अरब सागर की लहरें पूरी तरह शांत भी नहीं होतीं है और अब्दुल फत्ताह अपनी नाव से किनारे लौट रहे होते हैं। रात भर जाल डालकर मछलियां पकड़ने के बाद उनके हाथों में थकान जरूर होती है, लेकिन आंखों में अलग चमक बनी रहती है। यह चमक है कुछ बड़ा करने के लिए है।

सुबह की हल्की रोशनी के साथ, जब बाकी लोग आराम की तलाश में होते हैं, अब्दुल फत्ताह एक छोटे से मैदान की ओर बढ़ जाते हैं। यही उनका दूसरा संसार है, जहां न कोई सिंथेटिक ट्रैक है, न आधुनिक सुविधाएं, सिर्फ एक सपना है, जो हर दिन उनसे और ऊंची छलांग मांगता है।

अब्दुल फत्ताह ने लगाई 7.03 मीटर लंबी छलांग

अब्दुल फत्ताह ने जब खेलो इंडिया ट्रायबल गेम्स 2026 में 7.03 मीटर की छलांग लगाई तो वह सिर्फ गोल्ड मेडल नहीं था, बल्कि उन अनगिनत सुबहों और थकी हुई रातों की जीत थी, जो उन्होंने अपने परिवार और अपने सपनों के बीच संतुलन बनाते हुए बिताई थीं।

लक्षद्वीप के छोटे द्वीप से निकले इस 18 वर्षीय खिलाड़ी की कहानी अब सिर्फ एक उपलब्धि नहीं, बल्कि इस बात का प्रमाण है कि अगर नजर सही और विश्वास मजबूत हो तो संसाधनों की कमी सपनों की उड़ान को रोक नहीं सकती। हालांकि, यह सफर हमेशा से ऐसा नहीं था।

फुटबॉल से हुई थी खेल की शुरुआत

अब्दुल फत्ताह के लिए खेल की शुरुआत फुटबॉल से हुई थी। द्वीप के ज्यादातर युवाओं की तरह वह भी गेंद के पीछे दौड़ते हुए बड़े हुए, लेकिन एक स्थानीय अंतर-द्वीपीय प्रतियोगिता के दौरान, उनकी रफ्तार पर कोच मोहम्मद कसीम की खास नजर पड़ी।

कोच कसीम ने पहचानी सत्ताह की प्रतिभा

मोहम्मद कसीम ने उनके भीतर छिपी उस क्षमता को पहचान लिया, जिसे अब्दुल फत्ताह खुद नहीं समझ पाए थे। कसीम ने उनमें सिर्फ तेज दौड़ने वाला खिलाड़ी नहीं देखा, बल्कि संभावित एथलीट के रूप में परखा। यहीं से कहानी ने करवट बदली।

फुटबॉल के मैदान से उठकर जब अब्दुल फत्ताह ने पहली बार लंबी कूद के लिए कदम बढ़ाए तो यह सिर्फ खेल बदलने का फैसला नहीं था, बल्कि किस्मत को नई दिशा देने जैसा था। सीमित संसाधन, मिट्टी का ट्रैक और बिना किसी आधुनिक सुविधा के शुरू यह सफर धीरे-धीरे आकार लेने लगा।

यही वह मोड़ था, जहां एक कोच की नजर ने न सिर्फ एक खिलाड़ी को पहचाना, बल्कि लक्षद्वीप के खेल इतिहास में एक नई उम्मीद भी जगा दी। मछुआरे परिवार में जन्में अब्दुल फत्ताह चार भाई-बहनों में सबसे बड़े हैं और घर की बड़ी जिम्मेदारियां अपने कंधों पर उठाते हैं।

पैसों की तंगी के कारण 12वीं के बाद की पढ़ाई छूटी

अब्दुल परिवार की रोजी-रोटी कमाने में मदद के लिए रात में ज्यादातर समुद्र में रहते हैं। उन्हें आर्थिक तंगी के कारण 12वीं कक्षा के बाद पढ़ाई बीच में ही रोकनी पड़ी। हालांकि, उन्होंने पिता के पारिवारिक व्यवसाय में मदद करने और खेल को जुनून के तौर पर अपनाने का फैसला किया।

केंद्र शासित प्रदेश के खेल अधिकारी अहमद जावेद हसन के जरिये अब्दुल फत्ताह ने बताया, ‘‘कोई और चारा नहीं है। आपको चीजों में तालमेल बैठाना ही पड़ता है। जब मैं स्कूल में था तभी से मछली पकड़ने में पिता की मदद करता आ रहा हूं। यही हमारी आय का एकमात्र जरिया है। हमारे परिवार में छह लोग हैं। सुबह के समय मैं अपनी ट्रेनिंग के लिए जाता हूं। मेरे परिवार को इस बारे में पता है, भले ही वे खेल के बारे में बहुत कम समझते हों।’’

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