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भारतीय क्रिकेट टीम : मध्य क्रम बना सिरदर्द

दुनिया के दिग्गज टीमों में से एक भारत को लेकर इंग्लैंड के पूर्व कप्तान नासिर हुसैन ने एक बयान जारी किया है। उनका मानना है कि भारत भले ही दुनिया की मजबूत टीमों में शामिल है लेकिन आइसीसी टूर्नामेंटों में उसकी चयन नीति सही नहीं है। वह सिर्फ अपने प्लान ‘ए’ पर काम करता है। उसके पास प्लान ‘बी’ नहीं है।

Author नई दिल्ली | Published on: July 9, 2020 4:09 AM
भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान विराट कोहली और रोहित शर्मा।

फुटबॉल और बेसबॉल के बाद अब क्रिकेट भी शुरू हो चुका है। वेस्ट इंडीज और इंग्लैंड के बीच टैस्ट मुकाबले के साथ कोविड-19 के कारण स्थगित अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट का आगाज हुआ। अब प्रशंसकों के बीच आस्ट्रेलिया में अक्तूबर में होने वाले टी-20 विश्व कप को लेकर भी चर्चाएं शुरू हो गई हैं। इसी बीच दुनिया के दिग्गज टीमों में से एक भारत को लेकर इंग्लैंड के पूर्व कप्तान नासिर हुसैन ने एक बयान जारी किया है।

उनका मानना है कि भारत भले ही दुनिया की मजबूत टीमों में शामिल है लेकिन आइसीसी टूर्नामेंटों में उसकी चयन नीति सही नहीं है। वह सिर्फ अपने प्लान ‘ए’ पर काम करता है। उसके पास प्लान ‘बी’ नहीं है। इस बयान का आंकड़ों से मिलान करें तो हुसैन की बातें सौ फीसद उचित हैं। 2015 विश्व कप के बाद के आंकड़ों को देखें तो, भारतीय टीम के लिए ज्यादातर रन उसके कुछ चुनिंदा बल्लेबाजों ने ही बनाए हैं। उसका मध्य क्रम काफी लचर हो चुका है।

दरअसल, हुसैन के बयान ने भारतीय टीम के कप्तान, कोच और प्रबंधन के सामने सवाल खड़ा कर दिया है। भारतीय टीम द्विपक्षीय मुकाबले में काफी शानदार प्रदर्शन कर रही है। आइसीसी टूर्नामेंटों में भी उसका प्रदर्शन बेहतर रहा है। लेकिन किसी भी मुकाबले में अगर शुरुआत के दो बल्लेबाज जल्दी पवेलियन लौट जाएं तो भारतीय टीम के लिए छोटे लक्ष्य को हासिल करना भी मुश्किल हो रहा है।

2015 विश्व कप के बाद के जितने भी आइसीसी टूर्नामेंट हुए उनमें सिर्फ एक मैच में शीर्ष क्रम के खराब प्रदर्शन ने टीम से खिताब छीन लिया। इसकी पड़ताल की जाए तो समझ आता है कि टीम कहां कमजोर पड़ रही है।

2015 विश्व कप से चैंपियंस ट्रॉफी
इस पूरे मामले को तीन चरण में समझा जा सकता है। पहला 2015 विश्व कप से 2017 आइसीसी चैंपियंस ट्रॉफी तक का समय। दूसरा चैंपियंस ट्रॉफी से 2018 एशिया कप तक का समय और तीसरा उसके बाद का दौर। पहले दौर में भारत के हाथ से 2015 विश्व कप निकल चुका था। इसके बाद टीम मध्य क्रम में लगातार प्रयोग करने लगी। सुरेश रैना, मनीष पांडे, केदार जाधव और आजिंक्य रहाणे तक को फेरबदल की सूची में शामिल किया गया। लेकिन प्रयास सफल नहीं हुआ।

इस दौरान खेले गए 27 मैचों में भारतीय टीम के मध्य क्रम ने 36.66 के औसत से रन बनाए और सिर्फ पांच शतक और 11 अर्धशतक बने। हालांकि इस दौरान सबसे अहम योगदान पूर्व कप्तान महेंद्र सिंंह धोनी का रहा। जाधव और पांडे ने भी कुछ बेहतरीन पारियां खेलीं लेकिन निरंतरता के मामले में कप्तान का विश्वास नहीं जीत पाए।

धोनी ने इस दौरान 24 मैचों में 38.80 के औसत से 776 रन बनाए। उन्होंने 892 गेंदों का सामना किया और उनका स्ट्राइक रेट 86.99 रहा। जाधव ने इस दौरान 14 मैचों में 64.00 के औसत से 448 रन बनाए। वहीं पांडे ने 11 मैचों में 43.50 के औसत से 261 रन बनाए।

चैंपियंस ट्रॉफी से 2018 एशिया कप
अब तक मध्य क्रम को सहेजने में लगी भारतीय टीम के लिए यह सिरदर्द बन गई। मध्य क्रम का प्रदर्शन लगातार नीचे जाने लगा था। 36.66 के औसत से रन बनाने वाले मध्य क्रम का प्रदर्शन 32.54 पर आ गया। इस दौरान 41 मैचों में मध्य क्रम में खेलने वाले बल्लेबाजों के बल्ले से कोई भी शतक नहीं निकल पाया। हां, 16 अर्ध शतक जरूर बने। ऊपरी क्रम के तीन बल्लेबाज तो बड़े-बड़े स्कोर बना रहे थे लेकिन चार नंबर से सात नंबर तक के बल्लेबाजों का प्रदर्शन लगातार गिर रहा था।

धोनी को छोड़ दें तो हार्दिक पंड्या, केदार जाधव, दिनेश कार्तिक, मनीष पांडे, रविंद्र जडेजा, सुरेश रैना, केएल राहुल और युवराज सिंह जैसे खिलाड़ियों के बल्ले से रन नहीं निकल रहे थे। धोनी ने इस दौरान 41 मैचों में 47.11 के औसत से 848 रन बनाए। वहीं बेहतरीन हरफनमौला के तौर पर टीम में शामिल पंड्या ने 25.50 के औसत से 35 मैचों में 510 रन बनाए। जाधव के खाते में 30.76 के औसत से 400 रन जुड़े। कार्तिक ने बेहतर खेला लेकिन धोनी के कारण उन्हें पर्याप्त मौका नहीं मिला। अन्य खिलाड़ियों का प्रदर्शन भी बहुत बेहतर नहीं रहा।

एशिया कप के बाद शीर्ष क्रम ने बनाए 60 फीसद रन
एशिया कप के बाद का दौर तो शीर्ष में बल्लेबाजी करने वाले तीन बल्लेबाजों का ही रहा। रन बनाने के नाम पर रोहित शर्मा, शिखर धवन और कप्तान विराट कोहली का ही नाम आया। यह भी कहा जा सकता है कि इस दौरान मध्य क्रम के खिलाड़ियों को बल्ला पकड़ने का मौका भी कम मिला। हालांकि उनके औसत में इजाफा हुआ। लेकिन ऐसे मौके कम ही आए जब किसी मुकाबले में जीत की पूरी भूमिका मध्य क्रम ने निभाई हो।

2018 के मध्य तक के आंकड़ों के मुताबिक शीर्ष क्रम के प्रदर्शन के मामले में भारतीय टीम सबसे ऊपर थी। नंबर तीन तक के बल्लेबाजों (रोहित, धवन और कोहली) ने 2015 विश्व कप से लेकर 2018 तक 59 मैच में 9,076 रन बनाए। जबकि टीम ने कुल 14,620 रन बनाए। इस लिहाज से शीर्ष तीन बल्लेबाजों ने 62.08 फीसद रन बनाए। वहीं इंग्लैंड के शीर्ष क्रम ने 47.18 और दक्षिण अफ्रीका के शीर्ष क्रम ने 49.83 फीसद रन बनाए। निरंतरता के मामले में भी भारतीय शीर्ष क्रम काफी बेहतर रहा और उसने छोटे स्कोर को बड़ा बनाया। भारतीय शीर्ष क्रम के बल्ले से इस दौरान 31 शतक और 52 अर्धशतक निकले।

उनका छोटे स्कोर को बड़ा बनाने का औसत भी लगभग 60 रहा। वहीं इंग्लैंड के शीर्ष क्रम ने 31 शतक और 52 अर्ध शतक जमाए। दक्षिण अफ्रीकी शीर्ष क्रम ने 19 शतक और 38 अर्धशतक बनाए। आस्ट्रेलियाई शीर्ष क्रम ने भी 19 शतक और 37 अर्धशतक लगाए। इन आंकड़ों से पता चलता है कि शीर्ष क्रम के बल्लेबाजों ने इतने गेंद खेले और रन बनाए कि मध्य क्रम के ज्यादातर खिलाड़ियों को बल्लेबाजी का मौका ही नहीं मिला।

भारतीय टीम के लिए यह वरदान और शाप दोनों बन गया है। एक तरफ उसका शीर्ष क्रम किसी भी गेंदबाजी आक्रमण को ध्वस्त करने में माहिर है तो वहीं अगर वे जल्दी आउट हो जाएं तो मध्य क्रम के बल्लेबाज पैट कमिंस, कागिसो रबादा, स्टुअर्ट ब्राड और लुंगी एनगिडी जैसे तेज गेंदबाजों का सामना करने को तैयार ही नहीं है। यही कारण है कि जब किसी मैच में शीर्ष क्रम नाकाम होता है तो भारतीय टीम के लिए छोटा स्कोर भी बड़ा हो जाता है। नासिर हुसैन का प्लान बी इसी ओर इशारा करता है। उनका मानना है कि आप ऐसी लाइनअप तैयार करें जो हर परिस्थिति के लिए तैयार हो।

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