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भविष्य की चिंताः कब सधेगा दीपिका का निशाना?

तुर्की के सैमसन में हुई तीरंदाजी की विश्व कप प्रतियोगिता में दीपिका ने कांटे के संघर्ष में कांस्य पदक जीत कर जता दिया कि उनकी प्रतिभा और अंतिम समय तक जूझने की क्षमता में कोई कमी नहीं है।

Author October 18, 2018 4:14 AM
लंदन ओलंपिक से पहले तुर्की के अताल्या में हुए विश्व कप में तीरंदाजी की व्यक्तिगत रिकर्व स्पर्धा में कोरिया की ली सुंग जिन को हरा कर दीपिका कुमारी ने स्वर्ण पदक जीता था।

श्रीशचंद्र मिश्र

तुर्की के सैमसन में हुई तीरंदाजी की विश्व कप प्रतियोगिता में दीपिका ने कांटे के संघर्ष में कांस्य पदक जीत कर जता दिया कि उनकी प्रतिभा और अंतिम समय तक जूझने की क्षमता में कोई कमी नहीं है। सवाल उठता है कि एशियाई व ओलंपिक खेलों जैसे बड़े मंच पर जहां खिलाड़ी की श्रेष्ठता और कौशल की असली परीक्षा होती है, वहां दीपिका का निशाना क्यों नहीं सध पाता? विश्व कप में पहले भी चार रजत पदक जीत चुकीं दीपिका एशियाई और ओलंपिक खेलों के शुरुआती मुकाबलों में लगातार नाकाम क्यों होती रही हैं? छोटे से गांव की सामान्य परिवार की दीपिका ने अपनी नैसर्गिक प्रतिभा और कड़ी मेहनत के बल पर जो आधार बनाया था उसे पिछले चार साल में और मजबूत जरूर किया है, लेकिन उम्मीद के मुताबिक नहीं।

लंदन ओलंपिक से पहले तुर्की के अताल्या में हुए विश्व कप में तीरंदाजी की व्यक्तिगत रिकर्व स्पर्धा में कोरिया की ली सुंग जिन को हरा कर दीपिका कुमारी ने स्वर्ण पदक जीता था। तब जूनियर वर्ग की वे विश्व विजेता थीं। 2010 में दिल्ली में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में उन्होंने दो स्वर्ण पदक जीते। इससे एक साल पहले विश्व कैडेट खिताब वे अपने नाम कर चुकी थीं। विश्व प्रतियोगिता में कांस्य पदक उनके नाम पहले से ही दर्ज था। इन उपलब्धियों के बल पर उम्मीदों का बोझ लादे चार साल पहले वे लंदन गईं। दीपिका एक बड़े आयोजन के तनाव में लड़खड़ा गईं। 2013 में विश्व कप के चार चरणों में व्यक्तिगत व टीम स्पर्धा में दो स्वर्ण, दो रजत पदक व एक कांस्य पदक दिला कर वे फिर सुर्खियों में आ गईं। 2014 में एशियाई खेलों में उनका निशाना चूका जरूर लेकिन 2015 में विश्व कप में वे फिर लय में आ गईं।

2009 में टाटा तीरंदाजी एकेडमी में पहली बार डोला बनर्जी ने दीपिका को निशाना साधते और अपना स्कोर खुद नोट करते देखा था। डोला से मिलने के छह महीने के भीतर ही दीपिका ने विश्व जूनियर प्रतियोगिता जीत ली। 2010 में नई दिल्ली में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में दो स्वर्ण पदक जीतने के बाद दीपिका की दुनिया ही बदल गई। पुरस्कार राशि और इनामों की बौछार होने लगी। दीपिका इससे बौखलाई नहीं बल्कि ज्यादा सुविधाएं मिलने से उनमें और बेहतर करने का संकल्प मजबूत हुआ। दीपिका की सबसे बड़ी खूबी निडरता है। वे सामने वाली खिलाड़ी की ख्याति की चिंता नहीं करतीं। विकट परिस्थितियों में भी हिम्मत बनाए रख कर कैसे सफलता पाई जा सकती है, यह दीपिका ने 2011 में तूरिन (इटली) में हुई विश्व प्रतियोगिता में दिखा दिया था। उसी प्रतियोगिता में लंदन ओलंपिक के लिए क्वालीफाई करने का मौका था। लेकिन दीपिका का धनुष उन तक नहीं पहुंचा था। प्रतियोगिता शुरू होने से कुछ घंटे पहले ही दीपिका को धनुष मिला। तब भी उनके नेतृत्व में टीम ने रजत पदक जीत कर लंदन ओलंपिक के लिए क्वालीफाई कर लिया था।

रांची से करीब 15 किलोमीटर दूर रातु चाती गांव में उनका जन्म हुआ। पिता शिव नारायण आटो रिक्शा चलाते हैं और मां दीपा देवी नर्स हैं। बचपन में पत्थर मारकर दीपिका आम तोड़ती थीं और क्या मजाल है कि उनका निशाना कभी चूका हो। बाद में बांस के धनुष से वे तीर चलाने लगीं। मां दीपा देवी बताती हैं- जब दीपिका दस साल की थीं वे लोहारडग्गा से कोई 80 किलोमीटर दूर खरसावा गईं। वहां तीरंदाजी की कोई स्थानीय प्रतियोगिता थी जिसमें मेरे भाई की बेटी हिस्सा ले रही थी। दीपिका उसे देखने गर्इं और तभी उसे तीरंदाजी से मोह हो गया। समझाने के बाद भी जब वह नहीं मानी तो उनके पिता और मैं मांगी हुई मोटर साइकिल से उसे खरवासा में हुई अगली प्रतियोगिता में ले गए। लेकिन वह ठीक से निशाना नहीं लगा पाईं और एकेडमी में उन्हें दाखिला नहीं मिला।

बाद में दीपिका को फिर मौका मिला और उन्हें एकेडमी में प्रवेश मिल गया। तीन महीने बाद दीपिका ने बैंकाक में हुई अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा में हिस्सा लिया और अपने खेल से सभी को अंचभित कर दिया। बचपन में बांस के धनुष-तीर से निशाना साधने वाली दीपिका को एकेडमी में आधुनिक उपकरणों को इस्तेमाल करने का मौका मिला। सामान्य गरीब परिवार से निकल कर तीरंदाजी में भारत की ओलंपिक आशा बनने वाली दीपिका जानती हैं कि आने वाले ओलंपिक और एशियाई खेल उनके लिए सबसे बड़ी कसौटी होंगे। उनकी ख्याति और तमाम उपलब्धियों की असली परीक्षा होगी। यह वे समझती हैं कि विश्व कप की सफलता ओलंपिक में कोई मायने नहीं रखती। उसके लिए अलग तरह की मानसिकता और प्रदर्शन की जरूरत होती है। यह मानसिकता दीपिका में कब विकसित हो पाएगी, इसी पर सभी की निगाह है?

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