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हिमालय जितनी ऊंचाई पर हिमा

जब भारतीय प्रशंसकों की निगाहें इंग्लैंड में खेल रही क्रिकेट टीम पर थीं तब एथलेटिक्स की एक खबर ने देश को गौरान्वित कर दिया। ट्रैक एंड फील्ड में एक लड़की ने देश के लिए वह कारनामा कर दिखाया जो उड़नपरी पीटी ऊषा और उड़नसिख मिल्खा सिंह भी नहीं कर पाए।

Author July 26, 2018 5:07 AM
जब भारतीय प्रशंसकों की निगाहें इंग्लैंड में खेल रही क्रिकेट टीम पर थीं तब एथलेटिक्स की एक खबर ने देश को गौरान्वित कर दिया।

जमनीष कुमार जोशी

जब भारतीय प्रशंसकों की निगाहें इंग्लैंड में खेल रही क्रिकेट टीम पर थीं तब एथलेटिक्स की एक खबर ने देश को गौरान्वित कर दिया। ट्रैक एंड फील्ड में एक लड़की ने देश के लिए वह कारनामा कर दिखाया जो उड़नपरी पीटी ऊषा और उड़नसिख मिल्खा सिंह भी नहीं कर पाए। फिनलैंड में आयोजित विश्व अंडर 20 ट्रैक एंड फील्ड स्पर्धा में भारत की हिमा दास ने 400 मीटर दौड़ में स्वर्ण पदक हासिल किया और ट्रैक में ऐसा करने वाली पहली भारतीय बन गर्इं। उनकी इस जीत ने ट्रैक एंड फील्ड स्पर्धा में भारत के युवाओं के लिए नई राह खोल दी।

हिमा के लिए यह पदक जीतना आसान नहीं था। उन्हें इसके लिए समाज और आर्थिक स्थितियों से जूझना पड़ा है। साथ ही उनके हाल का अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शन भी ऐसा नहीं रहा जिससे उनसे बड़ी प्रतियोगिताओं में सोने की उम्मीद लगाई जा सके। हिमा ने इसी साल राष्ट्रमंडल खेलों के 400 मीटर स्पर्धा में भारत की ओर से फाइनल में जगह बनाई। यहां उन्होंने 51.31 सेकंड के समय से छठा स्थान हासिल किया। वहीं 4 गुणा 400 मीटर की टीम स्पर्धा में भारतीय टीम ने सातवां स्थान हासिल किया। यहां इन दोनों स्पर्धाओं के फाइनल में पहुंचने को ही बड़ी उपलब्धि माना गया। इसे ही आधार माना जाए तो, ऐसे प्रदर्शन से तो स्वर्ण पदक दूर की बात है किसी अन्य पदक की भी उम्मीद नहीं की जा सकती है। हिमा बगैर किसी उम्मीद के फिनलैंड गर्इं और कुछ ऐसा कर दिया जिससे बड़े-बड़े दिग्गज भी अचंभे में पड़ गए।

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उनकी दौड़ को देखें तो शुरुआत में वे काफी पिछड़ रही थीं और अंतिम 100 मीटर में जोर लगाकर सभी धाविकाओं को पीछे छोड़ दिया। इस उपलब्धि से देश में खुशी की लहर दौड़ गई। सबकी जुबां पर हिमा का ही नाम था। हालांकि उनके घरवालों को भरोसा था कि वे एक दिन ऐसा करेंगी। बचपन में धान के खेतों में दौड़ लगाते हुए शायद हिमा ने भी यही सपना देखा था। हालांकि इस बीच एक ऐसी घटना घटी जिसने देश को शर्मसार कर दिया। गूगल के मुताबिक उनके स्वर्ण पदक जीतने के बाद कई भारतीयों ने इंटरनेट पर उनकी जाति के बारे में पता लगाने की कोशिश की। यह संख्या इतनी बड़ी थी कि यह गूगल पर ट्रेंड करने लगा।

अब यह हमारे समाज की मानसिकता को दर्शाता है कि आखिर हम किस युग में जी रहे हैं। एक ऐसा गांव जहां एथलीट बनने के लिए बेहद ही कम संभावनाएं थीं, वहां से कोई लड़की इस उपलब्धि को हासिल करती है तो यह अपने आप में काफी खास है। हालांकि भारत की मीडिया और अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने इसकी जमकर आलोचना की। साथ ही उनकी अंग्रेजी पर जो टिप्पणी की गई उसके लिए भी सार्वजनिक तौर पर माफी मांगनी पड़ी। इन सब से हटकर देखें तो हिमा की इस सफलता ने कई अन्य युवाओं के लिए संभावनाओं के द्वार खोल दिए हैं। अब भारत को एशियाई और ओलंपिक खेलों में उनसे उम्मीदें हैं।

फुटबाल और क्रिकेट में भी माहिर

हिमा के गांव के लोग कहते हैं कि वे इतनी तेज दौड़ती हैं कि कुछ दूरी के लिए कार को भी पीछे छोड़ दें। वे क्रिकेट भी खेलती थीं और साथ में फुटबॉल में भी उनका कोई सानी नहीं था। हालांकि उनकी प्रतिभा को उनके पिता ने पहचाना और उन्हें एथलीट बनाने का निश्चय किया। पिता रणजीत दास ही उनके पहले कोच थे।जब कामयाबी मिलने लगी तो उनके शुरुआती कोच निपोदास उन्हें गुवाहाटी ले गए। जिस समाज से हिमा आती हैं, उनके पिता के लिए यह फैसला आसान नहीं था लेकिन अपनी बेटी को एथलीट बनाने के लिए उन्होंने किसी की परवाह नहीं की।

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