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सुपरसब से लेकर फ्री-हिट तक 26 साल में ICC ने बदले ढेरों नियम, बल्लेबाजों को मिला ज्यादा फायदा

World Cup 2019: 1992 के विश्व कप के बाद से, वनडे क्रिकेट लगातार प्रवाह की स्थिति में रहा है। तब से लेकर अबतक बहुत से नए नियमों को जोड़ा गया है।

world cup: 1992 विश्वकप से 2019 तक आईसीसी ने बदले ढेरों नियम। (jansatta photo by Narender Kumar)

ICC rules since 1992 world cup: 30 मई से इंग्लैंड और वेल्स में शुरू होने वाला वनडे विश्वकप इस बार अलग फॉर्मेट में खेला जाएगा। ये विश्वकप 1992 विश्वकप की तरह लीग विश्वकप होगा जहां सभी टीमें एक दूसरे से मैच खेलेंगी। लेकिन 1992 से लेकर अबतक क्रिकेट पूरी तरह बदल चुका है। नियमों से लेकर मैदान के आकार तक सब बदल चुका है। 1992 के विश्व कप के बाद से, वनडे क्रिकेट लगातार प्रवाह की स्थिति में रहा है। तब से लेकर अबतक बहुत से नए नियमों को जोड़ा गया है और खेल को और अधिक गतिशील बनाने के लिए कुछ परिमार्जन किया गया है।

क्रिकेट को ग्लोबली, छोटा, टीवी फ्रैंडली और अधिक आकर्षक बनाने के लिए वनडे क्रिकेट के बहुत से नियमों को बदला या हटाया गया है। इसकी शुरुआत 1992 विश्वकप से हुई जहां पहली बार सभी टीमों ने रंगीन कपड़े पहन कर वनडे क्रिकेट खेला। पहले क्रिकेट बहुत डिफेंसिव खेला जाता था। लेकिन श्रीलंकाई सलामी बल्लेबाज सनथ जयसूर्या और रोमेश कालुविथारना ने पावरप्ले में आतिशी बल्लेबाजी करना शुरू की। 1996 में पहली बार दर्शकों ने किसी खिलाड़ी को पहले 15 ओवरों में तेज बल्लेबाजी करते देखा। जयसूर्या और कालुविथारना ने पॉवरप्ले में ज्यादा से ज्यादा रन बनाने का ट्रेंड सेट किया और अपनी टीम को पहला विश्वकप जिताया।

पॉवरप्ले फैक्टर –
2005 आते-आते वनडे क्रिकेट 16 से 20 ओवरों के दौरान बोरिंग होने लगा। पहले 15 ओवरों में पावरप्ले होने के चलते बल्लेबाज तेजी से रन बनाते थे। लेकिन उसके बाद 40 ओवर तक वे धीमी बल्लेबाजी करते थे और आखिरी 10 ओवरों के लिए विकेट बचाते थे। टी20 क्रिकेट के आने से वनडे क्रिकेट की लोकप्रियता घाट गई। इसको बचाने के लिए आईसीसी ने पहले 15 ओवरों में 30-यार्ड सर्कल के बाहर तीन फील्डर कि जगह दो कर दिए। इस से पहले 15 ओवर में ज्यादा रन बनाने लगे। 2008 में आईसीसी ने इस नियम में और बदलाव करते हुए बैटिंग पॉवरप्ले लेकर आया। बैटिंग पॉवरप्ले बल्लेबाजी कर रही टीम के कप्तान पर निर्भर करता था वो कब लेना चाहते हैं। लेकिन ज्यादातर टीम इसका उपयोग स्लॉग ओवरों में करने लगी। टीमें 46 से 50 ओवरों में इसका उयोग कर ज्यादा से ज्यादा रन बनाने लगी। 2011 में आईसीसी ने इसे बदल दिया और नए नियमों के अनुसार अब इस पॉवरप्ले का इस्तेमाल सिर्फ 16 से 40 में किया जा सकता था। इसी साल आईसीसी डीआरएस (डिसिशन रिव्यू सिस्टम) भी लेकर आया।

गेंदबाजों का बुरा वक़्त, बल्लेबाजों की बल्ले-बल्ले –
आईसीसी द्वारा बनाए गए इन नियमों से वनडे क्रिकेट पूरी तरह बल्लेबाजों का खेल हो गया। आईसीसी ने नॉन पॉवरप्ले ओवरों में 30-यार्ड सर्कल के बाहर फील्डिंग करने वाले खिलाड़ियों की संख्या पांच से घटाकर चार कर दी। जिसके चलते पॉवरप्ले ओवरों के बाद भी गेंदबाजों की धुनाई शुरू हो गई और हाई स्कोरिंग गेम होने लगे। इस दौरान बहुत से 300+ स्कोर बने और उन लक्ष्यों को आसानी से पा भी लिया गया। इसको ध्यान में रखते हुए आईसीसी ने बैटिंग पॉवरप्ले हटा दिया।

अभी नियमों के अनुसार – पहला पवरप्ले 1 से 10 ओवर में लागू होगा जहां 30-यार्ड सर्कल के बाहर मात्र 2 फील्डर होंगे, दूसरा पवरप्ले 11 से 40 ओवर में लागू होगा जहां 30-यार्ड सर्कल के बाहर मात्र 4 फील्डर होंगे और आखिरी पावर प्ले 41 से 50 ओवर में लागू होगा जहां 30-यार्ड सर्कल के बाहर 5 फील्डर होंगे।

कभी 1 तो कभी 2 बाउंस –
गेंदबाज के पास बल्लेबाज को रोकने या डराने के लिए बाउंसर ही एक हथियर होता है। 1992 विश्वकप में आईसीसी ने एक बाउंसर को ओवर की अनुमति दी थी। 1994 में इसे बढाकर 2 कर दिया गया। अब गेंदबाज एक ओवर में दो बाउंसर फेंक सकता था। लेकिन अगर गेंदबाज दो से तीसरी बाउंसर का उपयोग करता है तो उसे 2 रन की पेनल्टी लगेगी। 2001 में आईसीसी ने इस नियम को बदलकर फिर से एक बाउंसर कर दिया। 2012 में एक बार फिर दो बाउंसर की अनुमति दे दी गई लेकिन तीसरी बाउंसर फेंकने पर लगने वाली पेनल्टी हटा दी गई और उसकी जगह नो बॉल आ गया। अगर कोई गेंदबाज एक ओवर में तीन बाउंसर फेंकता है तो तीसरा बाउंसर नो करार दिया जाएगा इस से सामने वाली टीम को एक अतिरिक्त रन और अगली गेंद फ्री हिट के रूप में मिलेगी।

नई गेंद का नियम –
2011 में गेंदबजों की मदद करने के लिए आईसीसी दो नई गेंद का नियम लेकर आया। इस नियम के मुताबिक एक पारी में दोनों छोर से दो अलग-अलग नई गेंदों का इस्तेमाल होगा। 2011 से पहले 34 ओवर के बाद गेंद बदलने का अधिकार अंपायर के पास होता था। लेकिन ये नियम गेंदबाजों पर उल्टा पड़ा। दोनों तरफ से नई गेंद का इस्तेमाल होने से गेंद जल्दी पुरानी नहीं होती और गेंदबाज को रिवर्स स्विंग नहीं मिलता। गेंद नई होने की वजह से स्पिन गेंदबाजों को भी गेंद पकड़ने में दिक्कत जाती है और अच्छे से स्पिन नहीं होती। आठ में सात दोहरे शतक दो नई गेंद का नियम आने के बाद लगे हैं। 300 से ज्यादा का स्कोर बनाना और उसे चेस करना अब आम बात हो गई है।

डकवर्थ लुईस नियम –
डकवर्थ लुईस नियम क्रिकेट के सीमित मैच के दौरान किसी प्रकार की प्रतिकूल भौगोलिक परिस्थितियों एवं अन्य स्थितियों में अपनाया जाने वाला नियम है, ताकि मैच अपने निर्णय तक पहुँच सके। यह नियम अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद द्वारा मान्यता प्राप्त हैं। इस नियम के तहत घटाए गए ओवरों में नए लक्ष्य निर्धारित किए जाते हैं। इस नियम को 1999 में लागू किया गया। दक्षिण अफ्रीका को 1 गेंद पर 22 रन चाहिए? आप में से कितने लोग दक्षिण अफ्रीका और इंग्लैंड के बीच 1992 विश्व कप का सेमीफाइनल मैच याद है। दक्षिण अफ्रीका को जीत के लिए 13 गेंदों में 22 रन चाहिए थे। लेकिन तभी बारिश हो गई। बारिश ख़त्म होने के बाद दक्षिण अफ्रीका को 1 गेंद पर 22 रन का लक्ष्य दिया गया। तब डकवर्थ लुईस नियम नहीं होने की वजह से ऐसा हुआ था। लेकिन इस नियम के तहत ज्यादातर रन का पीछा करने वाली टीम को फायदा होता है।

जब क्रिकेट में आया सुपरसब-
फुटबॉल और हॉकी की तरह आईसीसी ने क्रिकेट में भी सुपरसब का इस्तेमाल किया। 2005 में आईसीसी ने इस नियम को एक प्रयोग के तौर पर इस्तेमाल किया। इस नियम के तहत दोनों टीमें टॉस के दौरान अपना एक सुपर सब बताएंगी और उसका इस्तेमाल मैच में कभी भी और किसी भी खिलाड़ी की जगह किया जा सकता है। इस नियम से दर्शकों में काफी उत्साह था लेकिन टॉस हारने वाली टीमको घाटा होता था क्योंकि सुपरसब कौन कोगा इस बात कि जानकारी टॉस के बाद दी जाती थी। इस दौरान 60% टॉस जीतने वाली टीमों ने मैच जीते थे। 2007 विश्वकप से पहले आईसीसी ने इस नियम को हटा दिया।

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