी। सेल्वा मैरी के लिए भी यह बहुत मुश्किल था। भाषा और गृह प्रदेश से दूरी के कारण काव्या को बेंगलुरु में शुरू में तो कुछ मुश्किलें आईं, लेकिन लोग सपोर्टिव थे। बाद में, जब वह सेतु FC में गईं तो उन्हें ‘घर वापसी’ जैसा अनुभव हुआ।

साल 2019 में काव्या ने जब पहली बार इंडियन विमेंस लीग में खेला तो चीजें बहुत अलग थीं। सभी खिलाड़ी एक ही जगह पर रहते थे। खाना, सोना, रिकवरी, सब कुछ मुश्किल था। अब लीग में बहुत सुधार हुआ है। आईडब्ल्यूएल 2 और ज्यादा कॉम्पिटिशन के साथ जूनियर खिलाड़ियों को भी मौके मिल रहे हैं।

तब भी, सब कुछ आसान नहीं रहा। साल 2025 में काव्या के जन्मदिन पर उनका ACL फट गया। काव्या को अहसास तक नहीं था कि यह इंजरी कितनी गंभीर थी। वह अच्छी फॉर्म में थी और अचानक चलने तक के लिए मोहताज हो गईं। मैदान पर लौटने में काव्या को नौ महीने लग गए, लेकिन राष्ट्रीय टीम में वापसी नहीं हुई।

बाद में जब टीम AFC एशियन कप के लिए क्वालिफ़ाई हुई तो काव्या ने मजबूत वापसी की। काव्या को उम्मीद नहीं थी कि वह इतना अच्छा खेल पाएंगी। काव्या अपने क्लब और देश के लिए सब कुछ देने को तैयार हूं। काव्या को उनकी मां ने कभी खेलते नहीं देखा। काव्या के माता-पिता अलग-अलग रहते हैं। काव्या घर की देखभाल में मदद करती हैं। काव्या बस खेलना और सिर्फ खेलना चाहती हैं।