ताज़ा खबर
 

बदलाव: खेलों की पेशेवर दुनिया से बढ़ता मोह

दुनिया भर में खेलों का जिस तरह का बाजार बन गया है उसमें पेशेवर-गैर पेशेवर का फर्क तेजी से खत्म हो गया है।

Author Published on: June 28, 2018 5:33 AM
पैसे की चकाचौंध में खिलाड़ियों को गुम हो जाने से बचाने के लिए अब कई देशों में एशियाई या ओलंपिक खेलों में सफलता पाने वाले खिलाड़ियों को प्रोत्साहन राशि देने का सिलसिला शुरू हुआ है।

श्रीशचंद्र मिश्र

दो साल पहले पैंतीस साल की उम्र में अखिल कुमार ने अगर पेशेवर मुक्केबाजी अपनाने का फैसला किया तो उसकी कई वजहें हैं। पेशेवर हो जाने के बाद विजेंदर सिंह को जिस तरह की ख्याति मिली है, उसका आकर्षण तो सबसे बड़ा था ही। उतनी ही महत्त्वपूर्ण वजह यह दुविधा भी थी कि करिअर के ढलान पर आखिर ऐसा वे क्या करें कि नाम भी बचा रहे और पैसा भी मिल जाए। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संभावित विजेताओं की कतार में अखिल अरसे से नहीं हैं। 2006 के राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण कप व एशियाई चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीतने के बावजूद 2008 के बीजिंग ओलंपिक में किए गए जुझारू प्रदर्शन की वजह से अखिल को आज भी याद किया जाता है। तब वे क्वार्टर फाइनल में हार गए थे। उसके बाद ओलंपिक में किस्मत आजमाने का मौका फिर नहीं मिल पाया। पेशेवर का तमगा लगाने के पीछे एक वजह यह भी थी कि इंटरनेशनल बाक्सिंग एसोसिएशन ने पेशेवर मुक्केबाजों के ओलंपिक खेलों में हिस्सा लेने पर लगा प्रतिबंध खत्म कर दिया था। यानी अखिल नुमाइशी मुकाबलों में हिस्सा लेते हुए ओलंपिक में पदक जीतने का सपना पूरा करने के लिए कोशिश कर सकते हैं।

सवाल यह नहीं है कि 2020 के तोक्यो ओलंपिक में तब 39 साल के हो चले अखिल कुमार रंगत दिखा पाते हैं या नहीं? मुख्य सवाल यह है कि एक मुक्केबाज के रूप में उनका श्रेष्ठ समय एमेच्योर (गैर पेशेवर) रहे अखिल कुमार को पेशेवर बनने की क्या सूझी? वे हरियाणा पुलिस में हैं और हिसार में डीएसपी के पद पर नियुक्त हैं। उन्हें कुछ साबित भी नहीं करना था सिवा इसके कि अगर लगन और क्षमता हो तो बढ़ती उम्र में भी बहुत कुछ किया जा सकता है। बहरहाल, पेशेवर दुनिया में जाने का फैसला अखिल कुमर का व्यक्तिगत मामला था। हो सकता है नए मंच पर उन्हें अपने लिए उपलब्धि और आर्थिक लाभ के मामले में ज्यादा संभावना दिखी हो। वैसे भी जब वे भारत में कई खेलों की पेशेवर लीग होने लगी है, किसी खिलाड़ी का पेशेवर खेलों की तरफ रुख करना या पैसे के लिए खेलना पहले की तरह निंदनीय नहीं रह गया है। हालांकि 2016 में जब रियो ओलंपिक में हिस्सा न लेकर विजेंदर सिंह ने पेशेवर मुक्केबाजी को प्राथमिकता दी थी तो यह बहस उठी थी कि किसी खिलाड़ी को देश के सम्मान के लिए खेलना चाहिए या पैसे को तरजीह देनी चाहिए। विजेंदर सिंह का मामला थोड़ा विवादास्पद हो गया था। यह सही है कि उन्हें इस बात का पूरा अधिकार था कि वे अपने करिअर की दिशा तय करें। लेकिन एक सावधानी तो उन्हें जरूर बरतनी चाहिए थी कि रियो ओलंपिक खेलों में अगर हिस्सा लेने का उनका मन नहीं था, तो खेल मंत्रालय की ‘टॉप्स’ योजना से जुड़ने से उन्हें मना कर देना चाहिए था।

दुनिया भर में खेलों का जिस तरह का बाजार बन गया है उसमें पेशेवर-गैर पेशेवर का फर्क तेजी से खत्म हो गया है। दुनिया भर में 32 खेलों की पांच सौ से ज्यादा पेशेवर लीग होती हैं। इनसे जुड़ने वाले खिलाड़ियों के लिए यह बाध्यता नहीं होती कि वे देश का प्रतिनिधित्व करें ही। भारतीय खिलाड़ियों को खेलों की पेशेवर दुनिया कुछ ज्यादा ही लुभा रही है। सितंबर 2015 में चीन के हुनान में हुई एशियाई बास्केटबाल प्रतियोगिता में भारतीय टीम का हिस्सा बनने से सतनाम सिंह भामरा ने मना कर दिया। यही नहीं अगले दो साल तक भारतीय टीम में शामिल न होने का भी उन्होंने फैसला कर लिया।

पैसे की चकाचौंध में खिलाड़ियों को गुम हो जाने से बचाने के लिए अब कई देशों में एशियाई या ओलंपिक खेलों में सफलता पाने वाले खिलाड़ियों को प्रोत्साहन राशि देने का सिलसिला शुरू हुआ है। भारत में तो खिलाड़ियों में इस बात की आतुरता पनपने लगी है कि केंद्र या राज्य सरकारें उनकी उपलब्धि का उचित सम्मान क्यों नहीं करतीं। सम्मान का मतलब नगदी से है। पिछले कुछ सालों से अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों खास कर ओलंपिक, एशियाई या राष्ट्रमंडल खेलों में सफलता पाने वाले खिलाड़ियों को पुरस्कार राशि मिलने लगी है जो अब बेहद आकर्षक हो गई है। लेकिन इसमें अंसतुलन बहुत है। सबको एक जितनी सरकारी कृपा नहीं मिल पाती। इसीलिए खिलाड़ी इनामी मुकाबलों को ज्यादा तरजीह देने लगे हैं।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हर खेल इतना प्रतिस्पर्धात्मक हो गया है कि उसमें सफलता पाने के लिए निरंतर जूझना पड़ता है। यह दबाव अक्सर शरीर नहीं झेल पाता। शरीर को स्वस्थ और संतुलित रखने की तमाम आधुनिक सुविधाओं के बावजूद खिलाड़ियों की श्रेष्ठता का जीवनकाल बहुत कम रह गया है। ऐसे में खिलाड़ियों के सामने खेल को पेशा बनाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं रह गया है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

Next Stories
1 Serbia vs Brazil, फीफा विश्व कप 2018: ब्राजील ने सर्बिया को 0-2 से हराकर विश्वकप से किया बाहर
2 Pakistan vs Kenya, Kabaddi Masters Dubai 2018: केन्या को 42-20 से हराकर सेमीफाइनल में पहुंचा पाकिस्तान
3 South Korea vs Argentina, Kabaddi Masters Dubai 2018: अर्जेंटीना को हरा सेमीफाइनल में पहुंची दक्षिण कोरिया, अब होगा भारत से सामना