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कितनी सुरक्षित हैं महिला खिलाड़ी

कुछ दिन पहले देश के एक जाने माने साइकिलिंग प्रशिक्षक पर यौन उत्पीड़न और अभद्र व्यवहार का आरोप लगा था।

राजेंद्र सजवान

कुछ समय से भारतीय खेलों के बुरे दिन चल रहे हैं। भारतीय ओलंम्पिक एसोसिएशन और विश्व हाकी फेडरेशन (एफआइएच) के अध्यक्ष नरेंद्र ध्रुव बत्रा को कुछ आरोपों के कारण पद छोड़ना पड़ा है। 12 ऐसे खेल हैं, जिनमें खातों में गड़बड़ और महिला खिलाड़ियों के साथ बदतमीजी के कारण कोहराम मचा है। कुछ दिन पहले देश के एक जाने माने साइकिलिंग प्रशिक्षक पर यौन उत्पीड़न और अभद्र व्यवहार का आरोप लगा था।

नतीजन स्लोवेनिया में प्रशिक्षण कर रही टीम को स्वदेश लौटना पड़ा। यह सही है कि टीम की तैयारी पर बुरा असर पड़ा लेकिन भारतीय खेल प्राधिकरण के कदम की खेल हलकों में प्रशंसा हुई। संभवतया यह पहला मौका था जब किसी खिलाड़ी की शिकायत पर साईं ने गम्भीरता दिखाई और तुरंत कार्यवाही की है।

पता चला है कि ट्रैक स्प्रिंट टीम के मुख्य प्रशिक्षक के विरुद्ध जांच कमेटी बिठा दी गई है। कमेटी की प्राथमिक रिपोर्ट के आधार पर कोच कुछ समय से खिलाड़ी को लगातार परेशान कर रहा था और उस पर दबाव बना रहा था। साइकिलिस्ट को इस कदर प्रताड़ित किया गया कि उसे सामने आना पड़ा। साइकिलिंग फेडरेशन ने उसकी शिकायत को आगे बढ़ाया और खेल मंत्रालय के निर्देशानुसार टीम को बीच दौरे से लौटना पड़ा।

अब एक फुटबाल प्रशिक्षक पर कुछ इसी तरह का आरोप लगा है। अंडर-17 महिला विश्व कप के लिए विदेश में ट्रेनिंग ले रही टीम की एक खिलाड़ी ने कोच के विरुद्ध शिकायत की और कोच महाशय को बीच दौरे से वापस बुलाया जा चुका है। भारतीय खेलों पर सरसरी नजर डालें तो अधिकांश खेलों में महिला खिलाडियों के साथ उत्पीड़न की घटनाएं होती रही हैं।

साइकिलिंग और फुटबाल में भी ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। कुछ साल पहले भारतीय खेल प्राधिकरण के एक उच्च अधिकारी ने माना था कि महिला खिलाडी प्राय: अपने साथ उत्पीड़न पर चुप रह जाती हैं। निम्न मध्यम वर्ग की हाकी, फुटबाल, जूडो, ताइक्वांडो, बास्केटबाल, मुक्केबाजी, तीरंदाजी और तमाम खेलों से जुड़ी अनेक खिलाडियों की शिकायतें विभाग के ठंडे बस्ते में पड़ी हैं।

कुछ साल पहले स्कूल गेम्स फेडरेशन की फुटबाल टीम की एक महिला खिलाड़ी के साथ अभद्र व्यवहार करने वाला एक कोच सलाखों के पीछे जरूर गया लेकिन अब वह सरेआम घूम रहा है। गरीब परिवार की उस खिलाड़ी की जान आस्ट्रेलिया में डूबने से हुई थी, जिसके लिए कोच को कुसूरवार पाया गया था। लड़कियां कोच से बच कर तैरने गई थीं। ऐसा इसलिए क्योंकि कोच मौकों की तलाश में रहता था और लड़कियों के साथ बदतमीजी का कोई मौका नहीं छोड़ता था। कुछ साल बाद इसी कोच ने बालकों की 15 साल तक की टीम के कुछ खिलाडियों के साथ बदतमीजी की, लेकिन शिकायत दर्ज करने के बाद भी उस पर कोई कार्रवाई नहीं की गई।

1982 के दिल्ली एशियाड के कारण पूर्वोत्तर की कुछ साइकिलिस्ट के साथ दुर्व्यवहार की शिकायतें सामने आईं और दबा दी गईं। कोलकाता, मणिपुर, मुंबई, यूपी, एमपी, दिल्ली और कई अन्य प्रदेशों की फुटबाल खिलाडियों ने प्रशिक्षकों और राज्य इकाइयों के अधिकारियों के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए लेकिन ज्यादातर ने लोकलाज को देखते हुए दोषियों को और गुनाह करने के लिए माफ कर दिया।

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