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2016 में बेहद परेशान थे हनुमा विहारी तब कोच ने मांगे थे तीन साल, डेडलाइन से पहले ही पूरा किया वादा

आज सौरभ गांगुली और राहुल द्रविड की बराबरी करने वाले हनुमा विहारी ने कभी क्रिक्रेट छोड़ने तक का मन बना लिया था। लेकिन उनके कोच ने उनका मनोबल बढ़ाया। तीन साल का समय मांगा और डेडलाइन से पहले अपने वादे को पूरा कर दिखाया।

Author September 10, 2018 12:07 PM
कोच सनथ कुमार के साथ हनुमा विहारी (एक्सप्रेस फाइल फोटो)

इंग्लैंड के खिलाफ पांचवे टेस्ट मैच में जब ऑलराउंडर हुनमा विहारी को शामिल किया गया तो टीम प्रबंधन के इस फैसले से कई लोग हैरान रह गए। लेकिन हनुमा विहारी ने अपने प्रदर्शन से यह साबित कर दिया कि उन्हें टीम में शामिल करने का फैसला बिल्कुल सही था। उन्होंने अपने डेब्यू टेस्ट मैच की पहली पारी में ही अर्धशतक लगाया। इसके साथ ही सौरभ गांगुली और राहुल द्रविड की बराबरी भी कर ली। लेकिन आज जिस हनुमा विहारी को क्रिकेट प्रशंसक भारतीय क्रिकेट का भविष्य बता रहे हैं, वे शायद ही उनके संघर्ष की कहानी को जानते होंगे। आज सौरभ गांगुली और राहुल द्रविड की बराबरी करने वाले हनुमा विहारी ने कभी क्रिक्रेट छोड़ने तक का मन बना लिया था। लेकिन उनके कोच ने उनका मनोबल बढ़ाया। तीन साल का समय मांगा और डेड लाइन से पहले अपने वादे को पूरा कर दिखाया।

वर्ष 2016 की बात है। एक दिन हनुमा विहारी काफी परेशान थे, तभी उनके कोच सनथ कुमार का फोन आता है और वे उन्हें होटल के कमरे में बुलाते हैं। सनथ कुमार आध्रा के कोच थे और उन्होंने नोटिस किया कि ये नया खिलाड़ी थोड़ा परेशान है। सनथ ने उलझन की वजह पूछी। विहारी ने छह साल प्रथम श्रेणी का क्रिकेट खेलने के बाद हैदराबाद छोड़ दिया था और इस दौरान के अपने अनुभव से परेशान थे। उन्होंने कहा, “मैं पूरी बात डिटेल में नहीं बता सकता, बस इतना कह सकता हूं कि वहां का मेरा अनुभव बढि़या नहीं रहा।” उस दिन होटल में एक लंबी बातचीत के बाद सनथ ने विहारी से एक वादा किया था। उन्होंने कहा था, “आप खेल छोड़ने या उस तरह से कुछ भी करने जैसे मूर्खतापूर्ण हरकत नहीं करेंगे। मैं वादा करता हूं कि आप मुझे अपने क्रिकेट का तीन साल दो, मुझे उम्मीद है कि आप टीम इंडिया के लिए खेलेंगे। आप अच्छे हो। जहां भी मैं जाऊंगा, मैं आपको ले जाऊंगा।” आज तीन साल की डेडलाइन से पहले कोच ने अपना वादा पूरा कर दिखाया। हनुमा विहारी टीम इंडिया के लिए खेल रहे हैं।

सनथ कहते हैं, “जामवंत से लेकर हनुमान तक को उनकी ताकत के बारे में बतानी पड़ी थी। मुझे याद है कि मेरे द्वारा समझाए जाने के बाद वह बहुत खुश था। मुझे बताया कि वह पूरी तरह से खुद को खेल के लिए समर्पित कर देगा। अब न तो आत्म-संदेह रहा और न हीं किसी तरह की उलझन।” उसने ऐसा किया। वह न सिर्फ खुद को व्यक्तिगत रूप से बदलना चाहता है, बल्कि टीम की संस्कृति को बदलने के लिए भी समर्पित होगा। सनथ आगे कहते हैं, ” मैं विश्वास के साथ कह सकता हूं कि उसने खेल के प्रति जो समर्पण दिखाई और ध्यान केंद्रित किया, वह दूसरे कई अन्य खिलाडि़यों के मुकाबले कहीं ज्यादा था। वह लगातार उनसे बात करेंगे और सही तरीके से प्रशिक्षण देंगे। उसके अंदर की नेतृत्व क्षमता को उभारेंगे।”

हालांकि, उस लड़के के लिए जिसने 12 साल की उम्र में अपने पिता को खो दिया था, उनकी मां और उसका भाई उनके अभिभावक थे, इस मुकाम को हासिल करना बेहद संघर्षपूर्ण रहा। विशेष रूप से उनके चाचा ने आगे बढ़ाने में काफी मदद की। सनथ याद करते हैं कि दोनों कितने करीब थे। पिछले साल एक दिन विहारी फिर से उलझन में थे। सनथ ने पाया कि उनके चाचा गुर्दे की बीमारी से पीड़ित थे। सनथ कहते हैं कि, “चाचा के इलाज के लिए विहारी ने काफी पैसा और समय खर्च किया। एक बार आपॅरेशन भी हुआ। लेकिन चाचा जीवित नहीं बचे।” सनथ ने इस पूरे घटनाक्रम को देखा और कुछ करने का फैसला किया। वे कहते हैं, “इस बार कोई बड़ी बात करने की जरूरत नहीं थी। मैं इसे टीम इंडिया में खेलाने के लिए दृढ़ संकल्पित था। इस गरीब लड़के ने अपने जीवन में काफी संघर्ष किया। आज मुझे उसे टीम इंडिया में खेलते हुए देखकर काफी खुशी हो रही है।”

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