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सुझावः एशियाई खेलों में शीर्ष पांच में आने के लिए अपनाएं चीनी तरीका

एशियाई खेलों में अब तक का अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने के बाद भी भारत पदक तालिका में आठवें स्थान पर रहा। अगर चीन, जापान और कोरिया को छोड़ दें तो भारत में अगले या उससे अगले एशियाई खेलों तक चौथे स्थान पर पहुंचने की कूवत है।

Author September 6, 2018 4:38 AM
आज चीन में 15 हजार से ज्यादा स्पोर्टिंग स्कूल चल रहे हैं, जहां प्रतिभाओं की पहचान करके उन्हें छोटी उम्र में ही इन स्कूलों में भेज दिया जाता है।

मनोज जोशी

एशियाई खेलों में अब तक का अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने के बाद भी भारत पदक तालिका में आठवें स्थान पर रहा। अगर चीन, जापान और कोरिया को छोड़ दें तो भारत में अगले या उससे अगले एशियाई खेलों तक चौथे स्थान पर पहुंचने की कूवत है। सवाल है कि यह सब कैसे मुमकिन हो सकता है। हालांकि पिछले वर्षों में भारतीय खेलों में एक बड़ा बदलाव आया है लेकिन हमें आज भी चीनी मॉडल को आधार बनाने की जरूरत है। दोनों में फर्क यह है कि भारत में जहां खिलाड़ियों को राष्ट्रीय स्तर पर उभरने के बाद ही टॉप्स से लेकर तमाम योजनाओं का लाभ मिल पाता है, वहीं चीन का बुनियादी ढांचा उन्हें बचपन में ही तराश लेता है।

आज चीन में 15 हजार से ज्यादा स्पोर्टिंग स्कूल चल रहे हैं, जहां प्रतिभाओं की पहचान करके उन्हें छोटी उम्र में ही इन स्कूलों में भेज दिया जाता है। यहां पढ़ाई और खेल साथ-साथ चलते हैं, जहां से वे शीर्ष स्तर के खिलाड़ी बनकर ही बाहर निकलते हैं। वहीं भारत के बुनियादी ढांचे का आलम यह है कि यहां देश के बड़े महानगरों में भी तकरीबन 60 फीसद स्कूलों में खेलने के मैदान नहीं हैं। जिला, ब्लॉक या गांव स्तर पर देखें तो तस्वीर और भी भयावह है। इन स्कूलों में खेल पीरियड का इस्तेमाल होम वर्क पूरा करने या अन्य जरूरत को पूरा करने के लिए किया जाता है। देश में आज तकरीबन 90 फीसद से अधिक स्कूलों में स्पोर्ट्स पीरियड के दौरान छात्रों को खेलों का सामान तक मुहैया नहीं कराया जाता।

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दूसरे, एथलेटिक्स जैसे तमाम खेलों में शानदार प्रदर्शन करने के बाद उन 15 से ज्यादा खेलों पर कोई स्पष्ट नीति बननी जरूरी है जिनमें भारत खाली हाथ घर लौटा है। इस बार भारत को तैराकी, गोताखोरी, भारोत्तोलन, जिम्नास्टिक, हैंडबॉल, वॉलीबॉल, बास्केटबॉल, जूडो, कराते, ताइक्वांडो, केनोइंग और क्याकिंग, तलवारबाजी, गोल्फ, पेनकॉट सिलाट और साइक्लिंग में एक कांसा भी नसीब नहीं हो सका है। इनमें तैराकी का यह कहकर बचाव किया जा सकता है कि भारत के पांच तैराक इस बार फाइनल तक पहुंचे और वीरधवल खाड़े महज 0.1 सेकंड के साथ भारतीय तैराकी के इतिहास पुरुष बनते-बनते रह गए। बाकी खेलों में भारत पदक तो छोड़िए, सबसे निचले पायदान से बचने के लिए ही जूझता दिखाई दिया। आदर्श स्थिति यह होती कि इन खेलों को अभी देश में ही पनपने का मौका दिया जाए और जहां कुछ बेहतर करने की उम्मीद है, केवल वहीं एक-दो खेलों को इस मंच पर उतारा जाए, जिसमें कम से कम भारतीय खिलाड़ी पदक न सही, अपनी मौजूदगी का अहसास करा सकें। क्या बेहतर नहीं होगा कि भारतीय खेल मंत्रालय अपने उन खेलों पर ही अधिक खर्च करे जहां पदक की ज्यादा उम्मीदें हैं। यह इन खेलों में भारत के ऊपर उठने का तीसरा बड़ा नुस्खा साबित हो सकता है।

इस बार उज्बेकिस्तान अगर भारत से ऊपर रहा है तो इसकी वजह उसके परंपरागत खेल कुराश में उसे मिले सात में से छह स्वर्ण जीतना रहा। इंडोनेशिया के हमसे ज्यादा स्वर्ण जीतने की वजह उसके परंपरागत खेल पिनकॉट सिलाट में उसे मिले 14 में से 12 स्वर्ण रहे। इसी तरह चीन ने वूशू में 10, ताइक्वांडो में दक्षिण कोरिया ने पांच, जूडो और कराते में जापान ने 27 में से 13 स्वर्ण हासिल किए। वहीं, भारत के परंपरागत खेल कबड्डी में केवल दो ही स्वर्ण थे और उसमें भी भारत एक भी सोना नहीं जीत सका। पांचवें, खेलों के जरिये आर्थिक सुरक्षा मुहैया कराने और मोटा इनाम देने के जो अच्छे परिणाम हरियाणा में देखने को मिले हैं, उन्हें दूसरे राज्यों में भी आजमाने की जरूरत है।

कितने ही राज्यों में बरसों से स्पोर्ट्स कोटा में नौकरियां रुकी पड़ी हैं। आज इन्हें शुरू भी किया गया है तो महज नाममात्र के लिए। छठे, खेलों के लिए देशव्यापी अभियान की जरूरत है जो देश में खेल संस्कृति बनने में मददगार साबित हो सके। चीन के राष्ट्रपति ने पिछले दिनों 2020 के शीतकालीन ओलंपिक के लिए 30 करोड़ लोगों को प्रेरित करने का अभियान छेड़ा है, जिससे पूरा देश ऐसे बड़े आयोजनों में अपने खिलाड़ियों को हर संभव सहायता देने में जुट जाता है। उनके लिए एशियाई खेल या ओलंपिक किसी विश्व युद्ध से कम नहीं होते। सातवां नुस्खा मेडिकल सुविधाओं को सुधारने का है, जिसकी वजह से मीराबाई चानू से लेकर तमाम बड़े सितारे वक्त पर अपनी इंजरी से नहीं उबर पाए।

आदर्श विदेशी प्रशिक्षकों की नियुक्ति आठवां बड़ा कारण है। इस वजह से खासकर स्क्वैश में इस बार भारतीय खिलाड़ियों और देसी कोच के बीच जकार्ता में ही तमाशा देखने को मिला। नौवां कारण, आदर्श वीडियो एनेलिस्ट की कमी होना है। आज अलग-अलग खेलों में वीडियो एनेलिस्ट उतना ही काम करते हैंं, जितने वीडियो यू-ट्यूब पर मुहैया होते हैं। कई खेलों की फेडरेशन के पास तो वीडियो एनेलिस्ट हैं ही नहीं। जरूरत है विदेशी खिलाड़ियों के ज्यादा से ज्यादा फुटेज मुहैया कराकर कोच को मदद करने की और दसवीं और अहम जरूरत पब्लिक सेक्टर यूनिट, ओलंपिक गोल्ड क्वेस्ट और गो-स्पोर्ट्स फाउंडेशन जैसी तमाम संस्थाओं को बढ़ावा देने की है। साथ ही जरूरत केंद्र सरकार की टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम (टॉप्स) का दायरा बढ़ाने की भी है।

ऐसे बना चीन का दबदबा

चीन का उदाहरण देना मुनासिब होगा। उसे जब 2008 के बेजिंग ओलपिंक खेलों की मेजबानी मिली तो उसने इससे सात साल पहले ही विनिंग प्राइड के नाम से अपनी महत्त्वाकांक्षी योजना की घोषणा कर दी। इस योजना के तहत 2004 के एथेंस ओलंपिक खेलों पर अलग से तीन अरब डॉलर खर्च किए गए जिससे चीन 32 स्वर्ण पदकों के साथ अमेरिका के बाद दूसरे स्थान पर रहा। इन खेलों में उसने अपने कई युवा खिलाड़ियों को अवसर दिया और अपनी मेजबानी में होने वाले इससे अगले ओलंपिक में उसने 48 स्वर्ण पदक जीतकर ऐतिहासिक प्रदर्शन किया। इसमें विनिंग प्राइड योजना का बड़ा हाथ था।

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