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क्राउडफंडिंग के जरिए भारतवंशी ने कटाया ओलंपिक का टिकट, स्टार शटलर ने ऐसे तय किया जालंधर से टोक्यो का सफर

अभिनव के लिए जालंधर से न्यूजीलैंड होते हुए टोक्यो ओलंपिक का टिकट कटाने तक का सफर आसान नहीं रहा। अभिनव 2012 में पंजाब चैंपियन तो बने, लेकिन उसी साल सैयद मोदी ग्रैंड प्रिक्स नेशनल्स में वह दूसरे दौर में ही हार गए थे।

Edited By ALOK SRIVASTAVA नई दिल्ली | Updated: June 8, 2021 3:32 PM
बैडमिंटन लेजेंड लिन डान के साथ अभिनव मनोता (बाएं से दूसरे) और उनके पिता लवलीन कुमार (बाएं) तथा मां रजनी बाला। (सोर्स- इंडियन एक्सप्रेस)

इंसान में अगर जुनून हो तो वह कठिन से कठिन लक्ष्य हासिल कर सकता है। मूल रूप से जालंधर के रहने वाले अभिनव मनोता ने यह साबित भी किया है। उन्होंने क्राउडफंडिंग के जरिए ऑकलैंड होते हुए जालंधर से टोक्यो ओलंपिक का टिकट कटाने का रास्ता तय किया है। सात साल पहले जब अभिनव मनोता न्यूजीलैंड के क्राइस्टचर्च के लिए रवाना हुए थे, तब पिता लवलीन कुमार को उम्मीद थी कि उनका बेटा मैनेजमेंट में अपना करियर बनाएगा।

29 साल के अभिनव ने 2012 में पंजाब राज्यस्तरीय बैडमिंटन में मेन्स सिंगल्स का खिताब जीता था। लवलीन कुमार ने ‘इंडियन एक्सप्रेस’ को बताया, ‘उसने न्यूजीलैंड में भी बैडमिंटन खेलने का विकल्प ढूंढने की तलाश जारी रखी। अभिनव अक्सर फोन पर मुझसे सुझाव लेता रहता था।’ अभिनव के पिता लवलीन भी भारत के पूर्व बैडमिंटन खिलाड़ी रह चुके हैं। तीन बार के ओशिनिया चैंपियन अभिनव ने पिछले सप्ताह ही ओशिनिया कोटे से टोक्यो ओलंपिक का टिकट कटाया है।

61 साल के लवलीन कुमार ने बताया, ‘मैं केवल पंजाब चैंपियन ही बन पाया। मैं हमेशा सोचता था कि काश मैं भी नेशनल लेवल पर मेडल जीत पाता।’ लवलीन कुमार ने कहा, ‘अब अभिनव को टोक्यो ओलंपिक में खेलते देखना हमारे परिवार के लिए सबसे बड़ी बात होगी। जब उसने न्यूजीलैंड जाने की योजना बनाई थी, हम तब भी जानते थे कि वह बैडमिंटन को पीछे नहीं छोड़ सकता।’

अभिनव के लिए जालंधर से न्यूजीलैंड होते हुए टोक्यो ओलंपिक का टिकट कटाने तक का सफर आसान नहीं रहा। अभिनव 2012 में पंजाब चैंपियन तो बने, लेकिन उसी साल सैयद मोदी ग्रैंड प्रिक्स नेशनल्स में वह दूसरे दौर में ही हार गए। वह टाटा ओपन के लिए भी क्वालिफाई करने में असफल रहे। शायद यही वजह रही होगी कि अभिनव ने बैडमिंटन में करियर आगे बढ़ाने के बजाय क्राइस्टचर्च स्थित अबेकस इंस्टीट्यूट ऑफ स्टडीज में मैनेजमेंट की पढ़ाई के लिए जाने का विकल्प चुना।

क्राइस्टचर्च में एक बैडमिंटन ट्रेनिंग सेशन के दौरान उनकी मुलाकात न्यूजीलैंड के डबल्स खिलाड़ी डायलन सोएडजासा से हुई। इसके बाद उन्होंने न्यूजीलैंड में ही बैडमिंटन अपना करियर बनाने का फैसला किया। क्राइस्टचर्च में एक साल बिताने के बाद वह डायलन सोएडजासा के आग्रह पर ऑकलैंड चले गए।

अभिनव ने 2015 में सोएडजासा के साथ सिडनी इंटरनेशनल का क्वार्टर फाइनल खेला। साल 2016 में उन्होंने वाइकाटो इंटरनेशनल का सेमीफाइनल खेला। साल 2017 में उन्होंने एक अन्य टूर्नामेंट में मेन्स सिंगल्स का भी क्वार्टर फाइनल खेला। पिछले चार साल में अभिनव ने (2020 के आखिर तक) तीन ओशिनिया खिताब जीते।

इसके अलावा बीडब्ल्यूएफ इंटरनेशनल चैलेंज/ सीरीज में दो बार रनर-अप रहे। वह 2018 में नॉर्थ हार्बर इंटरनेशनल और 2019 में बुल्गारियाई इंटरनेशनल के फाइनल में पहुंचे। साल 2019 में उन्हें न्यूजीलैंड की नागरिकता मिल गई। उसी साल अभिनव ने ओलिवर लेडन डेविस के साथ तीन डबल्स खिताब, डच इंटरनेशनल, हेलस ओपन और बुल्गारियाई इंटरनेशनल जीते। ये तीनों बीडब्ल्यूएफ इंटरनेशनल चैलेंज/सीरीज इवेंट हैं।

इस बीच, उनके सामने अपना ओलंपिक खेलने का सपना पूरा करने के लिए धन की कमी आड़े आने लगी। दरअसल, न्यूजीलैंड कुछ ही प्रतियोगिताओं और ट्रेनिंग के लिए अपने शटलर्स को फंड देता है। इसलिए खिलाड़ियों को अपनी यात्रा और प्रशिक्षण का खर्चा खुद ही उठाना पड़ता है।

तब उन्हें सात बार के वर्ल्ड मेडलिस्ट सीजमंड ने क्राउडफंडिंग के जरिए धन जुटाने की सलाह दी। इसके बाद अभिनव 300 डॉलर जुटाने में सफल रहे। लवलीन ने बताया, ‘मैं तब अपनी बेटी निशिता और उनके पति गौरव से मिलने ऑस्ट्रेलिया जा रहा था। हम क्राउडफंडिंग के बारे में पता चला। तब हमने भी अभिनव को 10,000 डॉलर दिए।’

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