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क्रिकेट: सफेद गेंद का मुकाबला कर पाएगी गुलाबी गेंद!

एक अंग्रेजी अखबार डेली मेल के मुताबिक एबी डिविलियर्स को जहां एक साल क्रिकेट खेलने के लिए दक्षिण अफ्रीका क्रिकेट बोर्ड महज 170000 डॉलर देता है वहीं महज छह या सात हफ्ते इंडियन प्रीमियर लीग में खेलने के लिए उन्हें 70,0000 डॉलर मिलते हैं।

KOOKABURRA PINK BALL IEडे-नाइट टेस्ट मैच की शुरुआत के साथ ही गुलाबी गेंद का भी प्रयोग क्रिकेट में आजमाया गया था। (फोटो सोर्सः इंडियन एक्सप्रेस)

संदीप भूषण

टैस्ट मैचों में खेलना किसी भी क्रिकेटर के लिए खास रहा है। इस प्रारूप में प्रदर्शन को ही अंतरराष्ट्रीय मानक मान कर बल्लेबाजों या गेंदबाजों की काबिलियत परखी जाती रही है, लेकिन हाल के दिनों में कई दिग्गज खिलाड़ियों ने इसकी घटती लोकप्रियता पर चिंता जताई है। साथ ही उन्होंने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट संस्था को आगाह भी किया कि जल्द ही इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए तो एक दिन टैस्ट क्रिकेट खत्म हो जाएगा। शायद यही कारण है कि हाल ही में आइसीसी ने 138 साल बाद दिन-रात क्रिकेट टैस्ट की शुरुआत की है। इसी कड़ी में गुलाबी गेंद से टैस्ट खेला जाना भी है।

दरअसल, आज क्रिकेट के तीन प्रारूप हैं। हर की अपनी महत्ता और लोकप्रियता है। टैस्ट प्रारूप पर खतरे की घंटी तब भी बजी थी जब एकदिवसीय क्रिकेट अस्तित्व में आया था। उस वक्त भी कई क्रिकेटर और जानकारों ने कहा था कि इस प्रारूप मैच के कारण टैस्ट खत्म हो जाएगा। आज टी-20 के कारण फिर से टैस्ट के खत्म होने की बात हो रही है। असल में इसके कई कारण हैं। उनमें सबसे महत्त्वपूर्ण है मैदान पर घटती दर्शकों की संख्या और ज्यादा कमाई के लिए खिलाड़ियों का टी-20 की तरफ कूच करना। एक अंग्रेजी अखबार डेली मेल के मुताबिक एबी डिविलियर्स को जहां एक साल क्रिकेट खेलने के लिए दक्षिण अफ्रीका क्रिकेट बोर्ड महज 170000 डॉलर देता है वहीं महज छह या सात हफ्ते इंडियन प्रीमियर लीग में खेलने के लिए उन्हें 70,0000 डॉलर मिलते हैं। अब इससे साफ हो जाता है कि दर्शकों से ज्यादा कमाई के लिए खिलाड़ी ही टैस्ट से दूरी बनाना चाह रहे हैं।

केंद्र में दर्शक
अब अगर मान भी लें कि खिलाड़ी टैस्ट के प्रति आकर्षित हैं और खेलना चाहते हैं, लेकिन समस्या यह है कि कोई भी खेल सिर्फ खिलाड़ियों से सफल नहीं होता। उसकी लोकप्रियता और सफलता को मापने के लिए दर्शकों की संख्या और टीवी पर टीआरपी की जरूरत होती है। मूल रूप से यही खेल के लिए प्रायोजकों को जुटाते हैं और बगैर पैसे के किसी भी खेल को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता।

विज्ञापन और दर्शक
हाल में संपन्न एशेज टैस्ट के बाद मोइन अली ने कहा कि इस शृंखला के लिए जितने दर्शक पहले आते थे, उतने अब नहीं आते। ऐसे में निश्चित तौर पर बाजार प्रभावित होगा। प्रसारण अधिकारों में बोली कम लगेगी और इसका सीधा असर विज्ञापनों की दर पर पड़ेगा। ऐसे में कोई भी प्रसारणकर्ता नुकसान झेलकर काम नहीं करना चाहेगा। अब ऐसे में नियामक संस्थाओं पर कुछ करने का दबाव बनेगा। 2009 में एमसीसी ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि एशेज जैसी आइकॉनिक सीरीज को छोड़ दिया जाए तो दुनिया भर में टैस्ट क्रिकेट को देखने वालों की संख्या में खतरनाक स्तर पर कमी आई है। इससे तो क्रिकेट का यह फॉर्मेट मर जाएगा। इसके बाद ही एमसीसी ने दिन-रात के टैस्ट क्रिकेट की परिकल्पना को दुनिया के सामने रखा। आज का खेल बाजार से प्रभावित है। टी-20 सबसे अधिक और एकदिवसीय क्रिकेट उससे कुछ कम। टैस्ट क्रिकेट पर भी बाजार का असर है। कोई सीरीज होती है, तो उसके लिए टी-20, वनडे और टी-20 के लिए एक ही प्रसारणकर्ता होता है। प्रसारणकर्ता अधिकार हासिल करने के लिए करोड़ों डॉलर खर्च करता है। उसे टीवी दर्शकों की संख्या से मतलब होता है। उसे टीआरपी से मतलब होता है। टीआरपी पर ही उसकी कमाई आश्रित होती है।

दिन-रात टैस्ट से बदलाव की उम्मीद
इसी को ध्यान में रखकर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद ने गुलाबी रंग की गेंद के साथ छह साल तक परीक्षण करने के बाद 27 नवंबर से एडीलेड ओवल में पहला आधिकारिक दिन-रात का टैस्ट कराने का फैसला किया। यह एक ऐतिहासिक घटना थी और पूरी दुनिया इसे टैस्ट क्रिकेट के हक में सकारात्मक बदलाव के रूप में देख रही है। आसीसी ने कहा था कि यह ऐतिहासिक मैच टैस्ट क्रिकेट की लोकप्रियता बढ़ाने की योजना का हिस्सा है। आइसीसी के मुख्य कायर्कारी अधिकारी डेविड रिचर्डसन ने कहा कि दिन-रात के टैस्ट मैच से ऐसे देशों में क्रिकेट के इस प्रारूप की लोकप्रियता में इजाफा लाने में मदद मिलेगी, जहां टैस्ट देखने स्टेडियम में बहुत कम संख्या में दर्शक पहुंचते हैं।

अफगानिस्तान और आयरलैंड का प्रवेश सुखद
टैस्ट की अहमियत कभी खत्म नहीं होगी इसका ताजा उदाहरण अफगानिस्तान और आयरलैंड का पूर्ण टैस्ट सदस्य बनना है। हालांकि टैस्ट दिग्गज के रूप में स्थापित वेस्ट इंडीज और इंग्लैड का कमजोर होना और जिंबाब्वे जैसे देश में इस प्रारूप की घटती मौजूदगी आगाह करने के लिए काफी है। इस प्रारूप को बचाने के लिए आइसीसी के प्रयासों की सराहना होनी चाहिए लेकिन अन्य दिग्गज क्रिकेटरों को भी इसके लिए आगे आना चाहिए।

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