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कभी हार ना मानने वाला गोल्ड मेडलिस्ट बॉक्सर कैंसर से हारा, आसान नहीं थी डिंको सिंह के अनाथालय से एशियाड चैंपियन बनने की राह

डिंको सिंह ने 1998 बैंकॉक एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीता था। इस स्पर्धा में भारत ने 1982 के बाद कोई स्वर्ण पदक जीता था। डिंको सिंह से पहले 1982 में दिल्ली में हुई एशियाई खेलों में कौर सिंह ने स्वर्ण पदक जीता था।

Edited By आलोक श्रीवास्तव नई दिल्ली | Updated: June 10, 2021 5:41 PM
डिंको सिंह ने 1998 बैंकॉक एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीता था। इस स्पर्धा में भारत ने 1982 के बाद कोई स्वर्ण पदक जीता था। (सोर्स- ट्विटर/किरन रीजीजू)

बॉक्सिंग रिंग में कभी हार नहीं मानने वाले डिंको सिंह आखिरकार कैंसर को मात नहीं दे पाए। यकृत के कैंसर से लंबे समय तक जूझने के बाद उनका गुरुवार (10 जून 2021) को निधन हो गया। वह 42 साल के थे। वह 2017 से इस बीमारी से जूझ रहे थे। उनके परिवार में पत्नी बाबइ नगानगोम तथा एक पुत्र और पुत्री हैं। उनके निधन से भारतीय मुक्केबाजी में एक बड़ा शून्य पैदा हो गया।

डिंको सिंह ने कभी ओलंपिक पदक नहीं जीता। इसके बावजूद उन्होंने भारतीय मुक्केबाजी में अमिट छाप छोड़ी, जो भावी पी​ढ़ी को भी प्रेरित करती रहेगी। डिंको सिंह की सबसे बड़ी उपलब्धि बैकाक एशियाई खेल 1998 में स्वर्ण पदक जीतना था। यह भारत का मुक्केबाजी में इन खेलों में 16 साल में पहला स्वर्ण पदक था। उनके प्रदर्शन का भारतीय मुक्केबाजी पर बड़ा प्रभाव पड़ा। उनसे प्रेरित होकर कई युवाओं ने इस खेल को अपनाया। इनमें ओलंपिक पदक विजेता भी शामिल हैं।

इनमें एमसी मैरीकॉम भी हैं। मैरीकॉम को मुक्केबाजी में अपना सपना पूरा करने के लिए घर के पास ही प्रेरणादायी नायक मिल गया था। मैरीकॉम के अलावा पूर्वोत्तर के कई मुक्केबाजों पर डिंको का प्रभाव पड़ा। इनमें एम सुरंजय सिंह, एल देवेंद्रो सिंह और एल सरिता देवी भी शामिल हैं। डिंको ने एक बार पीटीआई से कहा था, ‘मुझे विश्वास नहीं था कि मेरा इतना व्यापक प्रभाव पड़ेगा। मैंने कभी ऐसा नहीं सोचा था।’

डिंको सिंह मुक्केबाजी के सुपरनोवा थे। हालांकि, उनका अनाथालय से एशियाड चैंपियन बनने का सफर बहुत आसान नहीं रहा था। डिंको का जन्म इंफाल के सेकता गांव में एक गरीब परिवार में हुआ था। उनके माता-पिता के लिए दो वक्त की रोटी का प्रबंध करना भी मुश्किल था। इस कारण उनके माता​ पिता को उन्हें स्थानीय अनाथालय में छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा।

भारतीय खेल प्राधिकरण (साई) द्वारा शुरू किए गए विशेष क्षेत्र खेल कार्यक्रम (सैग) के लोगों की अनाथालय में ही डिंको पर नजर पड़ी थी। डिंको प्रतिभाशाली होने के साथ-साथ मजबूत शा​रीरिक क्षमता के भी धनी थे। वह अपने प्रतिद्वंद्वी से कभी नहीं घबराते थे।

राष्ट्रमंडल खेलों के स्वर्ण पदक विजेता मुक्केबाज अखिल कुमार ने कहा, ‘उन पर किसी का नियंत्रण नहीं था। उन्हें वश में नहीं किया जा सकता था।’ भारतीय मुक्केबाजी में डिंको की पहली झलक 1989 में अंबाला में राष्ट्रीय सब जूनियर में देखने को मिली थी।

तब वह 10 साल की उम्र में राष्ट्रीय चैंपियन बने थे। यहां से शुरू हुई उनकी यात्रा सतत चलती रही। वह बैंथमवेट वर्ग में ऐसे विश्वस्तरीय मुक्केबाज बन गए, जो बड़ी प्रतियोगिताओं में अपना कारनामा दिखाने के लिए तैयार था।

डिंको के साथ राष्ट्रीय शिविरों में हिस्सा ले चुके अखिल ने कहा, ‘उनके बाएं हाथ का मुक्का, आक्रामकता… वह बेहद प्रेरणादायी थी। मैंने राष्ट्रीय चैंपियनशिप के दौरान उन्हें गौर से देखा था। वह क्या दमदार व्यक्तित्व के धनी थे। मैं जानता था कि वह रिंग पर कितने आक्रामक थे, क्योंकि राष्ट्रीय शिविरों में मैंने भी उनके कुछ मुक्के झेले थे।’

डिंको की आक्रामकता के उनके व्यक्तित्व में भी झलकती थी। उन्होंने 1998 में एशियाई खेलों की टीम में नहीं चुने जाने पर आत्महत्या करने की धमकी तक दे डाली थी। आखिरकार उन्हें टीम में चुना गया और उन्होंने इसे सही साबित करके स्वर्ण पदक जीता, जिसके लिये उन्हें अर्जुन पुरस्कार और पद्मश्री से नवाजा गया।

बैकाक एशियाई खेलों के दौरान राष्ट्रीय कोच रहे गुरबख्श सिंह संधू ने कहा, ‘वह नाटकीय हो सकते थे. लेकिन आप उस जैसी प्रतिभा के धनी मुक्केबाज से नहीं लड़ सकते थे।’ हालांकि, यह प्रतिभाशाली मुक्केबाज शराब का आदी हो गया, जो उनकी बर्बादी का कारण बनी। इससे उन्हें कई तरह की बीमारियों से जूझना पड़ा।

ओलंपिक 2000 और राष्ट्रमंडल खेल 2002 में जल्दी बाहर होने के बाद डिंको का करियर लगभग समाप्त हो गया। इसके कुछ समय बाद उन्होंने मुक्केबाजी से संन्यास लेकर इम्फाल में साई केंद्र में कोचिंग का जिम्मा संभाला। उन्हें 2014 में कथित तौर पर एक महिला भारोत्तोलक को पीटने के कारण निलंबित कर दिया गया था।

ऐसे कई अन्य किस्से हैं, जब डिंको ने अपना आपा खो दिया था। अखिल के अनुसार, ‘उन्होंने कभी निजी लाभ के लिए किसी की मिन्नत नहीं की। फिर चाहे वह कोच हो, महासंघ या अधिकारी। उन्हें अपनी प्रतिभा पर इतना भरोसा था। इसलिए वह नायक थे।’

इस स्टार मुक्केबाज को 2017 में पता चला कि वह कैंसर से पीड़ित हैं। पिछले साल वह पीलिया और फिर कोविड-19 से संक्रमित हो गये थे, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। बीमारी से उबरने के बाद उन्होंने कहा था, ‘यह आसान नहीं था लेकिन मैंने स्वयं से कहा, लड़ना है तो लड़ना है। मैं हार मानने के लिये तैयार नहीं था। किसी को भी हार नहीं माननी चाहिए।’ उन्हें उम्मीद थी कि वह कैंसर जैसी बीमारी से लड़कर वापसी करेंगे लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।

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