खेलनामा की किताबगाथा के पिछले अंक इंग्लैंड में सड़क हादसे में गंवाई आंख, फिर भी नहीं छोड़ा क्रिकेट, ‘टाइगर’ पटौदी को सुनने पड़ते थे ताने में पढ़ा कि एक आंख गंवा देने से सैफ अली खान के पिता मंसूर अली खान पटौदी को ताने सुनने पड़ते थे। इस कड़ी में हम बताएंगे कि 1966-67 में बवाल के बाद कोलकाता में भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) की गुजारिश पर दंगे के बाद ‘टाइगर’ पटौदी ने कैसे गैरी सोबर्स को खेलने के लिए मनाया था। वरिष्ठ खेल पत्रकार प्रदीप मैगजीन ने अपनी किताब ‘नॉट जस्ट क्रिकेट’में इसके बारे में लिखा है।
प्रदीप मैगजीन लिखते हैं, ‘बातचीत के दौरान पटौदी ने कई ऐसी घटनाओं का जिक्र किया जिनसे उन्हें बहुत निराशा हुई और वे खेल छोड़ना चाहते थे। इनमें से एक घटना 1966-67 में कोलकत्ता में वेस्टइंडीज के खिलाफ टेस्ट मैच के दौरान हुई थी। नाराज भीड़ से खिलाड़ियों की जान को खतरा था। उस घटना के बारे में कई बातें कही जाती हैं और पटौदी ने उसे खिलाड़ियों के नजरिए से बताया।’
क्यों हुआ दंगा
पटौदी ने बताया, ‘मुझे ठीक-ठीक याद नहीं कि क्या दिक्कत हुई थी, लेकिन स्टेडियम खचाखच भरा हुआ था। मुझे लगता है कि राज्य में किसी तरह की राजनीतिक अनिश्चितता का माहौल था। एक स्थानीय नेता ने लोगों को उकसा दिया। हो सकता है कि उसने भाषण भी दिया हो। इसके बाद पुलिस वाले वहां पहुंचे और 70,000 लोगों के सामने उस नेता की पिटाई करने लगे। यह देखकर भीड़ भड़क गई और बेकाबू हो गई।’
पवेलियन में आग लगा दी गई
टाइगर पटौदी ने बताया, हमें जल्दी-जल्दी ड्रेसिंग रूम में ले जाया गया। पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा। उन्होंने आंसू गैस का भी इस्तेमाल किया। मैं अपनी आंखें धोने के लिए बाथरूम गया क्योंकि डॉक्टर ने कहा था कि इससे आंखों को नुकसान हो सकता है। तभी मैंने अमरेंद्र नाथ घोष को देखा जो उस समय क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ बंगाल (CAB) के अध्यक्ष थे। वे बिना बिके टिकटों से भरा ब्रीफकेस पकड़े हुए थे और कह रहे थे मर गया, मर गया। पवेलियन में आग लगा दी गई। हमें उन्हें अपने ‘कॉफिन’ (बॉक्स जिसमें खिलाड़ी अपना सामान रखते हैं) में छिपाना पड़ा और अपने साथ गेट से बाहर निकालना पड़ा।
वेस्टइंडीज ने किया खेलने से मना
टाइगर पटौदी ने बताया,’मुझे नहीं लगता कि भीड़ हमारे खिलाफ थी। इसलिए उन्होंने हमें जाने दिया, लेकिन जब अगले दिन गैरी (सोबर्स, वेस्टइंडीज के कप्तान) ने कहा कि उनकी टीम नहीं खेलेगी तो अधिकारियों ने मुझसे उन्हें खेलने के लिए मनाने को कहा।’ मैंने कहा, ‘मैं ऐसा क्यों करूं, हम तो वैसे भी मैच हार ही जाएंगे।’ फिर बोर्ड के सीनियर सदस्यों ने मुझे कहा,’यह हमारी इज्जत का सवाल है।’
पटौदी ने गैरी को ‘इज्जत’ वाली बात समझाई
टाइगर पटौदी ने बताया,’मैं गैरी के पास गया और कहा कि मुझे लगता है कि तुम्हें खेलना चाहिए और उन्हें ‘इज्जत’ वाली बात समझाई।’ वे हंसने लगे और बोले, ‘हम नहीं खेलने वाले। अगर हम इस पागल भीड़ के सामने खेले तो मारे जाएंगे।’ मैंने कहा, ‘चिंता मत करो, मैं बंगालियों को जानता हूं और भारतीय भीड़ को भी अच्छी तरह समझता हूं। तनाव खत्म हो गया है। वे सब अब शांत हैं और तुम मैच नहीं हारोगे।’
सीएबी ने 100 रुपये दिए
टाइगर पटौदी ने बताया,’आखिरकार वे (वेस्टइंडीज) खेले और उनकी टीम जीत गई। पता है अगले दिन क्या हुआ? सीएबी का एक चमचा मेरे दरवाजे पर आया और मुझे 100 रुपये दिए। उसने कहा कि यह सीएबी की तरफ से तारीफ के तौर पर दिया जा रहा है। मैंने उससे कहा कि यही रकम टीम के हर सदस्य को भी दे।’ भारत और क्रिकेट जगत से जुड़ी रोचक कहानियों के लिए जनसत्ता के साथ जुड़े रहें। खेलनामा की किताबगाथा सीरीज के अगले भाग में बताएंगे कि टाइगर पटौदी के कहने पर सुनील गावस्कर को उपकप्तान बनाया गया और टीम से बात छुपाई, जिससे भारी बवाल हुआ।
सौरव गांगुली की ‘दादागिरी’
सौरव गांगुली को भारतीय क्रिकेट का ‘दादा’ यूं ही नहीं कहा जाता था। मैदान पर उनका आक्रामक अंदाज कई बार विवादों का कारण बना। स्टीव वॉ, एंड्रयू फ्लिंटॉफ और ग्रेग चैपल से जुड़े विवादों के अलावा उनके करियर की 5 ऐसी घटनाएं हैं, जिन्होंने उनकी बेबाक कप्तानी और व्यक्तित्व की अलग तस्वीर पेश की। पूरी खबर पढ़ें।
