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भारत जीत गया, फिर भी मैं नहीं याद रखना चाहूंगा यह सीरीज…

'मुझे इस सीरीज में खिलाड़ियों के बीच दोस्ती क्लीन बोल्ड होती दिखी और खेल भावना की गेंद विवादों के बैट से टकराकर क्रिकेट से मैदान से बाहर पता नहीं कहां खो गई'

Author Updated: March 29, 2017 3:00 PM
अॉस्ट्रेलिया में खेली गई 2008 की बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी में हरभजन सिंह और एंड्रयू साइमंड्स का मंकीगेट विवाद आज भी सबके जहन में ताजा है।

भारत और अॉस्ट्रेलिया के बीच खेली गई बॉर्डर-गावस्कर सीरीज आज खत्म हो गई। भारत ने घर में लगातार चौथी बार अॉस्ट्रेलिया को टेस्ट सीरीज में शिकस्त दी। जैसे ही हमारे बल्लेबाजों ने विजयी रन चुराया होगा, सारे भारतीय फैन्स खुशी से झूम उठे होंगे। अपना देश जीते तो किसे गर्व नहीं होता और अगर अॉस्ट्रेलिया जैसी धाकड़ टीम के खिलाफ जीत मिली हो तो उसका जश्न कुछ अलग ही होता है। भारत जीत गया। खुशी मुझे भी होनी चाहिए, लेकिन हो नहीं रही। रविंद्र जाडेजा, अश्विन, उमेश यादव और कुलदीप यादव की शानदार गेंदबाजी हम सबने देखी, चेतेश्नवर पुजारा का दोहरा शतक भी देखा, लेकिन फिर भी मैं भारत की इस 7वीं सीरीज जीत को याद नहीं रखना चाहूंगा।

जब भी देश की शानदार जीतों की बात होगी तो मेरी उस लिस्ट में बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी 2017 यकीनन शामिल नहीं होगी। एेसा नहीं है कि मैं क्रिकेट का प्रशंसक नहीं हूं या अपनी टीम के खिलाड़ियों से मुझे मोहब्बत नहीं है। लेकिन 4 मैचों की जो सीरीज मैंने देखी, क्या वाकई वह उस भावना से खेली गई, जिसके लिए क्रिकेट जाना जाता है। इस पूरी सीरीज के किसी भी मैच में मुझे खिलाड़ियों का एक-दूसरे के प्रति सम्मान, खेल भावना और जज्बा नजर नहीं आया। दिखाई दिया तो सिर्फ गालियां, एक-दूसरे को नीचा दिखाने की होड़, जुबानी जंग और खेल भावना को एक तरफ रखकर किसी भी तरह जीतने की सनक।

आप भी सोच रहे होंगे कि इसमें नया क्या कहा। अॉस्ट्रेलियाई खिलाड़ी तो हमेशा ही एेसा करते रहे हैं। उनकी पहचान तो इसी से रही है। अॉस्ट्रेलिया में खेली गई 2008 की बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी में हरभजन सिंह और एंड्रयू साइमंड्स का मंकीगेट विवाद आज भी सबके जहन में ताजा है। लेकिन मेरी परेशानी का आधार यही तो है। एक जमाने में अॉस्ट्रेलियाई टीम जिस चीज के लिए जानी जाती रही है, विराट कोहली की टीम भी उसी राह पर चल पड़ी है। खेल भावना और बाकी चीजों से उसे शायद मतलब नहीं रह गया है। चाहिए तो सिर्फ जीत। चाहे मैच शुरू होने से पहले हो, बीच मैच में हो या फिर उसके बाद। पहले खिलाड़ी मैदान पर प्रतिद्वंदी और उसके बाहर दोस्त हुआ करते थे। तस्वीरें गूगल कर लीजिए। सचिन तेंडुलकर और शेन की हाथ में शैम्पेन थामे गिलास वाली फोटो जरूर मिल जाएगी। वॉर्न की गेंदों को तो सपने में भी सचिन कूटा करते थे, लेकिन फिर भी जुबान से किसी ने एक-दूसरे को नहीं लपेटा। लेकिन मुझे इस सीरीज में वह दोस्ती क्लीन बोल्ड होती दिखी और खेल भावना की गेंद विवादों के बैट से टकराकर क्रिकेट से मैदान से बाहर पता नहीं कहां खो गई।

बात यही है कि अगर कोई (अॉस्ट्रेलिया) बेशर्मी पर उतर आया है तो क्या हमें (भारत) को भी उसी रास्ते पर चलना चाहिए। क्या हमारी अपनी खुद की पहचान नहीं है। क्या कप्तान कोहली ने इस सीरीज में अपने खेल का स्तर ऊंचा किया। 3 मैचों में उन्होंने बैटिंग की और सिर्फ 46 रन बनाए। हां जुबान से उन्होंने किसी को नहीं छोड़ा। अॉस्ट्रेलियाई एक बोले तो वह उनसे भी एक कदम आगे नजर आए। मैं मानता हूं कि आक्रामकता अच्छी चीज है, लेकिन अगर विराट एंड कंपनी की यही चीज अगर घमंड में तब्दील हो गई तो जिस तरह किसी जमाने में विश्व क्रिकेट पर राज करने वाली अॉस्ट्रेलिया का गुरूर हमने चूर किया था, वैसे ही कोई न कोई टीम हमारा भी गुरूर चूर कर ही देगी। भले ही चाहे आईसीसी की क्रिकेट बुक में भारत की यह जीत सुनहरे अक्षरों में लिख दी गई हो, लेकिन मैंने 2017 बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी में मिली जीत का पन्ना फाड़ दिया है।

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