स्टेडियम में हजारों दर्शकों का शोर अचानक थम जाता है। एक तरफ क्रिस्टियानो रोनाल्डो खड़े हैं। दूसरी तरफ गोलपोस्ट के नीचे क्रोएशिया का गोलकीपर। दोनों के बीच सिर्फ 12 गज की दूरी और एक फुटबॉल। देखने वालों को लगता है कि गोल होना तय है। आखिर 24 फीट चौड़े और 8 फीट ऊंचे गोलपोस्ट के सामने सिर्फ एक गोलकीपर ही तो है। लेकिन यही वह पल है, जब दुनिया के सबसे महान फुटबॉलर भी लड़खड़ा जाते हैं।
सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्यों होता है?
गेंद कहां मारें? विज्ञान क्या कहता है? अगर आंकड़ों पर भरोसा करें तो पेनल्टी सिर्फ किस्मत का खेल नहीं है। नॉर्वे के खेल शोधकर्ता गीर योरडेट ने वर्षों तक पेनल्टी शूटआउट का अध्ययन किया। उन्होंने अपनी किताब ‘Pressure: Lessons from the Psychology of the Penalty Shootout’ में बताया है कि अगर खिलाड़ी गेंद दाईं ओर मारता है तो गोल होने की संभावना करीब 71 प्रतिशत रहती है। बाईं ओर भी लगभग यही संभावना होती है। हालांकि, सबसे ज्यादा सफलता तब मिलती है, जब गेंद सीधे बीच में मारी जाए। ऐसा करने पर गोल होने की संभावना लगभग 78 प्रतिशत तक पहुंच जाती है।
कारण सीधा है। ज्यादातर गोलकीपर गेंद मारे जाने से पहले ही दाईं या बाईं ओर छलांग लगाने का फैसला कर लेते हैं। अगर खिलाड़ी आखिरी क्षण तक उन्हें भ्रम में रखे और गेंद बीच में मार दे, तो गोलकीपर के पास बचाव का मौका ही नहीं बचता। हालांकि, कहानी इतनी आसान भी नहीं है। अगर गोलकीपर अपनी जगह पर ही खड़ा रह जाए तो बीच में मारी गई गेंद आसानी से उसके हाथों में आ सकती है। तब वही खिलाड़ी, जिसकी तारीफ हो सकती थी, आलोचना का शिकार बन जाता है।
रोनाल्डो ने खेला सबसे बड़ा दांव
विश्व कप के एक नॉकआउट मुकाबले में पुर्तगाल पीछे चल रहा था। रोनाल्डो पेनल्टी लेने पहुंचे। उन्होंने दौड़ शुरू की, लेकिन गेंद मारने से ठीक पहले हल्का-सा रुक गए। गोलकीपर उनकी चाल में फंस गया और दाईं ओर कूद पड़ा। अगले ही पल रोनाल्डो ने गेंद सीधे बीच में भेज दी। गोल… और पुर्तगाल की उम्मीदें फिर से जिंदा हो गईं। यह सिर्फ एक गोल नहीं था, बल्कि दबाव के बीच लिया गया ऐसा फैसला था, जिसने मैच का रुख बदल दिया।
मोहम्मद सालाह ने भी उठाया बड़ा जोखिम
मिस्र के स्टार मोहम्मद सालाह ने भी एक बड़े मुकाबले में ‘पनेंका’ शॉट खेला। इस तकनीक में खिलाड़ी गेंद को हल्के से चिप करके गोल के बीचोंबीच भेजता है। अगर गोलकीपर अपनी जगह खड़ा रह जाए तो खिलाड़ी मजाक का पात्र बन जाता है, लेकिन अगर गोलकीपर छलांग लगा दे तो शॉट शानदार दिखता है। मोहम्मद सालाह सफल रहे और उनकी बहादुरी की तारीफ हुई, लेकिन यही शॉट असफल होता तो शायद लोग उसे गैर-जिम्मेदार फैसला बताते।
हालांकि हर खिलाड़ी इतना भाग्यशाली नहीं होता। कई महान फुटबॉलर पेनल्टी चूकने के कारण हमेशा के लिए याद किए जाते हैं। इटली के रॉबर्टो बाज्जियो इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। उनके जैसे खिलाड़ियों के लिए एक चूकी हुई पेनल्टी पूरी जिंदगी का बोझ बन जाती है। महान खिलाड़ी भी क्यों चूक जाते हैं? यही फुटबॉल का सबसे बड़ा रहस्य है। रॉबर्टो बाज्जियो, लियोनल मेसी, हैरीकेन, मार्कस रैशफोर्ड, स्टीवन जेरार्ड… सूची लंबी है।
इन सभी ने अपने करियर में अहम पेनल्टी मिस की हैं। आखिर क्यों? दरअसल, पेनल्टी सिर्फ तकनीक का नहीं, दिमाग का खेल है। जब खिलाड़ी गेंद रखने जाता है, तब उसके दिमाग में सिर्फ गोल करने का विचार नहीं चलता। वह कई बारे में सोच रहा होता है। मसलन- अगर मैं चूक गया तो? देश क्या कहेगा? सोशल मीडिया पर क्या होगा? क्या लोग मुझे हमेशा इसी गलती के लिए याद रखेंगे?
यही डर उसके पैरों तक पहुंच जाता है, इसलिए ‘जोर से मार देता’… कहना आसान है, लेकिन करना उतना ही मुश्किल। 1996 यूरो कप के सेमीफाइनल में इंग्लैंड के गैरेथ साउथगेट जर्मनी के खिलाफ पेनल्टी चूक गए थे। मैच के बाद उनकी मां ने पूछा था, ‘‘इतना सोचने की क्या जरूरत थी? जोर से मार देते।’’ यही बात हर मैच के बाद करोड़ों दर्शक भी कहते हैं, लेकिन मैदान पर खड़ा खिलाड़ी जानता है कि यह सिर्फ गेंद को मारने का मामला नहीं है। वह उस पल अपने देश की उम्मीदों, करोड़ों प्रशंसकों और अपने पूरे करियर का भार उठा रहा होता है।
आत्मविश्वास भी हमेशा काफी नहीं होता
लिवरपूल और हंगरी के कप्तान डोमिनिक सोबोस्लाई का मानना है कि पेनल्टी में ज्यादा सोचने की जरूरत नहीं होती। आरबी लाइपजिग के लिए खेलते समय पीएसजी के खिलाफ मैच में नेमार ने उनसे पूछा था, ‘‘गोल करोगे?’’ सोबोस्लाई का जवाब था, ‘‘हां, मैं कभी पेनल्टी नहीं चूकता।’’ उन्होंने गोल भी किया, लेकिन हर खिलाड़ी ऐसा नहीं कर पाता। कई बार आत्मविश्वास भी दबाव के आगे टूट जाता है।
जब दिमाग ही दुश्मन बन जाए
मार्कस रैशफोर्ड ने यूरो 2020 फाइनल में इटली के खिलाफ पेनल्टी मिस की थी। बाद में उन्होंने लिखा कि उस दिन उनके दिमाग में एक ही आवाज गूंज रही थी- ‘गलती मत करना…’ हर हाल में परफेक्ट होना है। यही सोच उनके लिए सबसे बड़ी बाधा बन गई। कई मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि जब खिलाड़ी ‘गोल करना है’ की जगह ‘गलती नहीं करनी’ सोचने लगता है, तभी उसके प्रदर्शन पर असर पड़ता है, इसलिए पेनल्टी फुटबॉल का सबसे बड़ा मानसिक इम्तिहान है।
पेनल्टी देखने में बेहद आसान लगती है। गेंद एक जगह रखी होती है। सामने सिर्फ एक गोलकीपर होता है, लेकिन सच यह है कि उस क्षण खिलाड़ी अपने प्रतिद्वंद्वी से कम, अपने ही दिमाग से ज्यादा लड़ रहा होता है। यही वजह है कि महान फुटबॉलर योहान क्रॉयफ ने कहा था, ‘‘पेनल्टी इतनी आसान दिखती है कि वही उसे सबसे मुश्किल बना देती है।’’ इसलिए अगली बार जब टीवी के सामने बैठा कोई व्यक्ति कहे, ‘‘अरे, बस जोर से मार देता!’’ तो उसे याद दिलाइए कि दुनिया के सबसे बड़े खिलाड़ी भी कई बार सिर्फ 12 गज की दूरी तय नहीं कर पाते।
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