भारत के पूर्व लेग स्पिनर और अनुभवी क्रिकेट विश्लेषक लक्ष्मण शिवरामकृष्णन ने शुक्रवार (20 मार्च) को भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) के कमेंट्री पैनल से संन्यास की घोषणा की। उन्होंने बीसीसीआई पर निशाना साधते हुए टॉस और प्रेजेंटेशन सेरेमनी करने के मौकों की कमी को अपने ब्रॉडकास्टिंग करियर को खत्म करने का कारण बताया। उन्होंने रंगभेद का आरोप लगाते हुए कहा कि उनकी त्वचा के रंग के कारण उन्हें मौके नहीं मिले।
शिवरामाकृष्णन ने 1980 के दशक की शुरुआत में 17 साल की उम्र में बतौर लेग-स्पिनर गुगली और टॉप स्पिन से तहलका मचा दिया था। उन्होंने एक्स पर कमेंट्री से संन्यास लेने का ऐलान करते हुए अपनी निराशा जाहिर की। इससे पता चलता है कि वह काम से बहुत ज्यादा नाखुश थे।
बीसीसीआई राइट्स वाली कंपनी कितना नीचे गिरती है?
शिवरामाकृष्णन ने एक्स पर लिखा, ‘मैं बीसीसीआई के लिए कमेंट्री से रिटायर हो रहा हूं। अगर मुझे 23 साल से टॉस और प्रेजेंटेशन के लिए इस्तेमाल नहीं किया गया और शास्त्री के कोचिंग करते समय भी नए लोग पिच रिपोर्ट, टॉस, प्रेजेंटेशन के लिए आते हैं तो आपको क्या लगता है इसका क्या कारण हो सकता है? बीसीसीआई राइट्स वाली कंपनी कितना नीचे गिरती है? कोई अंदाजा लगा सकता है। मेरा संन्यास कुछ खास नहीं है, लेकिन टीवी प्रोडक्शन की एक कहानी सामने आती है। जल्द ही आप बड़ी तस्वीर देखेंगे।’
भारत के लिए 9 टेस्ट और 16 वनडे खेले
एक यूजर ने पूछा कि क्या उनके त्वचा का रंग कारण है तो शिवरामकृष्णन ने जवाब दिया,’आप सही हैं। रंगभेद।’ 60 साल के शिवरामकृष्णन दो दशक से ज्यादा समय तक कमेंट्री बॉक्स के अंदर खुलकर अपने विचार रखने के लिए जाने जाते थे। वह शिवा के नाम से मशहूर थे। भारत के लिए 1983 से 1986 के बीच 9 टेस्ट और 16 वनडे खेले। 2000 में कमेंट्री की शुरुआत की।
बेन्सन एंड हेजेस वर्ल्ड चैंपियनशिप जीत में अहम भूमिका
शिवरामाकृष्णन ने आईसीसी क्रिकेट कमिटी में खिलाड़ियों के प्रतिनिधि के तौर पर भी काम किया। हालांकि, इस पहले टेस्ट मैच में उन्हें कोई विकेट नहीं मिला, लेकिन बाद में वे 1984 में इंग्लैंड के खिलाफ मैच में 12 विकेट लेकर मशहूर हुए। शिवरामकृष्णन महान सुनील गावस्कर की कप्तानी में ऑस्ट्रेलिया में भारत की 1985 की बेन्सन एंड हेजेस वर्ल्ड चैंपियनशिप जीत में भी एक अहम खिलाड़ी थे। उन्होंने पाकिस्तान के खिलाफ फाइनल में भी अहम भूमिका निभाई। उन्होंने पाकिस्तान को 176/9 पर रोकने में मदद की, जिससे भारत को 8 विकेट से जीत मिली। वह उस टूर्नामेंट में सबसे ज्यादा विकेट लेने वाले गेंदबाज थे, जो उस समय ऑस्ट्रेलिया के हालात को देखते हुए एक स्पिनर के लिए बहुत बड़ी बात थी।
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