भारत सरकार के फिट इंडिया कार्यक्रम के निदेशक सुशांत कांडपाल का मानना है कि खेल सुविधाओं और इंफ्रास्ट्रक्चर के मामले में भारत अब दुनिया के किसी भी बड़े देशों से पीछे नहीं है। हालांकि, उन्होंने यह भी माना कि भारतीय खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और बेहतर प्रदर्शन के लिए मनोवैज्ञानिक तैयारी पर ज्यादा काम करने की जरूरत है।
जनसत्ता.कॉम से खास बातचीत में सुशांत कांडपाल ने फिट इंडिया अभियान, कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत की उम्मीदों और युवाओं में खेल संस्कृति बढ़ाने को लेकर विस्तार से बात की।
सवाल: भारत सरकार के कार्यक्रम फिट इंडिया और कॉमनवेल्थ गेम्स में क्या सामंजस्य देख रहे हैं?
सुशांत कांडपाल: सबसे बड़ा सामंजस्य यह है कि हम जनता को एक तरह से फिटनेस का संदेश देते हैं। हम चाहते हैं कि जनता क्रिकेट को तो फॉलो करे ही बल्कि अन्य सभी खेलों से भी बराबर का जुड़ाव रखें। कॉमनवेल्थ हमारे लिए एक बहुत महत्वपूर्ण प्रतियोगिता है। हम इसका आयोजन भी करने जा रहे हैं। कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत का प्रदर्शन भी बहुत अच्छा रहता है।
…तो हम चाहते हैं कि हम इसमें पिछले जितने संस्करण हमारे हुए हैं, उन सबसे अच्छा प्रदर्शन करें। फिट इंडिया का महत्वपूर्ण भूमिका यह है कि लोगों में फिटनेस को लेकर जागरूकता आये और कॉमनवेल्थ गेम्स को लेकर जागरूकता आये कि भारत उसमें किस तरह से शामिल होने वाला है।
सवाल: हमारे बहुत से ऐसे खिलाड़ी हैं, जिनमें प्रतिभा तो बहुत होती है, लेकिन फिटनेस इश्यू होने के कारण विश्व स्तर पर कहीं न कहीं पिछड़ जाते हैं?
सुशांत कांडपाल: मैं इसमें थोड़ा सा सुधार करना चाहूंगा। दो-तीन चीजों पर बोलूंगा। आपकी बात ठीक है। मुझे भी ऐसा लगता है कि हमारा थोड़ा सा शायद साइकोलॉजिकल दृष्टिकोण है कि हम मानसिक तौर पर कभी-कभी हल्का सा पीछे रह जाते हैं।
मौजूदा समय में हमारे देश में इंफ्रास्ट्रक्चर की जो सुविधाएं हैं, वे किसी भी मायने में, किसी भी अच्छे देश से कम नहीं हैं। अगर आप ऑस्ट्रेलिया का मुकाबला करें, चाइना का करें, हमारे पास वे सारी सुविधाएं हैं, चाहे वह स्पोर्ट्स साइंस हो, बॉयोमैकेनिक्स हो, कोचेस हों, कि जो एक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मात दे सकती हैं।
हालांकि, आप कह सकते हैं कि थोड़ा सा एक मनोवैज्ञानिक तैयारी की बात है, एक हमारे यहां क्या है कि थोड़ा सा जमीनी स्तर पर काम करने की जरूरत है, ताकि हम ज्यादा से ज्यादा टैलेंट को चिह्नित करें और उनको ऊपर ले जाएं।
फिटनेस की जहां तक बात है तो ऐसा नहीं है। मुझे लगता है कि शायद हम शुरुआती दौर में तैयारी करने में थोड़ा सा लेट हो जाते हैं। उस हिसाब से उतना समय हमको नहीं मिल पाता है। इस कारण जब हम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जाते हैं कि हम वहां प्रतिस्पर्धा कर पाएं।
मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण तो एक है ही थोड़ा सा…। मनोवैज्ञानिक तौर पर तैयार नहीं रहते हैं, इसलिए यही शायद कमी रहती है, जोकि मुझे लगता है कि आने वाले समय में अब वह चीज नहीं है। हम कहीं न कहीं उस स्तर पर आ रहे हैं। हमारी परफॉर्मेंस आ रही है। आने वाले समय में ओलंपिक खेलों और कॉमनवेल्थ गेम्स में हमारी परफॉर्मेंस बहुत अच्छी होने वाली है।
सवाल: देश के युवाओं और उनके माता-पिता को क्या संदेश देना चाहेंगे?
सुशांत कांडपाल: मैं यही संदेश देना चाहूंगा कि आप कृपया खेलों को बढ़ावा दीजिए। अपने बच्चों को प्रोत्साहित करिये कि वे फिटनेस से जुड़ें, स्पोर्ट्स खेलें और जिसकी जिसमें रुचि है उस खेल को वह पूरी तरीके से भले ही वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिस्सा लेने के लिए न हो, सिर्फ अपने शौक के तौर पर ही हो, लेकिन जरूर खेलें, क्योंकि इसी से देश आगे बढ़ेगा। देश को और प्रतिभाएं मिलेंगी और इसी से हमारे मेडल्स की संख्या बढ़ेगी और हमारे देश का नाम रोशन होगा।
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