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‘सर्वोच्च हस्तक्षेप’ के बाद ही गई गद्दी

दरअसल पटेल का कार्य काल 2020 में समाप्त हो चुका था लेकिन दो साल बाद तक भी उन्होंने फेडरेशन अध्यक्ष बने रहकर अपनी सदस्य इकाइयों को हैरान परेशान किया।

राजेंद्र सजवा

देर से ही सही, शराफत के साथ न सही, लेकिन अखिल भारतीय फुटबाल फेडरेशन (एआइएफएफ) के अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद प्रफुल्ल पटेल की भारतीय फुटबाल से विदाई हो गई है। अब उनकी वापसी की संभावना जरा भी नहीं बची है। कारण, चार साल के तीन कार्यकाल पूरा करने और उसके बाद दो साल फालतू लगाने के बाद भी जब उन्होंने फेडरेशन के शीर्ष पद को नहीं छोड़ा तो अंतत: माननीय सर्वोच्च न्यायलय ने उन्हें टीम सहित बहार का रास्ता दिखाया है।

दरअसल पटेल का कार्य काल 2020 में समाप्त हो चुका था लेकिन दो साल बाद तक भी उन्होंने फेडरेशन अध्यक्ष बने रहकर अपनी सदस्य इकाइयों को हैरान परेशान किया। तंग आकर अधिकांश इकाइयों ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और आखिरकार भारतीय फुटबाल को एक ऐसे अध्यक्ष से निजात मिल गई है, जिसका कार्यकाल विवादों और विफलताओं की लम्बी कहानी रहा है।

पूर्व अध्यक्ष दिवंगत प्रियरंजन दासमुंशी के बाद फुटबाल फेडरेशन के सर्वोच्च पद पर विराजमान होने वाले प्रफुल्ल पटेल को आखिरकार क्यों बेअदबी के साथ पद छोड़ना पड़ा और क्यों भारतीय फुटबाल में उन्हें खलनायक माना गया? इसलिए चूंकि उन्होंने देश की फुटबाल को मजाक बना कर रख दिया था, ऐसा देश की तमाम राज्य इकाइयों और पूर्व खिलाड़ियों का आरोप है। हालांकि फीफा रैंकिंग में फिसड्डी भारतीय फुटबाल को पुरुष अंडर 17 और महिला अंडर 19 वर्ल्ड कप के आयोजन का श्रेय मिला लेकिन कुल मिला कर पटेल का 14 साल का कार्यकाल फुटबाल के पतन और शीर्ष संस्था के गैरजिम्मेदाराना क्रियाकलापों के लिए हमेशा याद किया जाता रहेगा।

पटेल के जी हुजूरों की मानें तो आइएसएल और आइ लीग जैसे आयोजन उनकी उपलब्धि रही हैं, लेकिन देश के फुटबाल जानकार आइएसएल को कोई भाव नहीं देना चाहते । उनकी राय में यह आयोजन बूढ़े विदेशी खिलड़ियों का अखाड़ा बन कर रह गया है। संतोष ट्राफी राष्ट्रीय फुटबाल चैम्पियनशिप की उपेक्षा, अनेक घरेलू आयोजनों का बंद होना और छोटे आयुवर्ग के आयोजनों की अनदेखी के कारण भारतीय फुटबाल आगे बढ़ने की बजाय पीछे लुढ़कती चली गई। फीफा रैंकिंग में 106 वे स्थान की भारतीय फुटबाल के खाते में बस एक सैफ ट्राफी है जोकि नेपाल, बांग्लादेश, अफगानिस्तान, म्यांमार जैसे पिछड़े देशों की उपस्थिति का इनाम कहा जा सकता है। कुछ एक अवसरों पर ये देश भारतीय फुटबाल को हैरान भी करते रहे हैं।

फुटबाल फेडरेशन के कुछ पूर्व प्रशासकों और अंतर्राष्ट्रीय खिलाडियों के अनुसार पटेल ने अपने स्वार्थ के कारण न सिर्फ फुटबाल को रसातल में धकेला अपितु अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम भी खराब किया। महिला अंडर 19 फीफा वर्ल्ड कप की मेजबानी पाकर खूब वाह-वाह तो लूटी लेकिन इस आयोजन से मेजबान लड़कियों को मात्र एक मैच खेल कर बाहर होना पड़ा था। कोरोना काल के कारण मेजबान की बदइंतजामी का ठीकरा अपनी ही टीम के सर पर फूटा, जब 12 खिलाड़ी कोरोना संक्रमित पाई गईं और भारतीय लड़कियों को फेडरेशन और टीम प्रबंधन के नाकारापन के कारण बिना खेले बाहर होना पड़ा। देश की फुटबाल को शर्मसार करने वाली यह अपने किस्म की अनोखी घटना है।

एआइएफएफ पर देश की क्लब फुटबाल को बर्बाद करने के गंभीर आरोप भी लगते रहे हैं। कोलकाता, मुंबई, गोवा, केरल, दिल्ली, पंजाब, बंगलौर और तमाम प्रदेशों के प्रमुख फुटबाल क्लब आर्थिक तंगी और फेडरेशन के असहयोगी रवैये के कारण बर्बादी के कगार तक पहुंच गए हैं। इतना ही नहीं दिल्ली स्थित फुटबाल हाउस में बैठे अधिकारीयों पर भी गंभीर आरोप लगते रहे लेकिन कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई।

यह भारतीय फुटबाल का दुर्भाग्य नहीं तो और क्या है कि उस समय जबकि फुटबाल जगत विश्व कप खेलने और देखने के लिए कमर कैसे है तो इधर भारत में फुटबाल के शीर्ष अधिकारी विवादों में फंस कर देश का नाम खराब कर रहे हैं। विश्व कप ओलंपिक और एशियाड में भाग लेना भारतीय फुटबाल के लिए सपना भर रह गया है। बेशक, दुनिया के सबसे लोकप्रिय खेल को खराब करने में पटेल जैसे पदाधिकारियों की भूमिका को हमेशा कोसा जाता रहेगा। चूंकि पटेल ने एएफसी और फीफा को गुमराह किया और उन्हें भारतीय फुटबाल केबारे में गलत जानकारी पड़ोसी गई, इसलिए एआइएफएफ पर अनुशासन की तलवार भी लटकी है।

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