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दुनिया भर के कई देशों में प्रीमियर लीग का आयोजन काफी पहले से होता रहा है। लियोनल मेस्सी और क्रिस्टयानों रोनाल्डो जैसे दिग्गज फुटबॉलरों को खेल प्रेमी उनके देश से ज्यादा क्लबों के साथ प्रीमियर लीग में खेलते हुए देखना चाहते हैं।

Author June 27, 2019 2:32 AM
दुनिया के कुछ सबसे अमीर खिलाड़ियों में एकमात्र भारतीय विराट कोहली हैं।

संदीप भूषण

भारत धीरे-धीरे खेल महाशक्ति बनने की राह पर है। इसमें सबसे अहम भूमिका प्रीमियर लीगों ने निभाई है। बात चाहे पैसे की हो या नए खिलाड़ियों को पहचान दिलाने की, प्रीमियर लीग ने इस क्षेत्र में खूब काम किया है। साल की शुरुआत से अंत तक किसी न किसी वैश्विक प्रीमियर टूर्नामेंट का आयोजन होना खुद में किसी भी देश के लिए गर्व का विषय है। दुनियाभर के खेल प्रेमी अभी क्रिकेट विश्व कप में व्यस्त हैं। लेकिन, जैसे ही यह समाप्त होगा प्रो कबड्डी लीग शुरू हो जाएगी। इसके अंतिम चरण तक पहुंचने से पहले प्रो रेसलिंग और साल के अंत तक प्रो बैडमिंटन लीग। कुल मिलाकर पूरे साल लगभग सभी बड़े खेलों के लिए भारत में प्रीमियर लीग का आयोजन होने लगा है। चार-पांच साल में ही इसके फायदे भी दिखने लगे हैं। एक तरफ जहां खिलाड़ियों को प्रायोजक (स्पॉन्सरशिप) मिलने लगे हैं तो दूसरी तरफ बगैर अंतरराष्ट्रीय पटल पर खेले ही उन्हें पहचान मिलने लगी है।

दरअसल, दुनिया भर के कई देशों में प्रीमियर लीग का आयोजन काफी पहले से होता रहा है। लियोनल मेस्सी और क्रिस्टयानों रोनाल्डो जैसे दिग्गज फुटबॉलरों को खेल प्रेमी उनके देश से ज्यादा क्लबों के साथ प्रीमियर लीग में खेलते हुए देखना चाहते हैं। यही कारण है कि कोपा अमेरिका और इग्लिश प्रीमियर लीग जैसे टूर्नामेंटों को करोड़ों दर्शक आसानी से मिल जाते हैं। भारत में लीग को चलन में लाने का श्रेय इंडियन प्रीमियर लीग (आइपीएल) को जाता है। उसके बाद बैडमिंटन से लेकर हॉकी तक के लिए लीग की शुरुआत हुई। लेकिन इन सब से अहम उसके फायदे रहे। आइपीएल ने क्रिकेट में नई प्रतिभा को तलाशने का काम किया तो वहीं फुटबॉल के लिए इसका श्रेय इंडियन सुपर लीग और आइ-लीग को जाता है।

 

अब खिलाड़ियों के पास पैसे की कमी नहीं : नए चेहरे को पहचान दिलाने के साथ ही प्रीमियर लीग ने खिलाड़ियों के लिए प्रायोजक भी ढूढ़े। पहले दिग्गज खिलाड़ियों के पास भी किट खरीदने और एक जगह से दूसरे जगह खेलने जाने के लिए पैसे नहीं होते थे। लेकिन, प्रीमियर लीग ने इस समस्या को काफी हद तक समाप्त कर दिया। प्रायोजक मिलने के पिछले दस साल के आंकड़ों पर ध्यान दे तो इसमें लगभग पांच हजार करोड़ की बढ़ोतरी हुई है। लीग और नॉन लीग टूर्नामेंटों को जहां 2008 में 2139 करोड़ रुपए के प्रायोजक मिले वहीं 2018 में यह आंकड़ा 7408 करोड़ रुपए हो गया। इससे पता चलता है कि लीगों ने भारत में खिलाड़ियों को ही नहीं खेल के बाजार को भी बढ़ाया है। इंडिया स्पोर्ट्स स्पॉन्सरशिप रिपोर्ट 2019ह्ण के मुताबिक भारतीय खेल उद्योग 2017 में जहां 7,300 करोड़ का था वहीं 2018 में यह बढ़कर 7,762 करोड़ रुपए का हो गया।

लीगों को भी खूब मिल रहे दर्शक : यह सच है कि कोई भी उत्पाद तब तक सफल नहीं माना जाता जब तक उसे पर्याप्त संख्या में उपभोक्ता नहीं मिलते। प्रीमियर लीग पर भी यह बात बखूबी लागू होती है। लेकिन, यह आंकड़े किसी को भी चौका सकते हैं कि चाहे किसी भी भारतीय लीग की बात हो, उसे दर्शक खूब मिलते हैं। आइपीएल को सफल बताने के लिए किसी भी तरह का तर्क पेश करना उसके साथ ज्यादती होगी। फिर भी ‘बार्क’ की रिपोर्ट के मुताबिक 2018 में उसे प्रति सेकंड लगभग चार लाख लोगों ने देखा।

आइएसएल को देखने वालों की संख्या सवा लाख रही। प्रो कबड्डी लीग को लगभग तीन लाख दर्शक मिले। प्रीमियर बैडमिंटन लीग को सवा लाख दर्शकों ने देखा। इससे यह तो साफ हो जाता है कि क्रिकेट के दीवाने भारतीय प्रशंसक कबड्डी और फुटबॉल में भी खासा दिलचस्पी रखते हैं। क्रिकेटर तो हिट लेकिन दूसरे भी कम नहीं : भारत में क्रिकेट को धर्म की उपमा दी जाती है। ऐसे में यह तो माना ही जा सकता है कि क्रिकेटर उन प्रशंसकों के लिए भगवान से कम नहीं। धनवर्षा के मामले में क्रिकेटर तो फोर्ब्स पत्रिका तक में जगह बना चुके हैं।

लेकिन, दूसरे एथलीट भी इस मामले में कम नहीं हैं। फोर्ब्स की हाल में जारी रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के कुछ सबसे अमीर खिलाड़ियों में एकमात्र भारतीय विराट कोहली हैं। उनकी सालाना प्रायोजक वैल्यू लगभग 200 करोड़ से ऊपर है।  वहीं, महेंद्र सिंह धोनी भी 100 करोड़ रुपए के आंकड़े को पार कर चुके हैं। अन्य खेलों की बात करें तो भारत की दो सुपरस्टार शटलर पीवी सिंधू और साइना नेहवाल की प्रायोजक वैल्यू कम नहीं है। सिंधू अकेले 11 ब्रांड्स के साथ जुड़कर लगभग 35 करोड़ रुपए की कमाई कर रही हैं।

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