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…जब स्‍कूल के कोच ने बदल दी थी जीवन की दिशा, आगे चलकर इस एथलीट ने एशियन गेम्‍स में जीता गोल्‍ड मेडल

1962 एशियन गेम्स में डेकाथलन में गोल्ड मेडल जीतने वाले भारतीय एथलीट गुरबचन सिंह ने दिल छू लेने वाली अपनी अनकही कहानी साझा की है। गुरबचन सिंह को 1962 में ही एशिया का सबसे अच्छा एथलीट घोषित कर दिया गया था। एथलेटिक्स में उन्होंने अपार सफलता हासिल की।

गुरबचन सिंह रंधावा की फाइल फोटो। (सोर्स- एक्सप्रेस आर्काइव)

1962 एशियन गेम्स में डेकाथलन में गोल्ड मेडल जीतने वाले भारतीय एथलीट गुरबचन सिंह ने दिल छू लेने वाली अपनी अनकही कहानी साझा की है। गुरबचन सिंह को 1962 में ही एशिया का सबसे अच्छा एथलीट घोषित कर दिया गया था। एथलेटिक्स में उन्होंने अपार सफलता हासिल की। 1960 और 1964 के ओलंपिक्स में भी उन्होंने हिस्सा लेकर भारत का नाम रौशन किया। पंजाब के गांव नंगली में 1939 को जन्मे गुरबचन सिंह का 12 वर्ष की उम्र तक एथलेटिक्स के साथ कुछ लेना-देना नहीं था। वह अपने पिता की तरह फुटबॉल और वॉलीबॉल खेला करते थे। स्क्रॉल की रिपोर्ट के मुताबिक उन्हीं दिनों एक बार वह खेलने के बाद पानी पीने के लिए निकले तो उनकी जिंदगी बदल गई। टहलते हुए वह जैसे ही एक बेडमिंटन नेट के करीब आए तो उन्होंने झुककर उसके नीचे से न निकलकर उसे फांदकर जाना उचित समझा और छलांग लगा दी। इस दौरान उनके स्कूल के एक फिजिकल ट्रेनर ने उन्हें बेडमिंटन का नेट फांदने वाला स्टंट करते हुए देख लिया और तलब कर लिया।

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गुरबचन सिंह के मुताबिक तब वह डर गए थे। उन्हें लगा कि सजा मिलेगी और पिटाई के लिए खुद को तैयार कर लिया। कोच ने उन्हें सजा देने के बजाय फिर से नेट को फांदने के लिए कहा। कोच ने रंधाबा को बताया कि उन्होंने पांच फुट से ज्यादा ऊंचे नेट को फांदा है। रंधावा के मुताबिक उन्हें नहीं पता था कि नेट की ऊंचाई क्या थी, वह बिना सोचे उसे फांद गए थे। उन्होंने अपने टीचर की आज्ञा पाकर फिर से नेट के ऊपर से छलांग लगा दी। रंधावा के मुताबिक इस प्रकार उनका कामयाबी से भरा करियर शुरू हो गया।

रंधावा जब हाईस्कूल में आए तो उन्होंने एथलेटिक्स में मेडल जीतने शुरू कर दिए। जब वह कॉलेज में थे तो उन्होंने 1957 में ऊंची कूद में ऑल इंडिया यूनिवर्सिटी रिकॉर्ड हासिल किया था। 21 वर्ष की उम्र में उन्होंने डेकाथलन में नेशनल टाइटल जीत लिया। यह उनका पहला नेशनल ईवेंट था और उन्होंने इसमें सीएम मुथैया का हाई जंप का रिकॉर्ड तोड़ दिया था। रंधावा 1961 में अर्जुन अवॉर्ड पाने वाले पहले भारतीय एथलीट बने। रंधावा ने बताया कि जब उन्हें अखबार के माध्यम से पता चला कि उनका नाम पुरस्कार के लिए नामित किया गया तो उन्हें अर्जुन अवॉर्ड के बारे में जानकारी नहीं थी। खुशी बस इस बात की थी कि राष्ट्रपति भवन के लिए निमंत्रण मिला था। उन्होंने बताया कि उस वक्त इस पुरस्कार के लिए नकद राशि या इंसेंटिव नहीं मिलता था। लोगों को भी पता नहीं था कि अर्जुन पुरस्कार क्या होते हैं।

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