हर चार साल में जब फीफा विश्व कप का खुमार दुनिया पर छाता है, तो भारत की रातें भी जाग उठती हैं। 140 करोड़ की आबादी वाले इस देश में करोड़ों फैंस मेसी, रोनाल्डो और एम्बाप्पे की जर्सी पहनकर विदेशी टीमों के लिए गला फाड़ते हैं, लेकिन इस जश्न के शोर के बीच एक खामोश सवाल हर बार टीस बनकर उभरता है। आखिर हमारा तिरंगा फुटबॉल के इस सबसे बड़े महाकुंभ में कब लहराएगा?

आखिर क्या वजह है कि दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश फीफा के वैश्विक मंच से दशकों से गायब है? क्या 2030 में यह सूखा खत्म होगा और हम ‘ब्लू टाइगर्स’ (भारतीय टीम) को विश्व कप के मैदान पर दहाड़ते हुए देख पाएंगे? उम्मीद की एक किरण तब नजर आई, जब फीफा अध्यक्ष जियानी इन्फेंटिनो ने हाल ही में 2030 विश्व कप में टीमों की संख्या 48 से बढ़ाकर 64 करने के प्रस्ताव पर विचार करने की बात कही।

भारतीय फुटबॉल के दिग्गज बाइचुंग भूटिया का भी मानना है कि अगर ऐसा होता है तो भारत के विश्व कप में पहुंचने के दरवाजे खुल सकते हैं। हालांकि, भारतीय फुटबॉल की जमीनी हकीकत को देखते हुए यह सपना अब भी किसी कठिन चक्रव्यूह से कम नहीं लगता। इसका ताजा और कड़वा उदाहरण हाल ही में देखने को मिला।

भारतीय महिला फुटबॉल टीम मेरिट के आधार पर एएफसी विमेंस एशियन कप के लिए क्वालिफाई करने के बावजूद, महज ‘सरकारी चयन नीति’ के पेंच में फंसकर 2026 एशियन गेम्स में हिस्सा लेने से वंचित रह गई। यह घटना हमारे सिस्टम की उस नाकामी की सिर्फ एक बानगी है, जो टैलेंट को आगे बढ़ने से रोकती है।

ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि आखिर भारतीय फुटबॉल की सबसे बड़ी बीमारी क्या है? क्या यह सिर्फ लालफीताशाही और कमजोर प्रशासन का नतीजा है या फिर खिलाड़ियों के स्तर, लीग सिस्टम की खामियों, जमीनी ढांचे और देश की खेल संस्कृति में भी गहरी दरारें हैं? इन्हीं सुलगते सवालों और उनके संभावित समाधानों पर हमारे न्यूजरूम के साथियों ने विस्तार से अपनी बेबाक राय रखी…।

पावर में रहने की प्राथमिकता

वरिष्ठ खेल पत्रकार तुषार भादुड़ी ने कहा, ‘‘हमारे देश में फुटबॉल चलाने का जिम्मा जिनके ऊपर है उनके लिए फुटबॉल टीम का प्रदर्शन क्या प्राथमिकता रखती है यह तो हम नहीं जानते हैं। उनके लिए प्राथमिकता होती है कि फुटबॉल फेडरेशन का नाम बदला जाए और किस तरह से हम पावर में रह सकें। देखिये हम लोग के पास जो फिजिकली, हम लोग के पास तो काफी ड्रॉ बैक हैं फुटबॉल के लिए, लेकिन ऐसा नहीं है कि कम कद काठी जो लोग खेल नहीं पाते हैं। जापान बार बार जाता है। जापान बहुत बढ़िया टीम है। उनको आप नहीं बोल सकते कि वे 6 फीट, साढे 6 फीट के साइज के होते हैं।’’

हमारे फुटबॉल को चलाने वाले आपस में लड़ते हैं

‘‘अगर वे थोड़े कम होते हैं तो दूसरी चीजों में कंपनसेट करते हैं स्पीड में, स्किल में। लेकिन अगर आपकी प्राथमिकता ही नहीं रहेगी। अब आप सिर्फ 4 साल में एक बार जब वर्ल्ड कप होता है तब आप कहेंगे कि हमारी टीम क्यों नहीं खेलती? तो मैं कहूंगा कि भाई ये तो फोमो है, सबकी टीम है, हमारी क्यों नहीं है, हम विश्व गुरु हैं, हमें भी होना चाहिए, लेकिन सिर्फ कहने से होता नहीं है। अब अगर अब आप देखिएगा कि अब ये हमारे फुटबॉल जो चलाते हैं, ये आपस में ही इतना झगड़ा करेंगे। झगड़ा होता है इनका कि ये इसको बोल रहा है, वो उसको बोल रहा है।’’

वर्ल्ड कप खत्म, चिंता खत्म

‘‘प्रायरिटी तो है नहीं, किसी को हमारे पास प्लेयर्स भी उस लायक नहीं है। हमारे यहां आईएसएल चलती नहीं है, कोई ये नहीं सोचता कि यहां पर लीग नहीं हो रही है, जाकर बाहर ट्राई करे, बाहर ट्राई नहीं करेंगे क्योंकि जितना पैसा उनको यहां मिलता है वो बाहर नहीं मिलेगा। तो अपना पर्सनल डेवलपमेंट भी वो लोग लेकर नहीं चलते। अपना इंडियन फुटबॉल आगे बढे़ ये किसी की प्राथमिकता नहीं है, वो बस ऐसा है कि अभी फुटबॉल वर्ल्ड कप है तो अभी हम लोग सोच रहे हैं कि हमारी टीम क्यों नहीं है, वर्ल्ड कप खत्म हो गया है। अब कितने लोगो को चिंता होगी। सब भूल जाएंगे।’’

भारतीय फुटबॉल का हाल बीरबल की खिचड़ी वाला

युवा खेल पत्रकार प्रितीश राज ने बताया, ‘‘भारतीय फुटबॉल का हाल बीरबल की खिचड़ी वाला है। वर्षों से बन रही है, लेकिन तैयार नहीं पाई है और जो प्रेसिडेंट साहब हैं वह प्रेस कॉन्फ्रेंस में बोलते हैं कि इंडिया को वर्ल्ड कप खिलाना बिरयानी बनाने जैसा है तो न खिचड़ी बन पाई न बिरयानी बन पाई उसके बीच में कुछ ऐसा बन रहा है, जिसके बारे में पता नहीं, लेकिन बहुत सारी दिक्कतें हैं। मेरे हिसाब से दिक्कत दोनों तरफ से हैं। अगर प्रशासनिक तौर पर देखें तो वहां भी दिक्कत है और आप खिलाड़ियों को देखें तो वहां पर भी दिक्कतें हैं।’’

आईएसएल में खेलने से कुछ नहीं होने वाला है

‘‘इसका उदाहरण है जापान की टीम भी वर्ल्ड कप खेली है तो इनका जो पंद्रह का स्पॉट था उसमें सिर्फ 12 या 13 लोग थे जो यूरोप में खेल रहे थे सिर्फ 3 लोग थे जो जापनीज लीग में खेलते। उन्होंने एक भी मैच स्टार्ट नहीं किया और जो उनके दो इंजर्ड प्लेयर्स थे वे भी यूरोप में खेलते हैं और वे कई वर्षों से खेल रहे हैं। ऐसा नहीं कि बड़े क्लब के लिए खेलते हैं, छोटे-छोटे क्लब के लिए खेलते हैं। छोटी लीग्स में खेलते हैं। यहां एक मिस कंसेप्शन है कि आपको अगर इंडिया में खेलना है तो आईएसएल में खेलो तो इससे कुछ नहीं होने वाला है।’’

कंफर्ट जोन छोड़ना पड़ेगा

‘‘आपको बाहर जाना पड़ेगा। कंफर्ट जोन छोड़ना पड़ेगा। समस्या यह है कि यहां का मार्केट इंफ्लेटेड है, प्लेयर्स में वह जज्बा नहीं है। सोशल मीडिया पर कहना अलग चीज होता है कि हमने सब कुछ दिया, लेकिन अगर सब कुछ दिया तो पिछले साल आईएसएल बहुत देर से शुरू हुआ। ऐसे में आपके पास मौका था। आप किसी भी यूरोपियन लीग में जाकर खेल सकते थे। भले ही वह किसी टियर की होती। यूरोप छोड़ो, एशिया की लीग्स में जाकर खेल सकते थे। उज्बेकिस्तान की लीग है। सऊदी लीग है। बहुत सारी लीग से आप कहीं भी कोशिश कर सकते थे।’’

रायता बहुत ही बड़े लेवल पर फैला हुआ है

‘‘आप साउथ अमेरिका चले जाते। आप कहीं भी कोशिश कर सकते थे, लेकिन वे गए नहीं, क्योंकि मेरे हिसाब से तो वह जो एक जज्बा होता है वही खत्म हो गया है। अब प्रशासनिक स्तर पर आएं तो बाकी हर स्पोर्ट में रायता फैला हुआ है और रायता बहुत ही बड़े लेवल पर फैला हुआ है। ऐसे लेवल पर फैला हुआ है कि समेटने में समय लग जाए। मतलब आप यह सोचिए कि वर्ल्ड कप के बीच में ये कहना कि हम अपने फेडरेशन का नाम बदल देंगे। अगर मैं अपना नाम उसैन बोल्ट रखूंगा तो फर्राटा चैंपियन थोड़े ही न बन जाऊंगा। फेडरेशन का नाम बदलने से अगर कुछ होता तो…। मेरे हिसाब से दिक्कतें दोनों तरफ हैं। दोनो पार्टी बराबर की जिम्मेदार हैं।’’

मेसी के टूर के लिए फंड है, लेकिन आईएसएल के लिए नहीं

खेल पत्रकार शशांक नायर ने कहा, ‘‘मेरे सहयोगियों ने बड़े-बड़े बिंदुएं, बारीकियां कवर कर लिए। जिस वजह से इंडियन फुटबॉल पीछे है, जहां नहीं होना चाहिए है, पर मैं थोड़ा फिर वृहद दृष्टिकोण पर बात कर लेता हूं। मुझे ऐसा लगता है, फुटबॉल के अलावा थोड़ा जूम आउट करके ओवरॉल इंडियन स्पोर्ट्स में देखें तो जो हमारी जितनी आबादी है उसमें स्पोर्ट्स लव उतना नहीं है। खेल प्रेम से ज्यादा पर्सनालिटी लव है, जो बार-बार देखने को मिलता है। जब मेसी का टूर हुआ किस तरह से उसके लिए फंड्स अरेंज हो गए। देर नहीं लगी, कितने लोग, कितना उसका क्रेज था, कितना स्टेडियम भरे और वहीं आप देखिए आईएसएल कराने की जब बात है, तो उसके लिए कितने टेकर्स थे।’’

लोगों को खेल से ज्यादा पर्सनालिटिज पसंद

‘‘इस तरह की बात है। लोगों को खेल देखने से ज्यादा पर्सनालिटिज को देखना अच्छा लगता है। खासतौर पर सोशल मीडिया के दौर में तो लोगों का दिखावे के ऊपर ज्यादा ध्यान है। यही दिक्कत का कारण है। प्राथमिकता खेल को बढ़ावा देने की नहीं है। एक और छोटी सी बात कहना चाहूंगा। वह संसाधन और जुड़ाव को लेकर। भारतीय मूल के खिलाड़ी जब दूसरे देशों के लिए खेल रहे हैं तो वे अच्छा कर रहे हैं, वे खेल रहे हैं।’’

हमारे देश में फुटबॉल लोकप्रिय नहीं

‘‘न्यूजीलैंड में सरप्रीत सिंह खेल रहे है। उन्होंने डेब्यू किया है। कुछ प्लेयर्स पैदाइश से ही वहीं पर हैं तो उनको मौका मिला, लेकिन और भी प्लेयर्स हैं जो दूसरे देशों में जाकर पनपते हैं, बहुत अच्छा करते हैं। इसके पीछे क्या वजह है? क्या उनको इस तरह का सपोर्ट मिल रहा है? वंशानुगत तो उनकी लंबाई कम है। फिर भी वह अच्छा कर पा रहे हैं। काफी आमूलचूल परिवर्तन की जरूरत है, लेकिन जब सोच में ही नहीं… तो क्या किया जा सकता है। हमारे देश में फुटबॉल लोकप्रिय नहीं है। यह बहुत दिक्कत की बात नहीं है। ब्राजील में फुटबॉल का प्रेम है तो ऐसा नहीं है कि वे सोचते होंगे कि बाकी खेलों में अच्छा क्यों नहीं कर रहे।’’

जमीनी स्तर पर काम करने की जरूरत

खेल पत्रकार भुवन गुप्ता ने कहा, ‘‘मेरे हिसाब दिक्कत ये है कि छोटी-छोटी बहुत कमियां हैं। आप प्रशासनिक स्तर पर देखें तो शीर्ष स्तर पर बात बहुत देर से पहुंचती है। मेरे हिसाब से जमीनी स्तर पर टूर्नामेंट के आयोजन और कोचिंग जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं के स्तर पर हम बाकी देशों से काफी पीछे हैं। अगर एशियाई देशों के हिसाब से देखें तो जापान में स्कूल में सहभागिता होती है। यहां पर स्कूल को अभी अप्रोच करना शुरू हुआ है। वहां पर 20 साल पहले शुरू हो गया था। वहां पर अगले 20-30 साल को लेकर प्लानिंग हो रही है। शीर्ष देश उस हिसाब से सोचते हैं। वह नेशनल टीम को देखते ही नहीं हैं। वह जमीनी स्तर पर काम करके देखते हैं कि कैसे खिलाड़ियों को तैयार कर सकते हैं।’’

प्लानिंग बहुत जरूरी

‘‘नई पीढ़ी के लिए क्या कर सकते हैं। अभी हम एशिया में देखें तो उज्बेकिस्तान की टीम पहली बार वर्ल्ड कप में गई थी। उनकी अंडर 17, अंडर 20 और अंडर 23 टीमों ने एशिया में जापान को टक्कर देना शुरू कर दिया है। अगले 4 या अगले आठ साल में आप उनकी विश्व कप परफॉर्मेंस देखेंगे। वे इसलिए नहीं होंगे कि उधर जाकर बहुत अच्छा परफॉर्म करेंगे। इसका कारण यह होगा कि वे अभी से परफॉर्म कर रहे हैं। प्लानिंग बहुत जरूरी है और उस दिशा में हम लोग जा नहीं रहे हैं। हम लोग पीछे जा रहे हैं।’’

भारतीय फुटबॉल को अभी और बुरा समय देखना है

‘‘हमारी टीम अंडर-17 में खेलती थी। एशिया में क्वालिफाई करती थी। अभी वहां पर भी ऐसा नहीं हो रहा। मेरा मानना है कि भारतीय फुटबॉल को अभी और बुरा समय देखना है। देश की मांग है कि वर्ल्ड कप में हमारी टीम होनी चाहिए। यह काफी दूर की कौड़ी है। हमारी सीनियर टीम एशिया के लिए भी क्वालिफाई नहीं कर पा रही है। ये वाली जेनेरेशन जो गई है, वह मेरे हिसाब से इंडिया की सबसे बेस्ट ट्रेंड टीम से एक थी।’’

खिलाड़ियों की हालत खराब

‘‘अंडर 17 वर्ल्ड कप के समय पर इनमें से काफी प्लेयर थे तो इनको बहुत एक्सपोजर मिला था। जो उन्हें सुविधाएं मिलीं उसके हिसाब इनका विकास काफी अच्छा हुआ। अब ऐसा नहीं हो रहा है। इसका असर प्रदर्शन पर भी दिखेगा। भारत अंडर-20 और अंडर-23 में एशिया में भी क्वालिफाई नहीं कर पाएगा। बहुत मुश्किल से अंडर-20 में एक बार हुआ। अंडर-23 में नहीं हुआ। आपके खिलाड़ियों की हालत खराब है और वह काफी दिखता है।’’