भारतीय महिला मुक्केबाजी में नई पीढ़ी की सबसे दमदार दावेदारों में शामिल साक्षी चौधरी के सामने अब तक की सबसे बड़ी परीक्षा है। मई 2026 में पटियाला में हुए राष्ट्रमंडल और एशियाई खेलों के चयन ट्रायल्स में दो बार की विश्व चैंपियन निखत जरीन को हराकर उन्होंने न सिर्फ अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया, बल्कि 51 किलोग्राम भार वर्ग में भारत की पहली पसंद भी बन गईं। अब उनकी पूरी तैयारी ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेलों में तिरंगा सबसे ऊपर लहराने की है। उनका लक्ष्य देश के लिए स्वर्ण पदक जीतना है।
ग्लासगो रवाना होने से पहले साक्षी चौधरी ने जनसत्ता से विशेष बातचीत में अपनी तैयारियों, रणनीति और भविष्य की योजनाओं पर खुलकर बात की। बातचीत में उनका आत्मविश्वास साफ झलका। वह मानती हैं कि चयन ट्रायल्स का प्रदर्शन अब अतीत है और असली चुनौती राष्ट्रमंडल खेलों के मंच पर खुद को साबित करने की होगी।
आयरलैंड कैंप में होगी अंतिम तैयारी
साक्षी बताती हैं कि भारतीय मुक्केबाजी टीम की तैयारियां अंतिम चरण में हैं। नौ जुलाई को टीम आयरलैंड के लिए रवाना होगी, जहां मल्टीनेशनल ट्रेनिंग कैंप आयोजित किया जाएगा। इस शिविर में कई देशों के मुक्केबाजों के साथ अभ्यास का अवसर मिलेगा। इसके बाद भारतीय बॉक्सिंग दल सीधे ग्लासगो (कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए) पहुंचेगा।
उन्होंने कहा, ‘‘हमारी तैयारी बहुत अच्छी चल रही है। आयरलैंड में अलग-अलग देशों के खिलाड़ियों के साथ अभ्यास करने का मौका मिलेगा, जिससे प्रतियोगिता से पहले खुद को और बेहतर करने का अवसर मिलेगा।’’
विरोधियों पर नजर, रणनीति पर पूरा फोकस
साक्षी चौधरी मानती हैं कि अंतरराष्ट्रीय मुक्केबाजी में सिर्फ फिटनेस या ताकत काफी नहीं होती। हर मुकाबले से पहले विरोधी के खेल को समझना भी उतना ही जरूरी है। साक्षी चौधरी ने बताया कि राष्ट्रीय शिविर में कोचिंग स्टाफ संभावित प्रतिद्वंद्वियों के मुकाबलों का विस्तार से अध्ययन करता है। वीडियो एनालिसिस के जरिए उनकी ताकत और कमजोरियों को समझा जाता है और उसी आधार पर रणनीति तैयार की जाती है। इसके साथ-साथ अपने खेल में भी लगातार सुधार किया जाता है ताकि रिंग में किसी भी परिस्थिति का सामना किया जा सके।
हरियाणा की बेटी ने कम उम्र में बनाई अलग पहचान
हरियाणा की साक्षी चौधरी का सफर किसी बड़े खेल परिवार से नहीं, बल्कि साधारण परिवेश से शुरू हुआ। बचपन में ही उन्होंने मुक्केबाजी को अपना लक्ष्य बना लिया। स्थानीय बॉक्सिंग अकादमियों में प्रशिक्षण के दौरान उनकी प्रतिभा जल्दी ही सामने आ गई और उन्होंने जूनियर स्तर की प्रतियोगिताओं में लगातार सफलता हासिल की।
शानदार प्रदर्शन के दम पर उन्हें राष्ट्रीय शिविर में जगह मिली और फिर उन्होंने अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारत का प्रतिनिधित्व करना शुरू किया। साक्षी चौधरी की सफलता ने यह भी साबित किया कि प्रतिभा और मेहनत के सामने सीमित संसाधन बड़ी बाधा नहीं बनते।
यूथ वर्ल्ड चैंपियन से सीनियर स्टार बनने तक का सफर
साक्षी चौधरी ने सबसे पहले दुनिया का ध्यान तब खींचा, जब उन्होंने लगातार दो बार यूथ विश्व चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रचा। बैक-टू-बैक विश्व खिताब ने उन्हें भारतीय मुक्केबाजी की सबसे होनहार खिलाड़ियों में शामिल कर दिया।
इसके बाद उन्होंने सीनियर स्तर पर भी अपनी छाप छोड़ी। वर्ष 2025 में कजाकिस्तान के अस्ताना में आयोजित विश्व बॉक्सिंग कप में उन्होंने 54 किलोग्राम वर्ग के फाइनल में अमेरिका की योसेलिन पेरेज को सर्वसम्मत फैसले से हराकर स्वर्ण पदक जीता। इस प्रदर्शन ने साबित कर दिया कि वह सिर्फ जूनियर स्तर की स्टार नहीं, बल्कि बड़े मंच पर भी दबाव झेलने और खिताब जीतने का माद्दा रखती हैं।
आक्रामक अंदाज, लेकिन संतुलित सोच
रिंग में साक्षी चौधरी की पहचान उनके आक्रामक खेल से है, लेकिन उनकी सबसे बड़ी ताकत सिर्फ तेज पंच नहीं, बल्कि मुकाबले को पढ़ने की क्षमता भी है। वह अवसर मिलने पर लगातार हमला करती हैं, जबकि जरूरत पड़ने पर धैर्य के साथ अंक जुटाने की रणनीति भी अपनाती हैं। यही संतुलन उन्हें अपने समकालीन मुक्केबाजों से अलग बनाता है।
कम उम्र में मिले अंतरराष्ट्रीय अनुभव ने साक्षी चौधरी के खेल को और परिपक्व बनाया है। यही कारण है कि भारतीय मुक्केबाजी में उन्हें भविष्य के बड़े सितारे के रूप में देखा जा रहा है।
‘‘लक्ष्य सिर्फ गोल्ड मेडल’’
साक्षी चौधरी से जब पूछा गया कि ग्लासगो से किस रंग के पदक की उम्मीद है तो उनका जवाब बिना किसी हिचकिचाहट के आया। साक्षी चौधरी ने कहा, ‘‘हम स्वर्ण पदक की उम्मीद कर रहे हैं। मुझे विश्वास है कि भारतीय टीम इस बार कई गोल्ड मेडल जीतेगी और मैं भी देश के लिए स्वर्ण पदक जीतकर लौटना चाहती हूं।’’ यह बयान केवल आत्मविश्वास नहीं, बल्कि पिछले कुछ वर्षों की उनकी मेहनत और निरंतर प्रदर्शन का भी प्रतिबिंब है।
पटियाला ट्रायल्स में मिली बड़ी जीत ने साक्षी चौधरी को भारतीय मुक्केबाजी की नई उम्मीद के रूप में स्थापित किया है। अब निगाहें ग्लासगो पर टिकी हैं, जहां उनके सामने अपनी प्रतिभा को अंतरराष्ट्रीय मंच पर फिर साबित करने का मौका होगा। यदि वह अपनी मौजूदा लय और आत्मविश्वास को बरकरार रखने में सफल रहती हैं तो भारतीय मुक्केबाजी को राष्ट्रमंडल खेलों में एक और स्वर्ण पदक मिल सकता है।
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