इंग्लैंड क्रिकेट में भूचाल: अजीम रफीक ने गवाही में कहा- मैथ्यू होगार्ड मुझे काफिर कहते थे, जो रूट के सामने भी हुई नस्लीय टिप्पणी

रफीक ने कहा कि भारत के चेतेश्वर पुजारा को ‘स्टीव’ कहा। यॉर्कशायर क्लब में कम्युनिटी डेवलपमेंट अधिकारी रहे ताज बट ने कहा था, ‘एशियाई मूल के खिलाड़ियों के साथ टैक्सी ड्राइवर और रेस्तरां वर्कर जैसे शब्द इस्तेमाल किए जाते थे। जो भी गोरी चमड़ी का नहीं होता, उसे वे स्टीव कहते।’ रफीक ने भी यही बात दोहाराई।

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अजीम रफीक ने मंगलवार 16 नवंबर, 2021 को लंदन के पोर्टकुलिस हाउस में एक संसदीय सुनवाई के दौरान खेल प्रशासन पर डिजिटल, संस्कृति, मीडिया और खेल (डीसीएमएस) समिति के समक्ष गवाही दी। (स्क्रीनशॉट/एपी वीडियो)

अंग्रेजी क्रिकेट के नस्लवाद कांड के केंद्र में यॉर्कशायर के पूर्व खिलाड़ी अजीम रफीक ने मंगलवार यानी 16 नवंबर 2021 को लीड्स एम्प्लॉयमेंट ट्रिब्यूनल के समक्ष गवाही दी। रफीक ने अपने खेल के दिनों होने वाले उत्पीड़न से जुड़े सबूत पेश किए और अपना पक्ष रखा। 30 वर्षीय स्पिनर ने आरोप लगाया था कि पाकिस्तानी होने के कारण उनके साथ दुर्व्यवहार हुआ। इसके लिए उन्होंने यॉर्कशायर क्रिकेट क्लब के खिलाफ मामला दर्ज कराया था।

उनकी गवाही ने इंग्लैंड क्रिकेट में भूचाल ला दिया है। अजीम रफीक ने गवाही में न सिर्फ कई मौजूदा और पूर्व क्रिकेटर्स पर नस्लीय टिप्पणियां करने के आरोप लगाए, बल्कि यह भी बताया कि काउंटी की ओर से उन्हें इस मामले में मुंह बंद रखने के लिए मोटी रकम की पेशकश भी की गई। रफीक ने यॉर्कशायर की जांच पर सुनवाई कर रही डिजीटल, संस्कृति, मीडिया और खेल (डीसीएमएस) की चयन समिति को सबूत देते हुए कहा कि वह कभी नहीं चाहेंगे कि उनका बेटा क्रिकेट खेले।

रफीक ने इंग्लैंड के लिए 67 टेस्ट और 26 वनडे इंटरनेशनल खेल चुके मैथ्यू होगार्ड का नाम लिया। उन्होंने कहा, ‘वह हॉगी (मैथ्यू हॉगर्ड) था जिसने मुझे ‘राफा द काफिर’ कहना शुरू किया। ईमानदारी से बताऊं तो उस समय मैं यह नहीं समझ पाया था कि यह एक नस्लवादी गाली थी। क्लब में मेरा उपनाम ‘राफा’ था, जो रफीक का छोटा रूप था, इसलिए जब उन्होंने मुझे ‘राफा द काफिर’ कहना शुरू किया- तो मुझे लगा कि उन्होंने ऐसा इसलिए कहा, क्योंकि यह तुकबंदी करता है। बाद में मुझे पता चला कि ‘काफिर’ का क्या मतलब है। इसका इस्तेमाल कैसे किया जाता है और यह एक नस्लवादी टिप्पणी थी।

रफीक ने संसदीय जांच में कहा है कि जो रूट का दावा कि उन्होंने कभी भी यॉर्कशायर में नस्लवाद को नहीं पाया। जो रूट की यह बात ‘आहत’ करने वाली थी। रफीक ने कहा कि इंग्लैंड के टेस्ट कप्तान जो रूट ने खुद कभी नस्लवादी भाषा का इस्तेमाल नहीं किया था, लेकिन रूट की टिप्पणियों को अजीब बताया। रफीक ने इस बात के संकेत दिए कि क्लब में ऐसी भाषा का इस्तेमाल होना कितनी सामान्य सी बात थी।

2009 से यॉर्कशायर के खिलाड़ी रूट ने पिछले हफ्ते एक बयान जारी कर क्लब में परिवर्तन और कार्यों की शुरुआत की बात कही थी, ताकि ऐसा माहौल बन सके जहां पर ‘सभी समुदायों में विश्वास के साथ’ अच्छा वातावरण हो। यह पूछे जाने पर कि क्या उन्होंने क्लब में नस्लवाद की कोई घटना देखी है, रूट ने कहा था, ‘ऐसा नहीं है कि मैं याद कर सकता हूं, नहीं मैं नहीं कर सकता। लेकिन यह स्पष्ट है कि क्लब में चीजें हुई हैं और हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हम इसे मिटा दें।’

रफीक ने गवाही में कहा, ‘स्पष्ट रूप से, रूट एक अच्छे इंसान हैं। वह कभी भी नस्लवादी भाषा में शामिल नहीं हुए, लेकिन मुझे उनका बयान आहत करने वाला लगा, क्योंकि रूट न केवल गैरी बैलेंस के साथी थे, बल्कि इंग्लैंड के लिए खेलना शुरू करने से पहले, वह उन बहुत सारी पार्टियों में शामिल थे जहां मुझे बुलाया गया। जहां मुझे अपमाजनक शब्‍द कहे गए।’

रफीक ने कहा, ‘उन्हें यह याद नहीं हो सकता है, लेकिन यह दिखाता है कि उस माहौल में, उस संस्थान में यह कितना सामान्य था कि उनके जैसा एक अच्छा आदमी भी इसे नहीं देखता है। यह अजीब था, लेकिन यह वातावरण है, जिसे संस्था ने बहुत आम बना दिया है और जिसे लोग याद नहीं रखते हैं और यह किसी को प्रभावित नहीं करेगा। यह कुछ ऐसा है जिसे मैं हर दिन याद करता हूं, लेकिन मुझे रूट से यह उम्मीद नहीं थी।’

ट्रिब्यूनल की ओर से पूछे गए एक सवाल के जवाब में रफीक ने कहा, ‘यही वजह है कि जहां हम पहुंच चुके हैं, वह काफी मुश्किल है। मैं नहीं चाहता कि मेरा बेटा क्रिकेट के आस-पास भी जाए। यही मौका है जब ईसीबी (इंग्लैंड एवं वेल्स क्रिकेट बोर्ड) और काउंटियों को बदलाव के लिए इसका इस्तेमाल करना चाहिए। उन्हें बताना चाहिए कि हमने बहुत बड़ी गलती की है। हम इसे सही करने के लिए यह-यह करेंगे।’

ट्रिब्यूनल के एक सदस्य के सवालों के जवाब में रफीक ने कहा, ‘हां, मुझे लगता है कि नस्लवाद के कारण ही मेरा करियर खत्म हुआ। यह डरावना अहसास रहा। मेरा मानना है कि जो कुछ भी होता है वह किसी कारण से ही होता है। अगर अगले 5 साल में इससे कोई बड़ा बदलाव आता है, तो मैं मेरे किसी भी रन या विकेट से ज्यादा अहम इसे ही समझूंगा।’

रफीक ने कहा, ‘मेरे कॉन्ट्रैक्ट में शायद 4-5 महीने बचे थे। इसके बावजूद मुझे एक गोपनीयता फॉर्म भरने और पैसों का पार्सल लेने के लिए कहा जा रहा था, जिसे मैंने ठुकरा दिया। उस वक्त वह राशि मेरे लिए बहुत बड़ी रकम होती। मेरी पत्नी संघर्ष कर रही थी। मैं संघर्ष कर रहा था। मैं इस सदमे से गुजरने के लिए मानसिक तौर पर तैयार नहीं था। मैंने देश छोड़ दिया था और पाकिस्तान चला गया था। मैं कभी वापस नहीं आना चाहता था।’

यॉर्कशायर के पूर्व खिलाड़ी रफीक ने यह भी बताया कि इंग्लैंड क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान माइकल वॉन ने काउंटी क्लब यॉर्कशायर में एशियाई मूल के खिलाड़ियों के एक समूह के प्रति नस्लीय रूप से असंवेदनशील टिप्पणियों का इस्तेमाल किया। वॉन ने रफीक के उन आरोपों को नकार दिया था। हालांकि, रफीक की बातों की पुष्टि इंग्लैंड टीम में मौजूद दो एशियाई खिलाड़ियों राणा नावेद उल हसन और आदिल रशीद ने की थी।

यॉर्कशायर रिपोर्ट में ‘केविन’ शब्द के संदर्भ में समिति के अध्यक्ष, जूलियन नाइट के सांसद के पूछने पर, रफीक ने बताया कि यह गैर श्वेत टीम के साथियों के लिए बैलेंस द्वारा इस्तेमाल किया गया एक अपमानजनक शब्द था। उन्होंने कहा, ‘यह इंग्लैंड के ड्रेसिंग रूम में एक खुला रहस्य था। कोई भी व्यक्ति जो गैरी बैलेंस से मिला उसे पता होगा कि वह एक ऐसा मुहावरा था जिसका इस्तेमाल वह अश्वेत लोगों का वर्णन करने के लिए करेगा।’

रफीक ने यह भी आरोप लगाया कि इंग्लैंड के पूर्व बल्लेबाज एलेक्स हेल्स उन खिलाड़ियों में से एक थे जिन्होंने इस शब्द को उठाया। यहां तक ​​​​कि अपने कुत्ते का नाम ‘केविन’ भी रखा, क्योंकि वह काला था। रफीक ने कहा, ‘यह घृणा करने वाला है, लेकिन इसको मजाक के तौर पर लिया गया था।’

रफीक ने कहा कि भारत के चेतेश्वर पुजारा को दुनिया भर के हाई-प्रोफाइल खिलाड़ियो ने ‘स्टीव’ कहा। यह संस्थागत विफलताओं को दर्शाता है। यॉर्कशायर क्लब में कम्युनिटी डेवलपमेंट अधिकारी रहे ताज बट ने ईएसपीएनक्रिकइंफो से कहा था, ‘लगातार एशियन मूल के खिलाड़ियों के साथ टैक्सी ड्राइवर और रेस्तरां वर्कर जैसे शब्द इस्तेमाल किए जाते थे। जो भी गोरी चमड़ी का नहीं होता, उसे वे स्टीव कहते। यहां तक कि चेतेश्वर पुजारा को भी स्टीव कहकर बुलाते थे, क्योंकि वे उसका नाम बोल नहीं पाते थे।’ अजीम रफीक ने अपनी गवाही में भी इस बात को दोहराया।

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