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Birthday Special: कराटे टेस्ट में फेल होने से खुली साइना नेहवाल के ओलंपिक पदक विजेता बनने की राह, 500 रुपए थी स्टार शटलर की पहली कमाई

Saina Nehwal Happy Birthday: साइना ने कराटे में ब्राउन बेल्ट भी हासिल कर ली थी। आगे की कराटे जर्नी के लिए उन्हें एक टेस्ट से गुजरना था। इस टेस्ट में प्रशिक्षु को सांस रोकर अपने पेट पर भारी वजन रखवाना होता है, लेकिन साइना उस टेस्ट में फेल हो गईं। शायद किस्मत ने उनके लिए कुछ बेहतर लिख रखा था।

Author Edited By आलोक श्रीवास्तव नई दिल्ली | Updated: March 17, 2020 1:17 PM
साइना नेहवाल 10 सुपरसीरीज टाइटल अपने नाम कर चुकी हैं।

Happy Birthday Saina Nehwal: ओलंपिक में पदक जीतने वाली पहली भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ी बनने वाली साइना नेहवाल आज यानी 17 मार्च 2020 को अपना 30वां जन्मदिन मना रही हैं। वे दो बार एशियाई सैटेलाइट बैडमिंटन टूर्नामेंट जीतने वाली पहली महिला शटलर हैं। साइना नेहवाल सबसे प्रसिद्ध भारतीय शटलरों में से एक हैं। अब वे शटलर के साथ-साथ राजनीतिज्ञ भी बन गईं हैं। वे हाल ही में भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुई हैं। साइना नेहवाल आज जिस मुकाम पर हैं, उसके लिए उन्होंने निश्चित तौर पर एक लंबा सफर तय किया है। आइए उनके संघर्ष और उपलब्धियों पर एक नजर डालते हैं।

बहुत कम लोग जानते हैं कि साइना नेहवाल बैडमिंटन कोर्ट पर उतरने से पहले कराटे में चैंपियन बनना चाहती थीं, लेकिन एक इस खेल के एक टेस्ट में फेल होने के कारण उनके ओलंपिक में पदक जीतने की राह की नींव पड़ गई। 17 मार्च 1990 को हरियाणा के हिसार में जन्मीं साइना जब आठ साल की थीं तभी उनके पिता का ट्रांसफर हैदराबाद हो गया। शहर नया होने के कारण बाहर किसी से ज्यादा मिलना-जुलना होता नहीं था और घर पर बैठे-बैठे वे बोर हो जाया करती थीं। ऐसे में उन्होंने कराटे क्लास ज्वाइन की।

उन्होंने कराटे में ब्राउन बेल्ट भी हासिल कर ली थी। आगे की कराटे जर्नी के लिए उन्हें एक टेस्ट से गुजरना था। इस टेस्ट में प्रशिक्षु को सांस रोकर अपने पेट पर भारी वजन रखवाना होता है। साइना जब टेस्ट देने गईं तो 90 किलो का इंसान उनके पेट पर चढ़ गया। साइना इतना भारी वजन बर्दाश्त नहीं कर पाईं और सांस छोड़ दी। यह गलती साइना को भारी पड़ी। उनकी पेट में बहुत दर्द हुआ। इसके बाद उन्हें कराटे में चैंपियन बनने का सपना छोड़ना पड़ा।

इसके बाद पिता ने उन्हें बैडमिंटन का समर कैंप ज्वाइन करा दिया। समर कैंप में प्रशिक्षुओं की सीटें फुल हो चुकी थीं, लेकिन साइना की किस्मत में तो कुछ और ही लिखा था। पिता के आग्रह पर कोच ने साइना का दाखिला ले लिया। साइना पहली बार बैडमिंटन कोर्ट पर उतरीं। उनके पहले ही स्मैश से कोच बहुत प्रभावित हुए। आगे की ट्रेनिंग के लिए कैंप में आए बच्चों में से सिर्फ एक को चुनना था। साइना नहीं चुनी गईं, बल्कि महाराष्ट्र की दीति नाम की लड़की चुनी गईं। यहां पर भी साइना की किस्मत जोरदार रही। ऐन वक्त पर दीति ने नाम वापस ले लिया। इसके साथ ही साइना को आगे की ट्रेनिंग के लिए चुन लिया गया।

साइना तब कक्षा 4 में थीं। साइना ने कड़ी मेहनत की। उन्होंने भविष्य की चुनौतियों के लिए खुद को तैयार किया। साइना ने 1999 में अंडर-10 जिला स्तरीय टूर्नामेंट की ट्रॉफी अपने नाम की। तब साइना को इनाम के तौर पर 500 रुपये मिले थे। वह साइना की पहली कमाई थी। वह धनराशि उन्होंने अपने माता-पिता को सौंप दी। इसके बाद से इस स्टार शटलर में पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने 2012 लंदन ओलंपिक में ब्रॉन्ज मेडल जीतकर इतिहास रच दिया।

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